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बालगंधर्व का संगीत

विनायकराव पटवर्धन

श्री. नारायणराव उर्फ बालगंधर्व के नाट्यसंगीत के गुणों में से दोष कैसे निकालें, यही सबसे बड़ा रहस्य है. श्री. नारायणराव ने पिछले 25 वर्षों से अपने गायन से पूरे महाराष्ट्र को इतना मोहित कर लिया है कि उनके संगीत को बुरा कहना संभव ही नहीं है. श्री. नारायणराव ने कोई बहुत अधिक गाना नहीं सीखा है. वे संगीत विद्या के प्रेमी हैं. संगीत आचार्य न होते हुए भी उन्होंने न केवल महाराष्ट्र को, बल्कि पूरे हिंदुस्तान को अपने संगीत से दीवाना बना दिया है. श्री. नारायणराव अगर गाना सीखे होते तो वे केवल गवैया बन जाते; लेकिन आज जो उनकी ख्याति हुई है, उतनी कभी नहीं होती. उनके अन्य प्राकृतिक गुणों का लाभ भी हिंदुस्तान को नहीं मिलता. उनके शरीर की प्राकृतिक बनावट, प्राकृतिक मधुर आवाज आदि अनेक गुणों का लाभ आज जो महाराष्ट्र को मिल रहा है, वह अगर वे गवैया के रूप में आगे आते तो निश्चित रूप से नहीं मिलता. उनकी नाटकों की भूमिका ने पुरुषों को तो दीवाना बनाया ही है; लेकिन स्त्रियों को भी उन्होंने दीवाना बनाया है, यह एक विलक्षण बात है. उनके स्त्री वेश में जरा भी असभ्यता नहीं दिखती. सभ्य स्त्री वेश वे जनता के सामने ऐसे प्रस्तुत करते हैं कि उनका अनुकरण करने का मन करता है. कुछ-कुछ अवसरों पर श्री. नारायणराव का अनुकरण करने में स्त्रियों द्वारा औचित्य भंग किए जाने के दृष्टांत मिलते हैं, यह बात अलग है. संक्षेप में कहें तो श्री. नारायणराव महाराष्ट्र में अभिनय के मामले में आदर्श बन गए हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है. वैसे ही श्री. नारायणराव की प्राकृतिक आवाज भी इतनी मधुर है कि उसका वर्णन कैसे करें, यही समझ नहीं आता. रंगमंच पर उनकी सफलता का मुख्य कारण उनके शरीर की बनावट और प्राकृतिक आवाज, ये ही दो बड़े गुण हैं. रंगमंच पर श्री. नारायणराव जितने सुंदर अभिनेता स्त्री अभिनेताओं में नहीं हुए, ऐसा कहने में कोई आपत्ति नहीं है. उनकी काम करने की शैली, उनका हावभाव, उनकी सुंदरता, उनकी मधुर आवाज, इन सभी सुंदर चीजों का समावेश केवल एक ही व्यक्ति में, यानी श्री. नारायणराव में होने के कारण. श्री. नारायणराव कई बार निजी बातचीत में, सार्वजनिक व्याख्यानों में “मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ” ऐसा कहते रहते हैं, और एक बार श्री. नारायणराव यह बात स्वीकार करते हैं, फिर भी आजकल के रंगमंच पर स्त्री अभिनेताओं में उनके जितना सुंदर स्त्री अभिनेता अभी तक नहीं दिखता, यह निर्विवाद है. इससे यही सिद्ध होता है कि परमेश्वर ने उन्हें महाराष्ट्र रंगमंच पर स्त्री भूमिकाएं करने के लिए ही जन्म दिया है, इसमें कोई संदेह नहीं है.

गायन का मोहकपन

श्री. नारायणराव का संगीत गाना समझने वाले या न समझने वाले को भी मोहित करने वाला है. शास्त्रोक्त पद्धति से उनके गाने को देखने वाले को उनका गाना शास्त्रोक्त नहीं लगेगा; लेकिन मोहक है, यह स्वीकार करना पड़ेगा. श्री. नारायणराव जब गाने लगते हैं तो ऐसा लगता है कि उनका संगीत हमेशा चलता रहे. हम नाटक देखने आए हैं, यह दर्शक बिल्कुल भूल जाते हैं, इतना आकर्षक उनका गाना है. कुछ प्रसंग तो ऐसे आते हैं कि श्री. नारायणराव के गाने का अनुकरण अगर गवैया ने नहीं किया तो वह गवैया दर्शकों को पसंद ही नहीं आता. इस तरह से विचार करने पर श्री. नारायणराव के गाने का मोहक स्वरूप लोगों को मोहित कर लेता है; इसलिए प्रत्येक स्त्री-पुरुष उनके गाने का अनुकरण करने लगा है. उस अनुकरण से एक तरह से – संगीत विद्या के प्रचार की दृष्टि से विचार करने पर श्री. नारायणराव के गाने का अनुकरण छोटी लड़कियों और लड़कों द्वारा किए जाने से एक प्रकार से गाने की प्राथमिक शिक्षा की पद्धति समाप्त होती जा रही है. यह खेद के साथ कहना पड़ता है. किसी भी गायन समाज में कोई विद्यार्थी गाना या पेटी सीखने गया तो उसकी पहली शुरुआत श्री. नारायणराव के पद सीखने पर पड़ती है. विद्यार्थी कहेगा उसी के अनुसार सिखाया नहीं गया, तो विद्यार्थी के अभाव में समाज बंद होने की संभावना है, इसलिए सीखने आने वाला विद्यार्थी जो पद बताएगा, वही पद सिखाने के लिए समाज के संचालक तैयार हो जाते हैं.

