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बालगंधर्व, सांस्कृतिक साम्राज्य के स्वामी

मित्रों ! आज मैं एक बड़ी दुविधा में हूँ. क्योंकि अगर किसी व्यक्ति से कहा जाए कि, तुम चाँदनी पर बोलो तो वह कितना भी बड़ा कवि क्यों न हो, उसे तुरंत चाँदनी पर क्या बोलना है यह सूझेगा नहीं. समुद्र पर क्या बोलना है यह सूझेगा नहीं. वही अवस्था बालगंधर्वों पर बोलते समय होती है. जिन्होंने महाराष्ट्र में सांस्कृतिक साम्राज्य स्थापित किया, उस सम्राट के बारे में नमन करने के अलावा क्या बोलूँ यह मुझे समझ नहीं आता… महाराष्ट्र में अगर कोई किसी का मित्र बनना चाहता है तो उसे कुछ कसौटियों पर खरा उतरना पड़ता है. उनमें से पहली कसौटी यह है कि, उसकी शिवाजी महाराज पर अगाध श्रद्धा होनी चाहिए. उसकी उतनी ही अगाध श्रद्धा बाल गंगाधर तिलक पर होनी चाहिए और उतनी ही अगाध श्रद्धा बालगंधर्वों पर होनी चाहिए. इन तीनों ने महाराष्ट्र पर सदियों तक राज किया है. एक सदी बीत जाने के बाद भी बालगंधर्वों पर यह कार्यक्रम देखते हुए कैसे सभी भावुक हो गए हैं यह हमने देखा, मैं खुद भी भावुक हो गया. क्योंकि बालगंधर्व कहते ही मंत्रोच्चार जैसी अवस्था हो जाती है. और हम एक युग में प्रवेश कर जाते हैं. युगप्रवर्तक यह शब्द बहुत घिस चुका है. परंतु युगप्रवर्तक ऐसा सही अर्थों में जिन्हें कहना चाहिए ऐसे लोग युगों में कभी-कभी ही होते हैं. बालगंधर्व सौभाग्य से उनमें से एक थे. ऐसे एक क्षेत्र में हुए जहाँ केवल आनंद का आदान-प्रदान था. उन्होंने इस आनंद का आदान-प्रदान इतनी बड़ी मात्रा में किया कि, बालगंधर्व कहते ही जिन्होंने उन्हें प्रत्यक्ष देखा है उन्हें तो आनंद का क्या अनुभव होता होगा यह बताया नहीं जा सकता. लेकिन जिन्होंने उन्हें देखा नहीं है लेकिन उन्हें सुना है और उन्हें सुनते समय अगर गाने की समझ हो तो उन्हें बालगंधर्व कितने महान थे इसका अंदाजा हुए बिना नहीं रहेगा. कुछ बच्चे मुझसे बोले कि आप हमेशा बालगंधर्व बालगंधर्व कहते रहते हैं, उनमें ऐसी क्या महानता थी? मेरे पास उसका उत्तर नहीं है. लेकिन उपमा से उन्हें बताना हो तो मैं उनसे पूछूँगा, यह गुलाब का फूल है इसमें क्या महानता है? परंतु अगर उसकी खोज करते जाएँ तो हमें ऐसा दिखता है कि, बालगंधर्वों ने रंगमंच पर जो सबसे बड़ी जीत हासिल की वह एक विलक्षण भक्ति से हासिल की. भक्ति ही बालगंधर्व के जीवन का स्थायी भाव है ऐसा ही मुझे लगता है. वे रंगमंच पर भी भक्ति से ही आए. मुझे तो नहीं लगता कि बालगंधर्वों ने सिंधु का काम करने से पहले समीक्षकों से साहित्यिक चर्चा आदि की होगी! उन्होंने ऐसा नहीं किया इसलिए उनकी भूमिका इतनी अच्छी हुई यह बात छोड़ दीजिए!! उन्हें वह सिंधु दिखते ही पढ़ते-पढ़ते वे सिंधुमय हो गए और सिंधुमयता उन्होंने हमारे सामने रखी. और उसे रखते समय भी किसी को वह पसंद आए या न आए इस दृष्टि से नहीं रखा. वे कुछ और कर ही नहीं सकते थे. कुछ सिद्ध करने के लिए बालगंधर्वों ने रंगमंच पर कुछ भी नहीं किया. वे विचरण करते थे और ऐसा कहा गया है न कि, जिनकी भक्ति में नीति दिखती है. इसलिए उनकी रंगमंच की भक्ति में हमें उत्तम गायन दिखा, उत्तम अभिनय दिखा और वह दिखे इसलिए प्रकृति ने जो रूप देकर भेजा था उस रूप का भी आनंद हमें देखते-देखते मिला.

इस प्रकार का एक चमत्कार मराठी सांस्कृतिक जीवन में हुआ कहने में कोई हर्ज नहीं है. ऐसे राज करने वाले अभिनेता वास्तव में युगों में कभी-कभी ही आते हैं. लोकप्रियता बहुत मिलती है, लोग बहुत पॉपुलर होते हैं परंतु उसे भी एक प्रकार की Quality of popularity कहा गया है. लोकप्रियता का एक स्तर होता है. अनेक चीजें लोकप्रिय होती हैं. उस लोकप्रियता का कोई अर्थ नहीं होता. जिस लोकप्रियता से उस व्यक्ति को लोकप्रिय कहने से और वह लोकप्रियता हमें समझ आने से हमें धन्यता महसूस होती है वह लोकप्रियता महत्वपूर्ण होती है. जो आनंद हम चार लोगों में आनंद से बता सकते हैं वह सच्चा आनंद. कोई वाहियात बात सुनने के बाद हम खिलखिलाकर हँसते भी हैं परंतु उसे फिर चार लोगों में जाकर बताने की कोई इच्छा हमारे मन में नहीं आती. क्योंकि दूसरे ही क्षण हमें हँसने पर खुद पर ही शर्म महसूस होती है. यह बात अलग है. परंतु इस प्रकार का कुछ घटित होता है कि, जो अनुभव कितना बताऊँ और कितना नहीं ऐसा हमें होता है. इस प्रकार का अनुभव जैसे शिवाजी महाराज के चरित्र से मिलता है, बाल गंगाधर तिलक के चरित्र से मिलता है वैसा ही अनुभव, आनंद बालगंधर्व इस विषय ने हमें दिया है. गंधर्वों के बारे में बात करना शुरू करने के बाद रुकने की जरूरत महसूस नहीं होती. और अगर वह हमारे जैसा ही बालगंधर्व भक्त हो तो विट्ठल की भक्ति में लीन जैसे दो वारकरी हों वैसा वहाँ समय, काल, घड़ी का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता.

