बालगंधर्व की भूमिकाएँ
- वा. य. गाडगीळ
“हुए बहुत, होंगे बहुत, परन्तु इनके जैसा यह” यह वर्णन नाट्य क्षेत्र में सही मायने में केवल एक व्यक्ति पर लागू होता है और वह व्यक्ति है नटसम्राट बालगंधर्व। मराठी रंगमंच की स्थापना 1843 में हुई। तब से लेकर आज तक कुछ हजार कलाकार इस रंगमंच पर आए। उनमें से अनेक गुणी थे। उन्होंने कई भूमिकाएँ निभाईं और कम-अधिक मात्रा में लोकप्रियता हासिल की। रसिक महाराष्ट्र ने उनकी कदर की, उनके गुणों की सराहना की। लेकिन इनमें से किसी भी कलाकार को बालगंधर्व जितना दर्शकों का प्यार नहीं मिला। 50 साल पहले शिक्षित मराठी व्यक्ति के घर में दो तस्वीरें अवश्य दिखाई देती थीं। एक लोकमान्य तिलक की और दूसरी नटसम्राट बालगंधर्व की। तिलक की देशभक्ति और त्याग ने महाराष्ट्र को उनका भक्त बना दिया था। बालगंधर्व के रूप, गायन और अभिनय ने मराठी रसिकता को मोहित कर दिया था।
बालगंधर्व ने जो अतुलनीय यश प्राप्त किया, वह स्त्री-भूमिका करके। यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है। स्त्री-भूमिका में किसी भी स्त्री को जो यश अभी तक नहीं मिला है, वह एक पुरुष ने प्राप्त किया, यह चमत्कार ही कहा जाना चाहिए। यह चमत्कार क्यों और कैसे हुआ, इस पर विचार करते हैं।
आज नाटकों में स्त्रियों के काम स्त्रियाँ ही करती हैं। पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। चूल्हा और बच्चा उस समय महिला का कार्यक्षेत्र माना जाता था। इसलिए नाटकों में काम करने के लिए स्त्रियाँ आगे नहीं आती थीं। नाटक में स्त्री पात्र तो होते ही थे। इसलिए स्त्री पात्रों का काम पुरुषों को करना पड़ता था। गोरे-चिट्टे, बिना मूंछों वाले सुंदर तरुण, गोंडस बच्चे स्त्री-भूमिका करने के लिए चुने जाते थे। मतलब, एक दृष्टि से दूध की प्यास छाछ से बुझाने जैसा ही यह प्रकार था।
1880 में सुशिक्षित लोगों की किर्लोस्कर नाटक मंडली का जन्म हुआ और उसने शाकुंतल, सौभद्र, रामराज्यवियोग, वीरतनय, शारदा वगैरा संगीत नाटक रंगमंच पर प्रस्तुत किए। इस संस्था में उत्तम गाने वाले कलाकार थे। उसके नाट्य प्रयोग दर्जेदार होते थे। लोकमान्य तिलक जैसे महान नेता का उसे समर्थन था। इन सभी कारणों से समाज में इस संस्था को प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। जो नाटक का धंधा हलके दर्जे का माना जाता था, उसे समाज में मान्यता मिली, वह इस किर्लोस्कर नाटक मंडली के कारण।
किर्लोस्कर नाटक मंडली में नायिका की भूमिका भाऊराव कोल्हटकर करते थे। वे बहुत सुंदर थे। उनका गायन तेजस्वी होता था। १९०१ में उनका अचानक निधन हो गया और किर्लोस्कर नाटक मंडली की स्थिति बिगड़ गई। नया, अच्छा गाने वाला स्त्री पात्र मिले बिना संस्था की भलाई नहीं, ऐसे चिन्ह स्पष्ट दिखाई देने लगे। सौभाग्य से, १९०५ में नारायण श्रीपाद राजहंस नामक एक अति सुंदर लड़का उन्हें नायिका के अभिनय के लिए मिला। यह लड़का बालगंधर्व के नाम से जाना जाने लगा। जब वह १० वर्ष का था, १८९८ में, लोकमान्य तिलक ने उसका गाना सुना। वह मधुर गाना सुनकर लोकमान्य सहज ही बोले, “यह बालगंधर्व बहुत सुंदर गाता है”। तभी से नारायण राजहंस ‘बालगंधर्व’ के नाम से पहचाने जाने लगे।