इन सबका कारण श्री. नारायणराव के गाने का मोहकपन ही है, यह निर्विवाद सत्य है. श्री. नारायणराव के गाने से न समझने वाले को भी आनंद होता है; तो फिर संगीतज्ञ को आनंद क्यों नहीं होगा? भले ही वे गाते समय राग शुद्धता का ध्यान न रखते हों, फिर भी उनका गाना कर्णकटु बिल्कुल नहीं लगता. श्री. नारायणराव रंगमंच पर गाते समय प्रसंगानुकूल रस का परिपोषण हो, इसी तरह से गाते हैं.यह एक गंभीर स्थिति है. जब गाने के लिए किसी गंभीर रस के राग की योजना बनाई जाती है, तो वे उसमें गुंबरी, गजल पद्धति के रागों को कभी नहीं मिलाते. उदाहरण के तौर पर विद्याहरण नाटक का ही प्रसंग लिया जा सकता है. तीसरे अंक में जब शक्राचार्य ध्यानस्थ बैठे होते हैं, तब ‘आतां राग देई मना’ यह पद बागेश्री राग में गाया जाता है, और यदि उस पद को वन्समोअर मिलता है, तो बागेश्री राग जितना ही गंभीर राग मालकंस में वह पद फिर से गाया जाता है. उस जगह पर यदि पहाड़ी पिल, भैरवी राग जैसे राग मिलाए जाएं तो वह चलेगा ही नहीं. वहां गाने की विद्वत्ता दिखाने का कोई खास प्रसंग नहीं है. उस जगह पर यदि ऊपर लिखे अनुसार राग मिलाकर गाने की बैठक के अनुसार गाना शुरू किया जाए तो वह बिल्कुल अनुपयुक्त होगा. श्री नारायणराव इन सभी बातों पर विचार करके रंगमंच पर काम करते हैं. इसलिए उनके काम का उत्थान सभी दृष्टियों से उच्च ही होता है. उनके गाने में बिल्कुल भी छिछोरापन न होने के कारण उनका गाना भी वेशभूषा के समान ही प्रभावशाली लगता है.

गाने के प्राकृतिक गुण

श्री नारायणराव को आवाज की प्राकृतिक देन विशेष है. वे रंगमंच पर गाते समय कभी बेसुरा हुए, ऐसा याद भी नहीं आता. गाते समय अब आगे बेसुरा होने वाला है ऐसा सुनने वाले को लगता है; लेकिन गलती से भी बेसुरा नहीं होते. आवाज की मिठास तो विशेष ही है. स्त्रियों की आवाज स्वाभाविक रूप से मीठी होती ही है; लेकिन श्री नारायणराव की आवाज उस आवाज से अलग होकर उतनी ही मीठी, उतनी ही नाजुक, उतनी ही फिरने में हल्की ऐसी कुछ सबसे विशेष उनके आवाज में है ऐसा लगता है. उसका प्रत्यक्ष परिणाम उनका गाना सुनते समय अनुभव में आता ही है. उनके गाने में तान की स्वच्छता भी ऐसी ही है. तान लेते समय द्रुत गति से ली जाए तो भी उसकी स्वच्छता बिल्कुल कम नहीं होती. तान दूसरों की तरह द्रुत गति से गई ऐसा लगता तो है; लेकिन वह दूसरों जितनी द्रुत गति से नहीं जाती. द्रुत गति से तान नहीं जाती इसका एक ही कारण, और वह यह कि तान की स्वच्छता कम हो जाएगी इस डर से वे जल्दी तान लेने के झंझट में पड़ते ही नहीं. अन्य लोग तान स्वच्छ न आए तो भी चलेगा; लेकिन बहुत जल्दी तान ली इसी में उन्हें बड़ा भूषण लगता है. तथापि रंगमंच की दृष्टि से अथवा गाने की बैठक की दृष्टि से भी गाने में स्वच्छता होना बहुत आवश्यक है. अस्वच्छ ताना, चोरटा आवाज लगाना, पुरुष होकर स्त्रियों की तरह नाजुक गाना इस प्रकार का संगीत नए गवैयां को आजकल बहुत पसंद आने लगा है. मर्दाना गाना आजकल लोगों को बिल्कुल नापसंद हो गया है. आवाज बड़ी हो और ताना बोलते समय स्वच्छता से ली जाए तो दर्शकों की चीख सुनाई देती है. स्वच्छता आजकल गाने की बैठक में भी कम हो गई है. बहुत द्रुत गति से जाकर ताना पर ताना मारी जाए तो ही वह गाना लोगों को पसंद आता है. विलंबित गाना आजकल लुप्त होता जा रहा है: इसका भी काफी हद तक रंगमंच का संगीत ही कारण हो सकता है. गाने की बैठक में थोड़ी देर विलंबित गाना सुन लेंगे; लेकिन आगे नाटक के पसंदीदा पदों पर ही हमला होता है. ऐसा होते हुए भी गवैयां को अपनी श्रेष्ठता कायम रखने का प्रयास करना यानी गाने में स्वच्छता लाना बहुत जरूरी है. यह स्वच्छता स्वाभाविक रूप से ही श्री नारायणराव के संगीत में है. स्वाभाविक मीठी आवाज, तान की स्वच्छता, स्पष्ट शब्दोच्चार ये सभी गुण श्री नारायणराव के पास हैं.