इतनी बार बोलने के बावजूद भी अभी जो बोलना है वह बोला ही नहीं गया ऐसा जिन लोगों के बारे में लगता है उनमें बालगंधर्व हैं. उनकी सबसे बड़ी मोहिनी गाने की है इसमें कोई शक नहीं. उनके गाने का कई लोग एनालिसिस करने बैठे और ‘नेति नेति’ कहकर ही रुक गए. हमें…. कुछ लोगों को पता होगा कि, गाने के कोई भी नियम, कायदे, शास्त्र इसमें से इस आदमी को कुछ भी पता नहीं था. मुझे याद है एक प्रसंग. कोल्हापुर में कॉन्फ्रेंस में वे गा रहे थे. किसी ने चिट्ठी भेजी कि ‘रूपक’ में से कुछ तो कहो. लेकिन वहां चल रहा था अलग ठेके का गाना. ऐसी चिट्ठियां भेजने वालों को हम कुछ विरस वगैरह कर रहे हैं इसकी भावना ही नहीं होती. उसने भेज दी चिट्ठी. अब चिट्ठी पढ़ने के लिए वहां…. मतलब बालगंधर्व के बाईं ओर तिरखवां साहब बैठे थे, वे मतलब क्या ज्ञानदेव ही! क्योंकि उंगलियों का उपयोग तबले के अलावा किसी और चीज के लिए करना होता है यह उन्हें पता ही नहीं था. उन्हें कुछ लिखना आता ही नहीं था! हस्ताक्षर कैसे भी करते थे. एक बार किसी ने उनसे कहा कि खाँ साहब सही-वही करो. वे बोले ‘किस लिए?’ तो वह बोला ‘दस्तखत करना अच्छा है.’ ‘क्यूं अच्छा है?’ खाँ साहब दुनिया बोले दस्तखत करती है. उस पर खाँ साहब बोले हां बेटा दुनिया दस्तखत करती है लेकिन तबला अकेला अहमदजान तिरखवां ही बजाता है! इसमें एक दो मिनट गए. नारायणराव ने चिट्ठी पढ़ी. खाँ साहब बोले क्या है? रूपक में से कुछ सुनना है उसे. मुझे पता है कि, उस आदमी को ‘मम सुखाची ठेव देवा’ सुनना था. और उन्होंने जो शुरुआत की थी वह ‘यदुमानी सदनाला!’ उसका ठेका निराला है. यह हम में से ज्यादातर को पता ही है. अब खाँ साहब क्या विद्वान ही थे. वे बोले ‘अरे इसीकोही रूपक बना दो.’ ‘यदुमानी सदना’ उसके बाद चुटकियों से हिसाब किया और ‘यदुमानी सदना’ रूपक में गाए. यह चमत्कार है. उसके बाद जगन्नाथ बुवा जैसे आदमी ने जाकर उनके पैर पकड़े… बोले क्या किया आपने यह! अगर गणितज्ञ आदमी को या शास्त्र के आदमी को पूछा होता तो वह हड़बड़ा ही जाता. अहो 16 मात्राओं का हिसाब कहां और 7 मात्राओं का हिसाब कहां? अपना कितना भी गणित कच्चा हो तो भी 7 और 16 का भागाकार नहीं होता इतना समझ में आने में कोई दिक्कत नहीं.

जहां मेरे समझ में आया वहां आपको समझ में आने में क्या दिक्कत है? लेकिन वह उन्होंने वहीं के वहीं करके दिखाया. चाल बदली नहीं कुछ नहीं. और वैसे के वैसे ‘यदुमनी सदना’ प्रस्तुत किया. ‘यदुमनी सदना’ के साथ खाँ साहब ने भी ‘रूपक’ क्या बजाया बताऊं आपको? यह जब होता है तब मुझे लगता है आते ही गले से सुर लेकर ही आना पड़ता है. मैं वैसा कुछ देवभक्त वगैरह नहीं हूं. लेकिन कुछ कुछ जगहों पर यह क्यों हुआ यह हमें पता नहीं चलता और हम अवाक हो जाते हैं. इस आदमी को यह पता चला. कहां? इन्हें बिहाग, भीमपलास, बागेश्री इस रीति से भास्करबुवा ने बताया नहीं… ऐसा नारायण गाना, वैसा गाना शुरू किया. और जो गाए वह बागेश्री हुई, जो गाए वह भीमपलास हुआ. जो गाए वह पहाड़ी हुआ. और ऐसे गाए कि उस पर उन्होंने खुद की मुहर बनाई. मतलब भीमपलास सारी दुनिया गा रही थी. लेकिन बालगंधर्व ने भीमपलास गाना शुरू करने पर वही मराठी स्त्री बालगंधर्व के वेश में जैसी निराली दिखने लगी, वैसा वही भीमपलास बालगंधर्व के गले से निराला दिखने लगा. मतलब वह वेश करने के बाद कितने मराठी रामभाऊओं को अपनी सीतामाई इतनी अच्छी दिखती थी क्या ऐसा जैसा आश्चर्य लगेगा वैसे ही यह भीमपलास इतना सुंदर हो सकता है क्या? ऐसा प्रश्न उस समय ‘मैं’ ‘मैं’ कहने वाले गाने वालों को पड़ा था. हमें वह प्रसिद्ध बात पता है कि, शुद्ध निषाद भीमपलास को लगाते ही खुद अल्लादिया खाँ साहब ने दाद दी कि, “नारायण बेटा क्या बात है!” अहो दूसरों ने तो खून की सजा दी होती यह अपस्वर लगाने के बारे में! फिर भी किसी ने जाकर खाँ साहब को पूछा कि, खाँ साहब उसने तो शुद्ध निषाद लगाया है. आपने दाद कैसे दी? “अरे उसके जैसा तू लगाकर दिखा तुझे भी दाद दूंगा.” कौन निषाद लगाता है यह प्रश्न है.