देवल मास्टर से अभिनय के पाठ
प्रख्यात नाटककार और उत्तम अभिनय शिक्षक गोविंदराव देवल ने बालगंधर्व को अभिनय के पाठ पढ़ाए। स्त्री-भूमिका में कैसे खड़ा रहना है, कैसे चलना है, हाव-भाव कैसे करने हैं, बोलना कैसे है यह सब देवल मास्टर ने बालगंधर्व को सिखाया। अभिनय में कृत्रिमता नहीं दिखनी चाहिए, इस बात पर देवल का विशेष ध्यान रहता था। नाटक का गाना रसानुकूल ही होना चाहिए, यह उनका आग्रह रहता था। देवल से उत्तम तालीम मिलने के बाद, बालगंधर्व रंगमंच पर पहली बार खड़े हुए। मिरज मुकाम पर, संगीत शाकुंतल नाटक में। जिनकी लोकमान्य तिलक ने बालगंधर्व की उपाधि दी है, वे नारायणराव राजहंस शकुंतला की भूमिका करेंगे, इस तरह इस प्रयोग का विज्ञापन किया गया था। किर्लोस्कर नाटक मंडली की नई नायिका को देखने के लिए पुणे, कोल्हापुर, बेलगाम आदि गाँवों के रसिक ख़ास मिरज गए थे। आज की भाषा में कहें तो उस प्रयोग में हाउस फुल भीड़ जमा हुई थी।
बालगंधर्व ने जैसे ही शकुंतला के रूप में रंगमंच पर पदार्पण किया, दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत किया। यह शकुंतला बहुत सुंदर और मनमोहक लग रही थी। मुख्य बात यह थी कि उस सौंदर्य में शालीनता थी। बालगंधर्व ने शकुंतला के पदों को अच्छी तरह से प्रस्तुत किया और अभिनय भी व्यवस्थित रूप से किया। बालगंधर्व की वह पहली भूमिका देखकर रसिकों को महसूस हुआ कि रंगमंच पर एक चमकदार तेजस्वी सितारा ही उतर आया है। शाकुंतल के बाद बालगंधर्व ने शारदा, मूकनायक, सौभद्र, गुप्तमंजुष, मतिविकार नाटकों में नायिका की भूमिकाएँ निभाईं। मुंबई में बालगंधर्व की सुभद्रा की विशेष प्रशंसा हुई। सुभद्रा की असहायता और मासूमियत उनके अभिनय से मोहक ढंग से प्रकट होती थी। “बलसागर तुम वीर शिरोमणि”, “वद जाऊं कुणाला शरण”, “किती किती सांग तुला”, “अरसिक किती हा शेला”, “पांड नपती जनक जया” वगैरह सुभद्रा के पद वे बहारदार ढंग से गाते थे, उनके गायन और अभिनय के कारण सौभद्र नाटक किसी नए नाटक की तरह भीड़ खींचता रहता था।
बालगंधर्व के काम को देखकर नाटककार काकासाहेब खाडिलकर को संगीत नाटक लिखने की प्रेरणा मिली। उन्होंने संगीत मानापमान लिखा जो 1911 में रंगमंच पर आया और बालगंधर्व के गायन और अभिनय को एक अनोखी चमक मिली।
मानापमान की नायिका भामिनी रूपगर्विता है। उसे अपनी अमीरी का बहुत अभिमान है। वह गरीब धैर्यधर से शादी करने के लिए बड़े घमंड से इनकार कर देती है। लेकिन बाद में धैर्यधर के पराक्रम पर वह मुग्ध हो जाती है। अपनी सखी-कसमावती से बात करते हुए भामिनी धैर्यधर के प्रति अपना प्रेम व्यक्त करती है। “नाही मी बोलत नाथा” यह शृंगारसूचक पद गाते समय “विनयवती मी कांता” ऐसे जताए बिना वह नहीं रहती। इस जतलावने में उसकी मर्यादशीलता स्पष्ट होती है। तीसरे अंक में भामिनी-कुसुमावती का प्रवेश और चौथे अंक में धैर्यधर और भामिनी का प्रवेश – ये लेखन की दृष्टि से बहारदार प्रवेश बालगंधर्व अपने अभिनय से बहुत खूबसूरती से प्रस्तुत करते थे। उसे देखने के लिए दर्शक बार-बार भीड़ करते थे।