गाने में पुनरावृत्ति

श्री नारायणराव के गाने में बहुत पुनरावृत्ति होती है ऐसा दर्शकों का उन पर एक आरोप है. लेकिन यह आरोप भी श्री नारायणराव ने अपने गाने के रस और गद्य के भाव से गलत साबित कर दिया है. श्री नारायणराव किसी पद की कौन सी पंक्ति बार-बार कही जाए तो चलेगी यह ढूंढ निकालने में बहुत माहिर हैं. ऐसा पालुपद ढूंढ निकालकर उसे विभिन्न स्वरों की बेलबूटी से रंगने से वह विशेष रूप से खिल उठता है और जिससे भावना का जो वातावरण तैयार होता है उसका भेद अच्छे-अच्छे मर्मज्ञ दर्शकों, गवैयां अथवा सामान्य दर्शकों को भी लगना असंभव है. पदों के किसी कडवे की पुनरावृत्ति कभी-कभी इतनी होती है कि उस कडवे से ऊब आए बिना नहीं रहती. “‘नाहीं मी बोलत नाथा’ यह कडवा आज सौ बार नाटक में कहा गया,” ऐसे आरोप दर्शकों से सुनने को मिलते हैं. कडवे की पुनरावृत्ति से पद काफी लंबा हो जाता है यह दर्शकों की शिकायत एक दृष्टि से बिल्कुल सही है ऐसा लगता है. पद काफी लंबा होने से नाटक का रस कम होता है, गाने की बैठक चल रही है ऐसा नाटक देखने आने वालों को लगना बिल्कुल स्वाभाविक ही है.मेरे जैसे संगीत के अध्येता लेखक को एक बार भी बोरियत महसूस नहीं होगी; लेकिन अन्य दर्शकों की स्थिति ऊपर लिखे अनुसार ही होगी, इसमें कोई संदेह नहीं है. स्वयंवर, एकच प्याला जैसे लोकप्रिय नाटक, साढ़े छह घंटे तक चलते हैं. इस वजह से नाटक खत्म होने में रात के 10-10.30 बज जाते हैं. नाटक में होने वाली देरी और उससे दर्शकों को होने वाली परेशानी श्री नारायणराव के गाने की वजह से ही होती है. गाना सुनते समय उठना तो संभव नहीं होता; लेकिन उस नाटक की वजह से आगे के सभी कार्यक्रम बिगड़ जाते हैं, इसलिए कुछ रसिक मंडली ने श्री नारायणराव से विनती करते हुए लेखक ने प्रत्यक्ष सुना है. “आपके नाटक में बहुत देर होती है, नाटक से उठकर भी जाया नहीं जा सकता. तो नाटक के समय ही अगर वहीं पर दर्शकों के भोजन की व्यवस्था हो जाए और कुर्सियां हटाकर वहीं पर गद्दे-गिरदे की व्यवस्था कर दी जाए तो इंतजार करते हुए बैठने से जो परेशानी होती है, वह तो नहीं होगी!” ऐसा भी मजाक में और प्यार से कई सज्जन मंडली श्री नारायणराव के साथ बात करते हुए प्रस्तुत लेखक ने सुना है. इससे एक ही बात सिद्ध होती है कि, दर्शकों का श्री नारायणराव पर बहुत प्रेम है; और इसीलिए ऐसे प्रेमपूर्ण निवेदन करने का दर्शक साहस करते हैं. श्री नारायणराव भी दर्शकों की इतनी अच्छी सेवा करते हैं कि, दर्शकों को भी ऐसा लगता है कि, बस, हमारे पैसे वसूल हो गए. लापरवाही कैसे करनी चाहिए, यह तो श्री नारायणराव को पता ही नहीं है. पुनरावृत्ति श्री नारायणराव ने कितनी भी की हो, फिर भी अन्य पुनरावृत्ति करने वाले नटों को दर्शक बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करते. ऐसा प्रसंग श्री नारायणराव पर कभी नहीं आया; ऐसा अभिमानपूर्वक कहने में कोई हर्ज नहीं है. श्री नारायणराव की आवाज बहुत बैठी हुई स्थिति में भी कसकर काम करने में उनसे कभी कोई लापरवाही नहीं हुई, इसलिए दर्शक उनकी आवाज बैठने की अनदेखी करते हैं. यह उन्होंने जबरदस्त पुण्याई अर्जित की है, इसलिए उनके काम के बारे में या पुनरावृत्ति के बारे में दर्शकों ने कितनी भी निंदा की हो, फिर भी अखबारों में या उनके पास आलोचना करने का साहस नहीं होता. इसका कारण उनकी रंगमंच पर निरपेक्ष सेवा है. श्री नारायणराव का अनुकरण अन्य नट भी करने लगे हैं. अनुकरण अच्छे का ही करना चाहिए, इसमें कोई संदेह नहीं है. लेकिन कितना अनुकरण हमें शोभा देगा, यह हर किसी को सोचना चाहिए: कुछ नटों ने उनके पदों में कडवों की पुनरावृत्ति करने का ही उठाया है. पुनरावृत्ति श्री नारायणराव को ही शोभा देगी; दूसरों ने अगर कडवों की पुनरावृत्ति की तो बहुत बोरियत होती है. इतना ही नहीं, बल्कि रसहीन, भावनाहीन और केवल गाने की बैठक की तरह रंगमंच पर गाने वाले नट रंगमंच पर न आएं तो बहुत अच्छा होगा, ऐसा दर्शकों को लगता है. पुनरावृत्ति करके भी बोरियत न आने देने की पुण्याई श्री नारायणराव ने ही अर्जित की है. दूसरों को वह पुण्याई नहीं मिलेगी, यह ध्यान में रखकर ही अन्य नटों को रंगमंच पर गाना चाहिए, यही श्रेयस्कर है.