आज बालगंधर्व के गीत गाते हुए सबको सुनता हूं. बहुत सुनता हूं. परंतु बालगंधर्व का उसमें का तत्व जो कुछ है यह उनके मन में घुसा है ऐसे बहुत कम लोग दिखेंगे. बालगंधर्व की गायकी के बारे में मुझे तो ऐसा कहना है कि, हमारे भारतीय संगीत में चार बानियां हैं. डागोर बानी, उसके बाद गौड़ी बानी, बाद में खंडहार बानी, नवहार बानी इस प्रकार की चार बानी मतलब styles, चार स्कूल्स हैं. मुझे तो ऐसा लगता है कि, कई साल बाद एक नई बानी उसमें डालनी चाहिए और वह मतलब बालगंधर्व बानी. उनके ‘यमन’ और अब तक गले से निकले यमन में क्या फर्क होता है और उसमें क्या सौंदर्य पैदा होता है, यह सचमुच बताना संभव नहीं है. इसका कारण यह है कि, गाना शुरू… मुझे तो यकीन है कि, भास्करबुवा उन्हें तालीम देते समय इस स्वर का प्राण कहाँ है, यह उनके बराबर समझ में आता होगा. इसके बिना उन्होंने वह नहीं किया है. साधारण-साधारण धुनें. अभी हमने देखा कि, ‘कशी या त्यजू पदाला’ की original धुन है ‘दिल बेकरार तूने!’ ‘दिल बेकरार तूने’ सुना और उसके बाद आपने ‘कशी या त्यजू पदाला’ सुना तो हिसाब से देखा जाए तो लगभग वही स्वर हैं. लेकिन गंधर्वों के गले से आने के बाद उसकी माया ही निराली, दुनिया ही निराली हो गई. और यह जिन्हें समझ में नहीं आया, उन्होंने उनकी तानों की नकल उत्तम की, उनकी नकल उत्तम की. नकल करना यह सामान्य व्यक्ति द्वारा असामान्य व्यक्ति को दिया गया मुजरा होता है, इसमें कोई संदेह नहीं. परंतु नकल करते समय उसका प्राण कहाँ है, यह ध्यान में आना चाहिए. अब ‘नरवर कृष्णा समान’ परसों मैं किसी का सुन रहा था. क्या सुन रहा था, पूछो मत. क्योंकि उसके बाद खबरें थीं इसलिए मैंने उसे चालू रखा था. तो ‘नरवर कृष्णा समान’ मेरे एकदम आँखों के सामने खड़ा हो गया कि, ‘नरवर कृष्णा समान’ यह पुकारा क्या जाता था उस थिएटर में और मुझे अभी भी याद है, बताते हुए याद है कि, ऐसे मोहम्मद हुसैन खाँ साहब यहाँ आए हुए हैं. उनके तीर्थरूप यहाँ बैठे हुए हैं. तिरखवाँ साहब बैठे हुए हैं, बीच में ऑर्गन पर केशवराव कांबळे बैठे हुए हैं और ‘नरवर कृष्णा समान’ पर षड्ज लगा और सारंगी का झमझमा हुआ कि मैं आपको बताता हूँ कि, कृष्ण जैसा कोई नहीं ऐसा बताने वाली स्वरों की पताका ऊपर आई है, ऐसा लगा. यह तेज जो उन स्वरों में था, यह सिर्फ ‘नरवर कृष्णा समान’ इतना ऊँची आवाज में चिल्लाकर कैसे आने वाला है? और उसमें तिहाई कर रही थी वह लड़की.

सचमुच बताता हूँ आपको कि, मेरी जन्मशताब्दी आप मत मनाओ. ऐसा मैं सार्वजनिक रूप से कहने वाला हूँ. बेशक मुझमें गाने का हिस्सा न होने के कारण उसकी कोई चिंता नहीं है. परंतु ‘नरवर कृष्णास’ ‘नरवर कृष्णास’… ‘नरवर कृष्णास-मान?’ मतलब ‘नरवर’ यह कृष्णा को दी गई गाली है ऐसा लगे. ऐसा चल रहा था. गुण ध्यान में नहीं आया, किसलिए वह किया यह ध्यान में नहीं आया कि यह ऐसा घोटाला होता है.

‘मैं मैं’ कहने वाले, जिन्हें संगीत का कुछ भी नहीं समझ में आता. ऐसे लोगों ने बालगंधर्व आटा पीस रहे थे ऐसा लिखा है. उनमें अहिताग्नि राजवाडे भी हैं. वे गंधर्वों पर इतनी आग क्यों उगल रहे थे, यह मुझे समझ में नहीं आया. वे बोले ‘आटा पीस रहे थे! अरे, आटा क्या पीस रहे थे? हर बार वही-वही फिर से आ रहा था उस समय लय के कण में से ऐसा एक कण छूकर जा रहा था कि, वह पहली बार नहीं था, जो दूसरी बार था. फिर वह तीसरी बार नया था. चौथी बार नया था. यह समझ में आ रहा था इसलिए तिरखवाँ जैसा मनुष्य पागल होकर बजा रहा था. संगीत के, बालगंधर्वों के प्रभाव के कारण कुछ लोगों को रंगमंच की भयंकर चिंता होने लगी थी. यह क्या नाटक है क्या? वगैरह. एक समीक्षक ने लिखा था कि, गंधर्व का ‘एकच प्याला’ में गाना शुरू हुआ ‘कशी या त्यजू पदाला’ कहते समय उसका बाप स्वस्थ खड़ा था. वह अभिनय वगैरह न करते हुए खंभे जैसा खड़ा था. मुझे उस समीक्षक पर दया आई. मैंने मन में कहा कि, तेरी किस-किस पर दया आनी चाहिए? बालगंधर्व वहाँ जान लगाकर ‘कशी या त्यजू पदाला’ पूछ रहे हैं. सिंधु पूछ रही है और तू सिंधु के बाप को देखता बैठा? मतलब एक बार हमारे एक सरकार को हमारे एक प्रोड्यूसर ‘श्यामसुंदर’ सिनेमा दिखाने ले गए. दूसरे दिन सरकार ने पूछा, कैसा लगा पिक्चर? झकास है.. झकास है. सिनेमा अच्छा है. लेकिन उसमें वह बैल किसका था रे?’ मतलब उन्होंने वह कृष्ण पर का पूरा चित्रपट देखने के बाद उसे सिर्फ गोकुल का एक बैल पसंद आया. जैसे उस समीक्षक को सिर्फ सिंधु का बाप दिखा. ये समीक्षक! मतलब संगीत नाटक कैसे देखना चाहिए इसका शास्त्र सिखाने की जरूरत पड़ती है. इसका कारण है दर्शक को वह नहीं पड़ी. क्योंकि वे समीक्षा करने नहीं गए थे. तो वे आनंद लेने गए थे. जिस भक्ति भाव से बालगंधर्व रंगमंच पर आए उसी भक्ति भाव से दर्शक भी उस थिएटर में आए.