स्त्री-भूमिकाओं के लिए ही जैसे जन्म।
बालगंधर्व के सर्वाधिक प्रसिद्ध नाटक स्वयंवर और एकच प्याला हैं। स्वयंवर में रुक्मिणी की भूमिका में वे राजकुमारी के ऊँचे वस्त्र पहनते थे। इसके विपरीत, एकच प्याला में सिंधु की भूमिका में उन्हें फटी हुई साड़ी पहननी पड़ती थी। प्रत्येक भूमिका में अपनी वेशभूषा वे अत्यंत सावधानी से करते थे। वे शालू और साड़ी इतनी करीने से और सुंदर तरीके से पहनते थे कि महिलाओं को उसे आदर्श मानना चाहिए। अपनी रंगभूषा वे बहुत सावधानीपूर्वक करते थे।
संशयकल्लोळ के बाद, केवल डेढ़ महीने में स्वयंवर रंगमंच पर आया। इन दो नाटकों में बालगंधर्व की भूमिकाएँ भिन्न वातावरण और भिन्न स्वरूप की थीं। उस भिन्नता को सटीक रूप से दर्शाकर बालगंधर्व ने इन दोनों भूमिकाओं को लोकप्रिय बनाया। कृष्ण को प्रत्यक्ष देखने से पहले ही उन पर अनुरक्त हुई रुक्मिणी “दादा ते आले ना” (दादा, वो आ गए ना) कहते हुए रंगमंच पर प्रवेश करती है। बालगंधर्व का यह पदार्पण और इस वाक्य का उच्चारण इतना शानदार होता था कि उसका वर्णन करने के लिए शब्द कम पड़ जाएँ। रुक्मिणी का कृष्ण के प्रति असीम प्रेम प्रकट होता था। यह एंट्री, यह वाक्य और यह अभिनय मराठी नाट्य जगत में अतुलनीय सिद्ध हुआ।
इस नाटक के अंक में रुक्मिणी अपनी माँ के सामने कृष्ण के गुणों का बखान करती है। ऐसा करते समय कृष्ण के प्रति स्नेह और भक्ति को बालगंधर्व बड़ी तल्लीनता से प्रकट करते थे। तभी रुक्मी आता है और घोषणा करता है कि स्वयंवर का मंडप जल जाएगा – विदर्भ देश की इज्जत धूल में मिल जाएगी। रुक्मिणी उसे साहस और धैर्य से उत्तर देती है। उस प्रवेश में गंधर्व की संवाद क्षमता स्पष्ट रूप से व्यक्त होती थी। उनकी गतिविधियाँ भी ध्यान आकर्षित करती थीं। जब भीष्मक महाराज कहते हैं कि विवाह मंडप नहीं जलेगा, तो रुक्मिणी “बाबा, क्या ये सच है?” ऐसा पूछते हुए आनंद से उनके गले में हाथ डालती थी। उस समय आनंद की आभा बालगंधर्व के चेहरे पर फैल जाती थी और उसकी सुखद छवि दर्शकों के चेहरे पर उभर आती थी।
आगे स्वयंवर के मंडप में जब युद्ध होने का प्रसंग आता है, तब रुक्मिणी कुछ कड़े शब्दों में ही रुक्मी को कहती है, “दादा, तलवार पीछे खींचो”, और पल भर में कृष्ण से विनती करती है, “महाराज, तलवार पीछे ले लीजिए”। बालगंधर्व इस समय बोलने में कितना अंतर करते थे। “इस अभागी रुक्मिणी का स्वयंवर टूट गया – उसने स्वेच्छा से वर पसंद करने का अधिकार छोड़ दिया है,” ऐसे भावुक उद्गार जब बालगंधर्व के मुख से निकलते थे, तो उसका विलक्षण प्रभाव होता था।
स्वयंवर नाटक में विभिन्न भावनाओं को व्यक्त करने वाले कई स्वगत भाषण रुक्मिणी के मुख में हैं। बालगंधर्व रसोत्कट उच्चारण और उचित अभिनय करके उन स्वगत भाषणों को बड़ी तल्लीनता से उच्चारित करते थे। वाक्य के ताल और तोल को बनाए रखने की असाधारण कला उनमें थी। उनके बोलने के ढंग से भारी वाक्य भी आसान लगते थे।