रंगमंच पर गाना आसान होना चाहिए

रंगमंच पर गाना बिल्कुल आसान होना चाहिए, ऐसा श्री नारायणराव का बड़ा जोर है. राग और ताल भी आसान होना चाहिए, ऐसा उनका मत है. नाटक का संगीत नाटक का कोई मुख्य भाग खास नहीं है. गद्य भाग से जो रस या जो भावना उत्पन्न होती है, उसे संगीत का साथ देने से वह रस और वह भावना पुष्ट होती है, और इस वजह से गद्य भाग रंगमंच पर उत्तम रूप से प्रस्तुत किया गया हो, फिर भी संगीत से जो प्रभाव मन पर अंकित हो जाता है, वह गद्य से खास नहीं होता, यह बात निर्विवाद है, लेकिन संगीत नाटक भले ही हो, फिर भी गद्य भाग को ही अधिक महत्व है. संगीत को कभी भी प्राथमिकता नहीं मिलेगी. संगीत हमेशा द्वितीय ही रहेगा. संगीत का दूसरा नंबर तय होने के बाद चाल और ताल दोनों मोहक और आसान होने चाहिए. चाल मधुर होनी चाहिए. यानी काम करते समय गाने के समय ताल और स्वर पर ज्यादा ध्यान न देते हुए सहज गाया जा सके और ऐसी आसान चाल होने पर नाटक के चालू रस और भावना पर ध्यान देने में नट को बहुत आसानी होती है. चालें कठिन और ताल कठिन ऐसा जमने पर नाटक में रसोत्पत्ति करना बहुत कठिन पड़ता है, यह बात बिल्कुल सच है. तो श्री नारायणराव का आसान चाल और आसान ताल होना चाहिए, ऐसा जो जोर है, वह बिल्कुल सच है. श्री नारायणराव तो ताल के बारे में भी ऐसी ही सावधानी बरतते हैं. कहीं पर भी आड मात्रा से अगर पद शुरू हो, तो वे कभी भी उसे पसंद नहीं करते. सम से अथवा काल से शुरू हुई चाल वे पसंद करते हैं. किसी भी तरह से रंगमंच पर गाते समय स्वर और ताल की परेशानी न होते हुए जितना गाया जा सके, वही सच्चा रंगमंच का गाना है. नाटक के रस की दृष्टि से श्री नारायणराव का यह कहना बिल्कुल सही है.इस तरह का उनका विचार उन्हें आज तक जो अनुभव आया, उसी अनुभव से उन्होंने तय किया; इसमें कोई संदेह नहीं कि वह हमेशा सही है. रंगमंच के लिए ऐसे आसान गाने गाने की आदत पड़ने के बाद गाने की बैठक रंगमंच पर होना संभव नहीं है. रंगमंच पर गाने को रंगना ही एक लक्ष्य तय होने के बाद, संगीत का उठाव ऊपर लिखे अनुसार करना है, यह तय होने के बाद, रंगमंच के अलावा अन्य समय में श्री नारायणराव का गाना उतना सफल नहीं होता है. दर्शक उत्सुकता से श्री नारायणराव के गाने के जलसे सुनने जाते हैं. लेकिन ऊपर लिखे अनुसार ही दर्शक बोलते हुए सुनाई देते हैं. श्री नारायणराव को रंगमंच पर ही गाना चाहिए, जलसे आदि में नहीं गाना चाहिए, ऐसा ही सर्वत्र सुनने को मिलता है. गाने के जलसे में भी लोग नाटक के ही पद गाने को कहते हैं. लेकिन रंगमंच पर वे पद जितने अच्छे लगते हैं, उतने बैठक में नहीं लगते. इन सभी बातों पर विचार करने पर, श्री नारायणराव रंगमंच पर सेनापति की तरह अपने तेज से चमकते हैं; लेकिन गाने की बैठक में बिल्कुल नहीं चमकते. बैठक के गाने में योद्धा रंगमंच पर उनके सामने फीके पड़ते हैं, ऐसा सर्वत्र अनुभव है. रंगमंच पर उनका गाना बिल्कुल आसान लगता है, इसलिए हर घर में उनका पद गाने या बजाने की प्रवृत्ति दिखाई देती है. इसका कारण भी उनका आसान गाना ही है. सुनने वाले दर्शकों को उनका गाना स्वच्छ और आसान सुनने को मिलता है. लेकिन जब कोई वास्तव में वह गाना गाने लगता है, तब बाद में पता चलता है कि वह आसान है या कठिन है. श्री नारायणराव का गाना न तो बहुत आसान है और न ही बहुत कठिन है. अत्यंत मधुर अवश्य है. इसलिए आसान गाना है ऐसा मानकर दूसरे नकल करने लगते हैं. लेकिन वह नकल नहीं होती, बल्कि कुछ और ही अजीब होता है. कुछ लोगों ने उनके आसान गानों की नकल की हुई सुनने को मिलती है.