ऐसा यह अत्यंत दुर्लभ योग, बालगंधर्वों के नाटक को जाना यह एक उत्सव था. मैं आपको अभी भी बताता हूँ. पुणे के लोगों को याद होगा कि, कंपनी का मुकाम आने वाला है कहने पर किसी महाराजा की सवारी ही आने वाली है इस प्रकार का वातावरण दो-तीन महीने रहता था. मुंबई में हमें याद है कि, ओपेरा हाउस में बालगंधर्वों के नाटक हैं कहने पर हम बिना कारण उस रास्ते से आते-जाते थे.कहीं गणपतराव बोडस दिखेंगे, कहीं बालगंधर्व दिखेंगे, कहीं मास्टर कृष्णराव मेकअप करते दिखेंगे वगैरह. और आश्चर्य की बात यह है कि उस समय के मध्यमवर्गीय रसिक, संगीत नाटकों को पसंद करने वाले बहुत से लोग थे. उन्होंने अपने कुल का कुलाचार मानकर, अपनी हैसियत हो या न हो, अपने पूरे परिवार को बालगंधर्व का नाटक दिखाते थे. मुझे नहीं लगता कि ऐसा किसी और के साथ हुआ है. अपने बच्चों को बालगंधर्व का नाटक दिखाना मतलब हर साल जैसे कोंकण जाकर अपने देवता को मन्नत मांगना यह जैसे कुलाचार है वैसे ही साल में एक बार बालगंधर्व मुंबई आए, पुणे आए या जहां जाना था वहां गए तो उनका नाटक पूरे परिवार को दिखाना यह कुलाचार जैसा ही वे मानते थे. मुझे नहीं लगता कि यह किसी भी कलाकार को मिली सफलता होगी. इतने वे हर जगह व्याप्त होकर स्थिर, चर इस प्रकार सांस्कृतिक जीवन में व्याप्त रहे थे.

बालगंधर्व आने वाले हैं यह ठीक वैसे ही दिखता था जैसे अभी दिवाली आने वाली है कहने पर आंखों के सामने दिखता है. और यह जो गाना है वह किसी कारण से बना हुआ गाना था. वह रंगमंच का गाना था. और वह रंगमंच का गाना गाते हुए वह रुक्मिणी गा रही है, वह सिंधु गा रही है, वह द्रौपदी गा रही है, देवयानी गा रही है इसका विस्मरण बालगंधर्व ने कभी होने नहीं दिया. हमें सणकन् तान आती है कहने पर उन्होंने कभी तानबाजी नहीं की. ‘मधुकर वनवना’ जैसे गाने को जितना झेल सके उतना करते थे और उससे सौंदर्य प्रकट करते थे. लोग ऐसा कहते हैं कि, बारह बारह वन्समोअर हुए. घंटों गाना हुआ यह सच नहीं है. यह अतिशयोक्ति है. मैं आपको बताता हूं. वन्समोअर होने पर एक बार वह पहली पंक्ति लोगों के लिए कहते थे और अगला संवाद शुरू करते थे ऐसा ही होता था. उन्होंने कभी भी तारतम्य नहीं छोड़ा. और इसलिए लोगों को यह गाना, यह अभिनय, यह शब्द, यह उच्चारण यह एक ही. मतलब इसके बाद जिन्हें बालगंधर्व गायकी गानी होगी उन्हें पहले ध्यान से देखना चाहिए, इसमें किस सुर को इस पर्टिकुलर एक चाल में ‘मर्म बंधाची ठेव’ कहना चाहिए वह किस सुर में है यह समझ में आना चाहिए. और वह बालगंधर्व के रिकॉर्ड्स लेते समय समझ में आया तो बालगंधर्व की गायकी का एक हिस्सा आपको समझ में आ गया ऐसा होगा. आगे लय का हिस्सा है. और उससे जुड़ा हुआ जो स्वर में घुला हुआ शब्द है वह उस क्षण गाने में है. अब उदाहरण के लिए ‘दहती बहु मना’ जैसी रिकॉर्ड है. वह ऊपर का षड्ज लगा मतलब वहां दूसरा तीसरा कुछ नहीं किया जा सकता. वह वहां लगना ही चाहिए. ‘टकमक पाही’ कहते समय ‘टकमक पाही’ ऐसा सीधा सारे न कहकर ‘टकमकss’ पंचम कचकन् ऐसा लगाते ही उससे उस राग को एक अलग स्वरूप प्राप्त होता है. ऐसा हर राग में उन्होंने किया है. मैं आपको बताता हूं ‘देवा धरिले चरण’ कहते समय ‘चंssरssणss’ ऐसे तीन इसमें डाले हैं उन्होंने शब्द. उस लय का हिसाब करते-करते नाक में नौ आते हैं. ‘सुजन कसा मन चोरी’ सब लोग गाते हैं लेकिन नारायणराव जहां से उठे हैं वह जगह मिलना मुश्किल है! और इसीलिए वे असामान्य हैं. उसकी नकल नहीं हो सकती. उस गायकी का हम अभ्यास कर सकते हैं.