स्वयंवर नाटक में बालगंधर्व का अभिनय और उनका संगीत मानो एकरूप हो गए थे। मिली हुई भूमिका के मर्म को समझकर, वे अपनी बुद्धि से मानो उस पर एक नया प्रकाश डालते थे। भारदस्त खानदानी संगीत पर आधारित रुक्मिणी के पद बालगंधर्व इतने झोके में गाते थे कि सारा प्रेक्षागार गायन में तल्लीन हो जाता था। यह नाटक कभी खत्म ही न हो, ऐसी भावना निर्माण होती थी।
“कशी या त्यजू पदाला” हमेशा वन्स मोअर (एक बार और)
बालगंधर्व के अभिनय का गौरीशंकर शिखर मतलब उनकी सिंधु की भूमिका। “एक प्याला” की सिंधु मतलब एक शराबी द्वारा भिखारी बनाई गई सामान्य पत्नी नहीं। सुधाकर उसका वर्णन दिव्य तपस्विनी शब्दों में करता है। बालगंधर्व की सिंधु को देखते हुए, वह वर्णन एकदम सच है, यह महसूस होता था। सिंधु की अनन्यसाधारण पतिनिष्ठा अत्यंत वाजिब है, यह बालगंधर्व का काम देखते हुए महसूस होता था। मैंने “एक प्याला” में बालगंधर्व की सिंधु की भूमिका कई बार देखी थी। उसे बार-बार देखने की मेरी हमेशा इच्छा होती थी। माँ का बच्चे के प्रति प्रेम व्यक्त करने का अवसर उन्हें केवल इस नाटक में मिला, “घास घे रे तान्ह्या बाळा, बघू नको मजकडे” (घास खाओ रे नन्हे बच्चे, मेरी तरफ मत देखो) जैसे सिंधु के स्त्रीगीत वे अत्यंत भावना से गाते थे। “कशी या त्यजू पदाला, सत्य वदे वचनाला” (कैसे इस पद को छोडूं, सत्य वचन देता है) इत्यादि सिंधु के पदों को वे हमेशा वन्स मोअर लेते थे। वन्स मोअर मिलना आम तौर पर मुश्किल ही होता है। लेकिन बालगंधर्व को किसी भी नाटक के कुछ पदों के लिए वन्स मोअर मिलता ही था। वन्स मोअर मिलना उनके लिए बहुत आसान था।
“एक प्याला” के बाद बालगंधर्व ने द्रौपदी, आशानिराशा, नंदकुमार, विधिलिखित, सावित्री, कान्होपात्रा और अमृतसिद्धि ये नए नाटक रंगमंच पर लाए। इनमें से एक भी नाटक “मानापमान”, “स्वयंवर”, “एक प्याला” के स्तर का नहीं था। इन नाटकों में बालगंधर्व अपनी भूमिकाएँ मनोभाव से करते थे, उनके पद रंगतदार होते थे, यह सच है। अभिनय की कुछ जगहें भी वे खूबसूरती से दिखाते थे। लेकिन जब मूल नाटक ही दर्जेदार (गुणवत्तापूर्ण) न हो, तो बेचारा कलाकार क्या करे?
युवावस्था में बालगंधर्व स्त्री वेश में बहुत सुंदर दिखते थे। उनका दर्शन वृद्धावस्था में भी कभी-कभी सौंदर्य का आभास कराता था। क्योंकि वे जिस तद्रुपता (तन्मयता) से काम करते थे, वह तद्रुपता सुंदर थी। वह उनकी उम्र का विस्मरण कराती थी। बालगंधर्व के दांत सुंदर थे। उनकी हँसी मोहक लगती थी। उनके चेहरे पर सात्विक भाव था। भूमिका के आचार-विचार से वे एकरूप हो जाते थे। इसलिए उनका अभिनय और गाना स्वाभाविक लगता था। उन्होंने स्वरों के साथ कभी दंगा-मस्ती नहीं की। गाते समय वे स्वरों को सहलाते थे। गाना गाते समय अभिनय की ओर से उनका कभी ध्यान नहीं हटता था। सौंदर्य, अभिनय और गायन तीनों चीजें उनमें एकवट (एकत्रित) होने के कारण वे एकमात्र और अद्वितीय ठहरे। ऐसा स्त्री पात्र निभाने वाला नायक नट दूसरा नहीं हुआ।