राग, ताल और संगत का आनंद

श्री नारायणराव गाते समय राग का वातावरण बनाए रखने का पूरा प्रयास करते हैं. उसी तरह ताल के मामले में भी ऐसा ही है. अपनी कंपनी में तालीम शुरू होने पर श्री नारायणराव हर नट को यही बताते हैं कि पद का हर कडवा सीधे ताल में आना चाहिए. उसमें गाते समय यदि कोई तान, मुरकी या मीड लेनी हो, तो भी वह कडवा ताल में आने पर उनका विशेष ध्यान रहता है. गाने की बैठक में, जैसे चिजे का मुखड़ा गाते समय एक बार जैसे-तैसे चिजे के मुखड़े पर आकर ताल में पड़ना, वैसा रंगमंच पर नहीं चलेगा. ऐसा वे हमेशा कहते रहते हैं. हर कडवा स्वरबद्ध, तालबद्ध और भावनापूर्ण ही आना चाहिए, यह सच है. लेकिन आजकल के गायकों को रस और भावना क्या चीज है, यह समझ में ही नहीं आता. अथवा कोई समझाए भी तो समझने की उनकी इच्छा ही नहीं होती. गायक ऐसा कहता है कि, पद का अर्थ, भावना और रस हमें किसलिए चाहिए? बस गाने की तैयारी, तानों की तैयारी और टेढ़े-मेढ़े स्वरों की कसरत हो गई तो हो गया. पद का अर्थ आदि बातें हमारे गाने में नहीं लगतीं और हमें उनकी जरूरत भी नहीं है. श्री गोविंदराव टेंबे ने “गायिका गोहरजान” इस लेख में इस संबंध में काफी विचार किया है. उसमें उन्होंने भी गोहरजान का वर्णन करते हुए यही बताया है. गोहरजान के हर गाने के पद में, चिजे में, तान में, गजल में भावना होने के कारण ही उनका गाना बहुत मोहक और मन को छूने वाला होता था. तो क्या आजकल के गायकों को यह विचार नहीं करना चाहिए? पद किसी भी भाषा का हो. उस पद में अर्थ होना चाहिए और उस पद का अर्थ भावना और रस से गायक को दर्शकों के मन पर बिठाने का प्रयास करना चाहिए. गायक गाते समय यदि आंखें बंद करके गाने लगे तो वह दर्शकों पर क्या प्रभाव डाल पाएगा?