वह गायकी बहुत बड़ी है. सीधी-सादी गायकी नहीं है. भास्करबुवा बखले जैसे लोगों ने उन्हें दिखाया है और उस गायकी में इन्होंने अपना साज चढ़ाया है. ऐसा वह मिश्रण है. वह किए बिना सिर्फ याद किया हुआ गाना अगर कोई गाने लगे तो वह नकल होगी. काफी हद तक नकल होगी. मुझे हालांकि एक बात की खुशी है कि, बालगंधर्व का युग यह खत्म हो गया है ऐसा बहुत से लोग कहते थे. क्या खत्म हो गया है उसमें मुझे कुछ समझ नहीं आता. शायद नाटक की पद्धति अलग हो गई होगी लेकिन गाना जो है वह आज उतना ही चिरंजीव है. जिस समय युवा लड़के बालगंधर्व के रिकॉर्ड्स सुनकर उस तरह से हमें गाना आए इसलिए मेहनत करते दिखते हैं उस समय फिर एक बार लगा कि इस गाने को मृत्यु नहीं है. क्योंकि यह इतना असामान्य है कि, उसे मृत्यु संभव ही नहीं. शेक्सपियर को जैसे मृत्यु नहीं. उनके कैरेक्टर्स को मृत्यु नहीं. वैसे ही शकुंतला को मृत्यु नहीं. वैसे ही इन गीतों को नहीं. उसका कारण है कि, ये गीत जिस घराने से आए हैं उन अभिजात घरानों को मृत्यु नहीं. प्रश्न इतना ही है कि, वह सुंदर, ललित, अच्छा ऐसा करके उसे असुंदर का कहीं भी स्पर्श नहीं होगा इसकी सावधानी लेकर वह गाया जाना चाहिए. केवल इफेक्ट्स के लिए गाना नहीं चाहिए. और यहां एक और बात ध्यान रखनी चाहिए कि, बालगंधर्व ने कभी भी परिणाम करने के लिए अमुक एक किया ऐसा कभी नहीं हुआ. मैंने ये दो ही लोग देखे कि कुछ भी सिद्ध करने के लिए वे गाए नहीं. गाने बैठे और गाना शुरू किया. एक मतलब बालगंधर्व खुद और दूसरी मतलब बेगम अख्तर.उन्हें कुछ भी सिद्ध नहीं करना था.

अपनी नोटेशन पद्धति सिद्ध नहीं करनी थी. तानबाजी सिद्ध नहीं करनी थी. खटके, मुरकियां कुछ नहीं. जो उन्हें उचित लग रहा था, वैसे गा रहे थे. जैसे कोई छोटा बच्चा सुंदर दिखने के लिए कुछ नहीं करता. वह जो करता है वही सुंदर दिखता है, वैसे ही बालगंधर्व ने संगीत में जो भी किया वह सुंदर ही रहा. इसके पीछे कारण है कि, वे कोई बड़ी देन लेकर आए होंगे. इसका कारण है कि, मैं खुद उसका विश्लेषण नहीं कर पाता. इसलिए मैं कहता हूं कि वे देन लेकर आए. जो ऐसा विश्लेषण कर पाएगा वह सचमुच धन्य है, ऐसा मैं मानूंगा, ऐसे इस व्यक्ति का उत्सव हम मना रहे हैं. सौवां जन्मदिन मना रहे हैं, मुझे एकदम याद आया कि, आज मंगलवार है और ऐसे ही एक मंगलवार की शाम को इसी पुणे शहर में 6 बजकर दो मिनट पर सौ-एक साल पहले बालगंधर्व का जन्म हुआ था. उस जन्म के समय किसी को कल्पना भी नहीं होगी कि, एक अलौकिक पुरुष यहां जन्मा है. अलौकिक ही. हर मामले में अलौकिक ऐसा पुरुष. उनका पूरा जीवन अलौकिक. उन्होंने जो भी किया वह ऐसी एक निष्ठा से किया. निष्ठा एक दुर्लभ वस्तु है. बालगंधर्व ने पैसे वगैरह उड़ाए, ऐसे आरोप कुछ लोगों ने किए थे. कुछ नहीं उड़ाए. अपने आराध्य देवता के लिए खर्च किए गए ये पैसे होते हैं. रंगभूमि जैसे. इसे उड़ाना नहीं कहते. पूजा की उन्होंने. और उस पूजा के भाव से वे रंगभूमि पर आए. और लोग क्या’ इकट्ठा किए ! गंधर्व कंपनी के लोगों को देखना हमेशा एक मजेदार हिस्सा होता था. गंधर्व कंपनी का आना मतलब किसी राजा का काफिला आया हो ऐसा लगता था. अरे, उस जमाने के अभिनेता अपने नाम के आगे बी.ए., एम.ए. जैसी डिग्रियां लिखते थे.

गंधर्व कंपनी के अभिनेता अपने नाम के आगे गं. ना. मं. ऐसी पदवी लिखते थे, मतलब गंधर्व नाटक मंडली. गंधर्व कंपनी में होना इसी बात की कुछ कीमत थी. वह यूं ही नहीं आई थी. जो भी दर्शक नाटक देखने जाता था, उसे लगता था कि वह कुछ बेहतरीन गुणवत्ता वाला देख रहा है, इस दर्शक को यह भावना रहती थी कि इस व्यक्ति ने जीवन को कुछ बड़ा दान दिया है. उन्होंने जो मराठी श्रोता तैयार किया, वह अभिजात की पसंद रखने वाला श्रोता उन्होंने तैयार किया. और उन्हें मिले नाटककारों की कृपा से भी वह तैयार हुआ. उन दोनों का भी उसमें योगदान है, नाटक वैसे देखा जाए तो एक व्यक्ति की कला नहीं होती, लेकिन उसमें एक व्यक्ति ऐसा होना चाहिए जिसके बिना नाटक खड़ा भी नहीं होता. ये दोनों बातें सच हैं. इस प्रकार की जिस व्यक्ति ने कला को साकार किया, उस व्यक्ति का हम शताब्दी समारोह मना रहे हैं. मुझे इतनी खुशी हुई कि पिछले छह महीनों में यह उत्सव इतनी सहजता से सब मना रहे हैं. सबको बालगंधर्व की गायकी की तरह गाना आता हो ऐसा नहीं है. लेकिन अपनी तरफ से प्रयास चल रहा है. किसी भी सरकारी नियम के अनुसार यह नहीं चल रहा है. लोगों ने अपनी पसंद से यह किया है. ऐसा सम्मान मिलना ही कितना सौभाग्य की बात है. यह सम्मान बालगंधर्व को जीवन भर मिला. अंतिम समय में वे अपंग अवस्था में थे. उन पर प्रकृति ने ही आघात किया, उसे कौन क्या करेगा? परंतु उस अवस्था में भी जब वे बोल सकते थे. तब मैं उनसे मिलने गया था. मुझे बहुत मजा आया. ऐसे. बैठे थे. कमजोर हो गए थे. और बोले – क्या कल्पना है पता है क्या? एक ऐसी नाटक कंपनी बनानी है जिसका सब कुछ अपना हो. बड़ी इमारत हो. वहां हर कमरे में तबले, हारमोनियम हैं. गाने का अभ्यास चल रहा है, रिहर्सल के हॉल हैं. मतलब विदेशों में आजकल कंज़र्वेट की अवधारणा है. मतलब ड्रामा, म्यूजिक की. वह व्यक्ति मन में यह लेकर बैठा था. ‘अब मैं थोड़ा ठीक हो जाऊं तो, उसके लिए संघर्ष करूंगा!’ मतलब अंत तक आंखों के सामने वह पर्दा ऊपर उठा हुआ है, धूप की गंध आ रही है. ऑर्गन शुरू हो गया है और ‘नमन नटवरा’ की नांदी शुरू हो गई है. यह सपना वे अंतिम क्षण तक देखते रहे थे. ऐसी निष्ठा बहुत दुर्लभ चीज है. वह निष्ठा उन्हें मिली. इसे उनका सबसे बड़ा सौभाग्य कहना चाहिए. किसी भी परिस्थिति से बढ़कर व्यक्ति को ऐसा कुछ स्वभावतः मिलना ही एक दैवयोग होता है. आप क्या कर रहे हैं इस प्रश्न का उत्तर सबको देना आता हो ऐसा नहीं है. बालगंधर्व से पूछा होता आप क्या कर रहे हैं तो उन्होंने बताया होता कि, हे भगवान मैं आनंद देता हूं. ‘आनंदे भरीन तिन्ही लोके’ जैसा ज्ञानेश्वर ने कहा है, वह नारायणराव बालगंधर्व ने एक अलग रंगमंच पर सच करके दिखाया.

‘अवघाचि संसार सुखाचा करीन’ अवघाचि संसार मतलब आपका हमारा संसार उन्होंने सुखाचा किया. आनंद का किया. जीने के लिए सौंदर्य का जो आयाम कम है ऐसा लगता था तो वह उन्होंने लाकर दिया. मराठी जीवन में मुझे तो ऐसा लगता है कि, श्रृंगार नामक चीज यह पंत काव्य से पढ़ने के कारण कुछ लोगों को समझ में आई होगी परंतु उसका सुंदर दर्शन हुआ वह बालगंधर्व के कारण. यूं ही लोग नहीं कहते थे कि, मुझे गंधर्व जैसी पत्नी चाहिए. बहू चाहिए वगैरह. यूं ही नहीं कहते थे. ऐसा कुछ हो सकता है यह उन्हें पता ही नहीं था. कलहपूर्ण ऐसा अपना संसार होता था. उस संसार में इतनी सुंदर सुबकता इस व्यक्ति ने लाई और वह सुबकता लाते समय उसमें छिछोरपन का स्पर्श नहीं हुआ, लेकिन वैसे कौन अच्छा व्यवहार कर रहा था रंगमंच पर तो रुक्मिणी अच्छा व्यवहार कर रही थी, द्रौपदी अच्छा व्यवहार कर रही थी, सावित्री अच्छा व्यवहार कर रही थी. ‘मानापमान’ में भामिनी अच्छा व्यवहार कर रही थी. ऐसे आदर्श दिख रहे थे आंखों के सामने. अभिनय के बारे में तो क्या बताएं? अभिनय उन्होंने अलग तरीके से किया है ऐसा मुझे लगता ही नहीं. और उन्होंने अपने पूरे व्यक्तित्व के अनुरूप अभिनय किया इसलिए उनके जैसा अभिनय दूसरे किसी ने किया तो वह हमें देखा नहीं जाता. असामान्य चीज की मैंने अभी बताया वैसे यही बात होती है कि उसे सुधारना भी संभव नहीं है और वह कुउदाहरण नहीं हो सकती. वह जहां की तहां ही होती है. ताजमहल कहा तो उसमें आप सुधार नहीं कर सकते. वह जहां है वहीं है. वैसे ही बालगंधर्व का. बालगंधर्व का अभिनय मतलब बालगंधर्व का ही अभिनय. उसमें से तत्व लेकर उस पर आपको विचार किया जा सकता है. बालगंधर्व कुछ-कुछ प्रसंग क्या सुंदर करते थे, इसलिए मैं आपको बताता हूँ. ‘एकच प्याला’ में ‘सिंधु मैं दारू छोड़ दी’ कहने के बाद जो आनंद हुआ था, वह मूर्तिमंत आनंद का चित्र क्या है, ऐसा अगर कोई पूछे तो वह क्षण. कल अगर मुझसे कोई पूछे ‘आनंद’ क्या है, तो दारू छोड़नी हो तो, झटपट कूद पड़ो वगैरह गाने आते थे. ‘प्रभु अजि गमला’ गाना आता था, क्या सुंदर उस समय का अभिनय. यही सच्चा आनंद, उनका दिखना जितना अच्छा था. उनका अभिनय जितना अच्छा था, उतना ही उनका सुनना भी अच्छा था. listening यह अभिनय में महत्वपूर्ण है. मुझे याद है कि दूसरा पात्र बोलने लगता तो वे बिल्कुल जान लगाकर सुनते थे. एक क्षण भी ऐसा छूटा नहीं. क्योंकि मुझे बहुत से नटवर्य पता हैं कि, दूसरे पात्र का भाषण शुरू हुआ कि अब मैं सुख से मरता हूँ’ कहने जैसा बाजू में बैठ जाते और अपना भाषण आया कि फिर से जाग जाते.