नाटकों में उतनी भावना होनी चाहिए और गाने में भावना न हो तो चलेगा क्या? तो भावनाहीन गायक होने से दर्शक भी उसी तरह के होने लगे हैं. पद नाटक का हो या कोई भी हो. मराठी हो या हिंदी हो, भावना अवश्य होनी चाहिए, यदि वह न हो तो वह गाना व्यर्थ है, यह बिल्कुल सच बात है. श्री टेंबे ने गायिका गोहरजान का वर्णन करते हुए ऊपर लिखे अनुसार ही लिखा है. और उस अनुसार (श्री टेंबे द्वारा लिखे अनुसार) वास्तव में आजकल के गायक यदि भावनापूर्ण गाने लगेंगे तो वास्तव में संगीत विद्या आजकल से ज्यादा श्रेष्ठ पद पर चढ़े बिना नहीं रहेगी, संगीत विद्या का पतन समाप्त हो जाएगा और संगीत विद्या के मेरे जैसे अभ्यासी को भी नए तरीके से संगीत विद्या का ज्ञान हुए बिना नहीं रहेगा. भावनापूर्ण गाने का परिणाम दर्शकों पर बहुत होता है; लेकिन ऐसे समझने वाले दर्शक बहुत कम देखने को मिलते हैं.तान की सरबत्ती ही दर्शकों को बहुत पसंद आती है! उसके आगे गानों की भावना गायब हो जाए तो भी चलेगा, लेकिन तान-तैयारी का गाना चाहिए. इस तरह का प्रकार आजकल रंगमंच पर तेज़ी से बढ़ता जा रहा है; लेकिन श्री. नारायणराव ने अपने रंगमंच पर ऐसा प्रसंग आज तक आने नहीं दिया, यह उनके लिए गर्व की बात है, इसमें कोई संदेह नहीं है. उन्होंने राग और ताल का संबंध कैसे रखा है, यह ऊपर लिखा ही है. उसी तरह सारंगी का साथ भी नाटक को बहुत आकर्षक बना देता है. सारंगी जैसे अत्यंत मधुर वाद्य को समाज ने अपने से बाहर निकाल दिया था; लेकिन उस वाद्य की श्रेष्ठता श्री. नारायणराव ने फिर से मूल स्थान पर ला दी है. सारंगी और ऑर्गन इन वाद्यों का मेल बहुत ही मधुर है. ऑर्गन की आवाज़ बहुत मधुर और गंभीर है. हारमोनियम बहुत कठोर लगता है; लेकिन साथ में बाजे की पेटी से ऑर्गन का साथ ज़्यादा दमदार लगता है. ऑर्गन में एक प्रकार की केवल गंभीरता है. गाने वाले के लिए वह गंभीरता बहुत पोषक होती है, लेकिन ऑर्गन में जो जव्हारी चाहिए वह उसमें नहीं है. वह जव्हारी सारंगी में है. सारंगी के निचले तारों से विभिन्न नाद उत्पन्न होकर जो स्वरों का आंदोलन उत्पन्न होता है, वह सुनने में बहुत ही मधुर लगता है. ऑर्गन और सारंगी का एकीकरण इतनी उत्तम तरह से होता है कि उसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता. ऐसे दो मधुर वाद्यों का साथ श्री. नारायणराव ने गंधर्व कंपनी के रंगमंच से जोड़ा, यह उनके दर्शकों को मोहित करने वाली बातों में से एक महत्वपूर्ण बात है. ऐसे मधुर वाद्यों का साथ श्री. नारायणराव की आवाज़ से इतना घुलमिल जाता है कि सारंगी-ऑर्गन और श्री. नारायणराव एक ही होकर गा रहे हैं, ऐसा आभास होता है. सारंगी के विद्वान कादरबख्शखां तो श्री. नारायणराव का साथ इतनी बेमालूम करते हैं कि सारंगी अलग बज रही है, ऐसा लगने ही नहीं देते. दोनों को निखारने वाले एक सज्जन तबला वादनपटु मे. अहमदजान उर्फ तिरकवाखांसाहेब भी उस साथ में आनंद की भरमार बहुत ज़्यादा डालते हैं. तबला, सारंगी और ऑर्गन ये तीनों वाद्य गाने के साथ शुरू होते हैं तो सुनने वाले पर मोहिनी ही पड़ जाती है, ऐसा अनुभव है. ऐसे कलावान लोगों का साथ श्री. नारायणराव ने अपनी कंपनी के लिए रखने से गंधर्व कंपनी के वैभव में और वृद्धि ही हो रही है, इसमें कोई संदेह नहीं है. इस तरह का साथ का आनंद अन्य किसी नाटक मंडली में सुनने को नहीं मिलता. इसलिए साथ के मामले में भी श्री. नारायणराव ने अपनी कंपनी की श्रेष्ठता दर्शकों को अच्छी तरह से समझा दी है.