यह व्यक्ति दूसरों का इतना सुनता था, उन्होंने जान का कान कैसे किया उसकी प्रतिक्रिया हमें पता चलती थी. एक-एक शब्द डाला मतलब ऐसा लगता था…. ‘मन मोहिनी कृष्ण सखा रमेला’ वहाँ. ‘कृष्ण’ शब्द ऐसा पड़ता था कि क्या बताऊँ आपको. कि वह कृष्ण पूरे शरीर में समाया हुआ है ऐसा साक्षात्कार होता था. हर जगह ऐसा हुआ है. खाडिलकर के शब्दों को मीठा करना भी बहुत कठिन काम था. ‘ठरला जणु मत्सर राजा’ यह गाने में कहना मतलब कोई आसान काम नहीं था. और फिर उसे मीठा करके कहना. ‘ठरला जणु मत्सर राजा’ भी उन्होंने मीठा करके कहा. तिरखवाँ साहब एक बार मुझसे बोले थे, ‘देखो ये गाने में मच्छर कैसा आया ?’ मैंने कहा ‘खाँ साहब गाने में मच्छर आया तो बालगंधर्व से पूछिये’ नहीं नहीं बोले ‘महाराज को कैसे पूछेंगे ? हमको अचरज होता है कि गाने में मच्छर क्यूं आता है.’ ‘तो मत्सर राजा’ शब्द भी मीठा होना चाहिए ऐसा लगा. खाडिलकर के शब्दों को उन्होंने मिठास दी. फिर वह झूठे तरीके से, उसे मीठा करना था इसलिए नहीं दी. नहीं तो आजकल लाड़-प्यार भी, उसका डर लगने लगा है. वह लाड़-प्यार भावगीतों में आते हुए हिचकी आने जैसा वगैरह. ऐसा उन्होंने कुछ नहीं किया था. प्रेम वगैरह कहने पर रोंगटे खड़े हो जाएँ ऐसा भी उन्होंने कुछ नहीं किया था. जो था वह सादा, सीधा ऐसा था. इसलिए वह भक्तिरस उनके श्रृंगार की भक्ति में भी दिखा. कारुण्य की भक्ति में भी दिखा और अंत में भक्तिरस की भक्ति में तो कुछ पूछो ही मत.

रंगमंच पर अत्यंत मन पर परिणाम करने वाले प्रसंग कौन से हैं, ऐसा अगर मुझसे कोई पूछे तो मैं कहूँगा….’कान्होपात्रा’ मैं देख रहा था और कान्होपात्रा अंत में उस विट्ठल के चरणों में शरण जाती है. और वहीं मर जाती है ऐसा प्रसंग है. वह विट्ठल का मंदिर भी क्या सुंदर खड़ा किया था ! पंढरपुर के मंदिर जैसा ही नमूना बनाया था. यह सचमुच उस समय की उनकी जिद थी – मैं पंढरपुर रंगमंच पर खड़ा करूँगा, उसी तरह उन्होंने पंढरपुर खड़ा किया था. और विट्ठल के चरणों में कान्होपात्रा लीन हुई उस समय हम सब हक्के-बक्के रह गए. मतलब काष्ठयवत् वे आए थे – उस क्षण. और उसे देखकर काष्ठयवत् हम हो गए. यह लोगों को पता चले इसलिए इसके लिए कोई अभिनय, वह चेहरे-बिहरे कुछ नहीं. वे लीन हो गए. वे लीन हो गए मतलब कैसे तो पानी में जैसे रंग घुल जाए वैसे वे विट्ठल के वहाँ गए और विलीन हो गए ऐसा ही feeling उन्होंने सबको दिया. उस क्षण तक मुझे पता है ‘गीताबाई अपने नसीब में गोकुल की गोठणी खाली पड़ गईं’ बिल्कुल यह एक वाक्य आपको बताता हूँ पूरे नाटक की जो ट्रेजेडी है वह इस एक वाक्य से लोगों का अंतःकरण चीरती जाती है. एक सिर्फ पुकार से, गाने का शब्द-शब्द यह दो सारंगियां, दो ऑर्गन और तिरखवाँ का तबला इस संगत की दमदारता में हमें पिट तक सुनाई देता था. क्योंकि हमारा ठिकाना वहीं होता था. उसके बिना हमें दूसरा टिकट लेना संभव नहीं था. लेकिन वहाँ भी हम राजा जैसे बैठे सुनते हैं इसका आनंद था. तो वह वहाँ तक पहुँचने वाली आवाज, वह फेंक फिर उन्हें उस फेंक में कुछ कष्ट हुए हैं, चिल्लाना है ऐसा नहीं. दूसरा कोई ‘नरवर कृष्णासमान’ चिल्लाता तो कृष्ण के घर को आग-वाग लग गई क्या ऐसा लगता. ऐसा कुछ नहीं था. पुकार थी परंतु उसमें संगीत को, उसमें लय को, उसमें सौंदर्य को क्षण भर छोड़कर कहीं नहीं था. यह कमाल उस व्यक्ति ने कैसे साधा यह सचमुच समझना संभव नहीं है. वह उनकी ऐन जवानी में जिन्होंने देखी उनमें से कुछ लोग आज यहाँ उपस्थित हैं. उनके सामने बोलना मतलब एक प्रकार की गुस्ताखी है. उर्दू भाषा में कहना हो तो, लेकिन कोई इलाज नहीं है. मैं भी यहाँ जो खड़ा हूँ, वह अत्यंत खुले मन से खड़ा हूँ. क्योंकि मेरी भी भूमिका भक्त की ही है.

‘भक्तिभाव से यह सेवा लो’ यह उन्होंने कहने के बजाय हम ही कहते थे. नाना ने गाना शुरू करने के बाद हमारे मन में ‘जोहार माय बाप जोहार’ उन्हीं को जाता था. मुझे याद है, यहीं उपाशी विठोबा के मंदिर में नाना बैठे थे. भजन गा रहे थे. भजन बहुत रंग में आ गया था. ‘जोहार मायबाप’ ही होगा. भीमसेन मेरे बगल में ही बैठे थे. उन्होंने कहा, ‘पी.एल. का यह भजन, यह गाना सुना ना कि, लगता है घर जाकर अपने तंबूरे के कद्दू की सब्जी बना लूँ’ और यह उन्होंने जानबूझकर नहीं कहा था. सचमुच हमें ऐसा ही लग रहा था. अरे क्या ठेका चल रहा था, क्या बताऊँ? उस दिन की एक और मज़ा मुझे याद है. ऐसी कितनी ही हैं. उस दिन बाबालाल तबले पर थे. और ‘मधु मधुरा तंव’ शुरू हुआ. और ‘मधु मधुरा’ के लिए उनका एक विशिष्ट प्रकार का पंजाबी ठेका था जो बाबालाल को नहीं आता था. वह उन्हें चाहिए था. अनंता लिमये ऑर्गन पर थे. वे गा रहे थे, ताल में आ रहे थे. लेकिन वज़न नहीं आ रहा था. गाने वाले जो लोग हैं उन्हें यह समझ में आएगा कि चार मात्राओं का केरवा होने पर भी प्रत्येक केरवा का वज़न अलग होता है. वह नहीं आया तो गड़बड़ होने लगती है. कुछ देर बाद वे रुके और अनंता से बोले अनंता बाप्पा उन्हें बताओ. अपनी कंपनी का ठेका क्या है वह उन्हें बताओ. उस ठेके का नाम भी उन्हें नहीं पता था. फिर अनंता ने बाबालाल के कान में ठेका कौन सा है उसका नाम बताया. वह ठेका बाबालाल ने बजाना शुरू करने के बाद ‘मधु मधुरा’ फिर से शुरू हुआ.

लेकिन उस समय जो दूसरा ठेका था उस समय भी वह ‘मधु मधुरा’ मधुर नहीं था ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था. ऐसा सिर्फ उन्हें ही लग रहा था कि यह ऐसा नहीं ऐसा होना चाहिए. ऐसा कुछ तो यह चमत्कार था और इसे चमत्कार ही कहना चाहिए, क्योंकि किसी को भी कॉलेज में, मराठी एम.एल. में संत साहित्य विषय न लेते हुए अगर तुकाराम इतने अभंग लिख सकते हैं. तो कहीं भी न सीखकर या सीखने का आभास न दिखाते हुए जो मनुष्य गा सकता है इसे चमत्कार के अलावा और क्या कहना? और यह चमत्कार मैं युवाओं को यही बताने वाला हूँ कि आप उन डिस्क हैं ना उसकी क्वालिटी अब अच्छी नहीं है. उस समय यंत्र सामग्री अच्छी नहीं थी. आपको कल्पना नहीं होगी, ऐसे कर्णे में मुँह डालकर गाना पड़ता था. और वह रिकॉर्डिस्ट था वह विदेशी, अंग्रेज होता था. उसे बालगंधर्व गाते हैं क्या अथवा सुंदराबाई गाती हैं क्या, पोवाड़ा गाता है क्या, अमुक गाता है क्या इसकी परवाह नहीं होती थी. वह घड़ी की ओर देखता रहता था. तीन मिनट हुए कि खट से बंद कर दिया. कहाँ बंद करता है क्या करता है उसे उसकी कोई परवाह नहीं होती थी.

ऐसी परिस्थिति में यह गाया हुआ होते हुए भी. ऐसी परिस्थिति में भी इतने सुंदर गाने प्रस्तुत किए गए हैं कि आप ऐसा करें. ध्यानपूर्वक वे गाने लय को कहाँ उठाते हैं, कैसे जाते हैं, किस सुर को महत्व देते हैं, किस राग को. बागेश्री गाते समय संपूर्ण बागेश्री कैसा दिखता है. भीमपलास गाते समय भीमपलास ही कैसा दिखता है. दूसरा राग ही कैसा नहीं लगता. अगरबत्ती जैसे जलाते ही सुगंध देती है वैसे पहले ‘मा’ के साथ जरा सा हिलने पर वह राग ही कैसे महकने लगता है यह जादू क्या है यह आपने देखा तो मैं आपको सचमुच बताता हूँ कि, उन पुरानी ध्वनिमुद्रिकाओं में भी प्रचंड आनंद का खजाना जमा है ऐसा दिखेगा. यह सारा धन सौभाग्य से आप उसे ठीक से देखें. उसी प्रकार अभ्यास करें. बालगंधर्व जन्मशताब्दी मनाने का, दूसरी शताब्दी मनाने का अधिकार आपको इसी वजह से प्राप्त होने वाला है. केवल सौ साल हुए हैं इसका कोई अर्थ नहीं है. सौ साल वह टिका हुआ है. सौ साल वह जीवित रहा है. आज भी इतनी विपरीत परिस्थिति में, अलग परिस्थिति में हमें वह आनंद दे रहा है. अभी मैं नीचे बैठा था तब किसी से बात कर रहा था और मधु मधुरा की रिकॉर्ड लगी. उस आदमी की बातों पर मेरा ध्यान ही नहीं रहा. गाना, ऐसा आपको खींच लेता है जिस प्रकार कोई सक्शनपंप वगैरह कहते हैं वह जैसे खींच लेता है वैसे गाना और वह गाना फिर सहज खिला हुआ, प्रकृति ने कोई बगीचा खिलाया हो वैसे खिला हुआ गाना परंतु उतना वह प्रकृति ने दिया है यह नकल न करते हुए उसके पीछे एक बड़ी परंपरा, एक बड़ा विचार छिपा हुआ है यह मत भूलना. वह अगर आपने देखा तो हम एक बड़े आनंद के धनी हो गए हैं ऐसा आपको लगेगा. ऐसे इस धनी का आज हम आनंद देने वाले धनी का हम जन्मोत्सव मना रहे हैं. अभी कुछ दिन और मनाया जाएगा. अनेकों ने किया है. उनके बारे में एक अपने जैसे गंधर्व भक्तों को कृतज्ञ रहना चाहिए.

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