उनके पसंदीदा राग और रस

श्री. नारायणराव लगभग सभी राग गाते हैं. उनमें से उनके पसंदीदा राग वे ज़्यादा अच्छे गाते हैं. भूप, बिहाग, बागेश्री, तिलककामोद, भैरवी, जोगी, कालिंगडा, जंगला, पिल्, भीमपलास, काफी, पहाड़ी, वगैरह राग उनके बहुत पसंदीदा हैं. ऊपर लिखे रागों के अलावा अन्य राग भी वे अच्छे गाते हैं; लेकिन ऊपर लिखे राग वे ज़्यादा सफाई से और बेछुट गाते हैं. भूप, बिहाग, बागेश्री, तिलककामोद, भीमपलास, वगैरह श्रृंगारिक राग गाते समय श्री. नारायणराव इतने मोहक गाते हैं कि उसका वर्णन जितना भी किया जाए, उतना कम है. श्रृंगार रस यानी श्री. नारायणराव की आत्मा ही है. सात्विक श्रृंगार यह भी श्री. नारायणराव का नैसर्गिक गुण है. उस गुण को पोषक ऐसा श्रृंगारिक गाना उस सात्विक श्रृंगार को और भी निखार देता है. उसी तरह करुण रस यह भी उनका हाथखंडा ही है. कालिगडा, जोगी, ये राग करुण रस के प्रसंगों में श्री. नारायणराव इतने परिणामकारक गाते हैं कि उसका परिणाम दर्शकों के मन पर कई दिनों तक कायम रहता है. श्री. नारायणराव श्रृंगार या करुण रस नाटक में संगीत की दृष्टि से इतना रंगते हैं कि श्रृंगार की या करुण रस की प्रत्यक्ष मूर्ति ही रंगमंच पर अवतरित हुई है, ऐसा श्रोताओं को लगता है. इस प्रकार से श्रृंगार या करुण रस आजकल की संगीत मंडलियों में तो गाने की दृष्टि से निभाया हुआ प्रस्तुत लेखक के देखने में नहीं आया है. श्री. नारायणराव यह उनके पसंदीदा राग, और रागों को जमने वाले रस का पूर्ण विचार करके ही गाते हैं, ऐसा सर्वत्र अनुभव है. नए उभरते संगीत नटों को राग और रस का एकीकरण कैसे करना चाहिए, इसकी शिक्षा लेनी हो तो श्री. नारायणराव के रंगमंच पर के काम का ही प्रत्यक्ष अभ्यास करना चाहिए. श्री. नारायणराव काम करते समय ऊपर लिखे अनुसार उन-उन रागों में और रसों में कैसे तादात्म्य प्राप्त करते हैं, यह सभी को पता है. तब उनके विभिन्न रसों के काम देखकर ऊपर लिखी बातों की प्रतीति ज़रूर देखनी चाहिए.

रंगमंच का संगीत शास्त्रीय नहीं होना चाहिए क्या ?

श्री. नारायणराव के संगीत के संबंध में मैंने अपनी अल्पमति के अनुसार संक्षेप में लिखने का प्रयास किया है. श्री. नारायणराव के रंगमंच के संगीत के संबंध में लिखने की मेरी योग्यता नहीं है. मुझसे बेहतर संगीत के दिग्गजों ने अगर उनके संगीत के गुण-दोषों का विवेचन किया होता तो उचित होता. मैं संगीत विद्या का अध्येता होने के नाते किसी भी तरह से संगीत विद्या की श्रेष्ठता बनी रहे, यही लेखक की इच्छा है. इसमें श्री. नारायणराव के गुणों की प्रशंसा के साथ-साथ अन्य संगीत विशेषज्ञों से भी अपने गायन में सुधार करने पर ध्यान देने के लिए मेरा सविनय निवेदन है. रंगमंच का संगीत पूर्ण शास्त्रीय न हो तो भी चलेगा. किसी राग में दूसरे राग का मिश्रण करना रंगमंच पर चलता है, ऐसा कहने वाला एक पक्ष है, ऐसा कहना गलत है, ऐसा पूर्ण विचार के बाद मेरा मत हुआ है. यह मेरा मत गलत साबित होने की संभावना है. लेकिन मैं अपने विचार पाठकों के सामने रखने का प्रयास कर रहा हूँ. पाठकों से अनुरोध है कि वे इस पर अवश्य विचार करें. नाटकों के प्रसंग के अनुसार ही संगीत नाटक में धुनें डाली जाती हैं. फिर जो धुन प्रसंग के अनुसार डाली गई, उसका राग तय होता है. फिर जो राग तय हुआ, उस राग में दूसरे राग का मिश्रण करने का क्या कारण है? उदाहरण के लिए, स्वयंवर नाटक का ‘मम सुखाची ठेव देवा’ यही पद लिया जाए तो भी चलेगा. यह पद शुरू करने से पहले रुक्मिणी को उसका पिता बताकर जाता है कि, ‘महालक्ष्मी का एक-दो घंटे पूजन-मनन कर’. इस वाक्य के अर्थ से देखा जाए तो यह पद पूर्ण भक्तिरस का है. भक्तिरस के लिए उपयुक्त यह राग तिलकामोद है. धुन भी उतनी ही गंभीर और भक्तिरस के लिए उपयुक्त है. ऐसे प्रसंग में तिलककामोद शुद्ध शास्त्र पद्धति से उसके वर्जावर्ज का ध्यान रखकर अगर गाया जाएगा तो किसी भी तरह से वहाँ रस बिगड़ता नहीं है. फिर ऐसे प्रसंग में राग को शुद्ध न रखकर कैसे भी मिश्रण चलेगा, ऐसा मुझे नहीं लगता. यह पद श्री. नारायणराव उत्तम तरीके से पहले गाते थे और अभी भी गाते हैं; लेकिन अन्य कंपनियों के नाटक देखते समय मनचाहा राग मनचाहे राग में मिश्रित कला सुनने को मिलती है. तिलककामोद जैसा गंभीर और शांत राग, लेकिन ऐसे राग में भैरवी, पहाड़ी, आदि अनावश्यक रूप से मिश्रित किए गए राग प्रत्यक्ष लेखक ने सुने हैं. सच में देखा जाए तो प्रसंग के लिए उपयुक्त धुन होते हुए भी अगर वहाँ ऐसी छिछोरी हरकत की जाए तो संगीत विद्या की हानि ही होगी! अगर राग में राग मिश्रित करने का सिलसिला लगातार सुनने को मिलने लगे तो ऐसा लगता है कि, एक बार नाटक में संगीत न हो तो भी चलेगा; लेकिन यह प्रसंग नहीं चाहिए. क्योंकि बिना कारण राग मिश्रित करना शुरू करने पर गद्य के अभिमानी संगीत का उपहास करते हैं, ऐसा अनुभव है. संगीत से अगर नाटक की रसहानि हो रही हो तो नाटक में संगीत न होना ही बेहतर है, ऐसा लोगों का मत सुनने को मिलता है. संगीत न होना ही बेहतर है, ऐसा लोगों का मत सुनने को मिलता है. संगीत शास्त्रशुद्ध, सरल और थोड़ा ऐसा होगा तो उस संगीत का नाटक को उपयोग होगा, नहीं तो नहीं होगा. गद्य को संगीत पोषक होगा तभी उसका उपयोग. जैसे गद्य में वीर, करुण, गंभीर, श्रृंगार आदि नवरस हैं, उसी प्रकार संगीतशास्त्रकारों ने भी नवरस के राग खोजकर रखे हैं. फिर उन-उन रस के राग उचित स्थान पर डालकर जिस स्वर से जो रस उत्पन्न होता है, वह रस. संगीत नटों या गायकों को शास्त्रीय पद्धति न छोड़कर उन स्वरों को उत्तम तरीके से लगाकर उत्पन्न करना चाहिए. आजकल बहुत से नाटकों में मनचाहा राग मनचाहे स्थान पर डाला हुआ देखने को मिलता है. इस तरह से संगीत का अगर दुरुपयोग होने लगे तो संगीत नट या गायक को दर्शकों को नाम क्यों नहीं रखने चाहिए? प्रस्तुत लेखक को पूरा विश्वास है कि, इस तरह से अगर शास्त्रशुद्ध पद्धति से राग गाया जाएगा तो उसमें दूसरे राग मिश्रित करने का प्रसंग ही नहीं आएगा. दूसरा, नाटक के समय के अनुसार अगर रागों की व्यवस्था करने का रिवाज आगे पड़ेगा तो बहुत अच्छा होगा, ऐसा मुझे लगता है.

संक्षेप में सिंहावलोकन

श्री. नारायणराव के संगीत के संबंध में जितना लिखा जाए उतना कम है. पिछले पच्चीस वर्षों में उन्होंने संगीत विद्या का जो साधन किया, उसका आज प्रत्यक्ष फल श्री. नारायणराव भोग रहे हैं. उनके प्रति संगीत विद्या के संबंध में जो आदर है और पिछले पच्चीस वर्षों से संगीत विद्या की जो सेवा उन्होंने की है. उस सेवा के कारण उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई है कि, श्री. नारायणराव बच्चों से लेकर बूढ़ों तक के अत्यंत प्रिय हो गए हैं. उनके अन्य गुणों की मैंने चिकित्सा नहीं की है. इस लेख में मैंने केवल संगीत के संबंध में ही विचार किया है. श्री. नारायणराव नटसम्राट बनने के लिए आवश्यक प्राकृतिक गुणों का भंडार ईश्वरीय कृपा से उन्हें भरपूर प्राप्त हुआ है, उनकी आवाज,शरीरयष्टि और स्वरूप के कारण महाराष्ट्र रंगमंच उच्चता के शिखर पर पहुँच गया है. संगीत के संबंध में जो विचार मैंने पाठकों के सामने रखे हैं, उन पर अन्य अभिनेताओं को भी अवश्य विचार करना चाहिए. श्री नारायणराव जैसे प्राकृतिक गुण भले ही अन्य अभिनेताओं के पास न हों, फिर भी उन्हें उन गुणों को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए. सब कुछ प्राकृतिक चीज़ों पर निर्भर नहीं करता है. प्राकृतिक रूप से प्रतिभाशाली लोगों को भी प्रयास करना पड़ता है. मुझे पता है कि मेरे लेखन का दुरुपयोग नहीं होगा, इसलिए मैंने लिखने का साहस किया है. प्रस्तुत लेखक को लिखने की ज़्यादा आदत न होने के कारण कुछ गलतियाँ भी हुई होंगी, बल्कि हुई हैं; लेकिन श्री अप्पासाहेब गोखले ने मुझे लेख लिखने के लिए मजबूर किया है, इसलिए मैंने इस लेखन कार्य को कुछ हद तक पूरा करने का प्रयास किया है. अंत में यही लिखना है कि, श्री नारायणराव जैसे अन्य अभिनेताओं के भी गुणगान संबंधी अंक निकालने के अवसर आगे भी हमेशा आते रहें और महाराष्ट्र रंगमंच की श्रेष्ठता उत्तरोत्तर इसी तरह बढ़ती रहे, यही श्रीरामप्रभु से प्रार्थना करके मैं यह लेख समाप्त करता हूँ.

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