गंधर्व गायन की विशेषताएँ
- पंडित वामनराव सडोलीकर
महाराष्ट्र के सांस्कृतिक क्षितिज पर अचल स्थान प्राप्त करने वाले व्यक्तित्व यानी नारायणराव राजहंस उर्फ बालगंधर्व! उन्हें यह अद्वितीय स्थान दिलाने वाली कई बातें हैं। उनके रंगमंच पर आने से पहले की स्थिति का संक्षेप में जायजा लेते हैं।
घर की कठिन आर्थिक स्थिति और संगीत के प्रति स्वाभाविक झुकाव के साथ छत्रपति शाहू महाराज की सिफारिश के कारण उन्होंने 17 साल की उम्र में (अक्टूबर 1905 में) किर्लोस्कर संगीत मंडली में प्रवेश किया। मोरोबा वाघोलीकर, बाळकोबा नाटेकर, भाऊराव कोल्हटकर, कृष्णराव गोरे जैसे अभिनेताओं ने कंपनी को प्रतिष्ठा दिलाई थी। शुरुआत में बालगंधर्व को अभ्यास के लिए नटी, शारदा जैसी भूमिकाएँ दी गईं। कंपनी में भाऊराव और कृष्णराव गोरे स्त्री भूमिकाएँ करते थे। लेकिन भाऊराव की मृत्यु हो गई और कृष्णराव अचानक कंपनी छोड़कर चले गए। इसलिए बालगंधर्व नायिका की भूमिका में खड़े हुए। कम उम्र, आकर्षक रूप और मधुर आवाज के कारण वे जल्द ही लोकप्रिय हो गए। स्वाभाविक रूप से उनके स्वभाव या स्वरों के लगाव में मर्दानगी या जल्दबाजी नहीं थी, इसलिए वे स्त्री भूमिकाओं में अधिक जंचे। कंपनी को बचाने वाले अभिनेता साबित हुए।
उनके पास केवल रूप या मधुर आवाज जैसे गुण ही नहीं थे, बल्कि देवल मास्टरों द्वारा दिए गए अभिनय के पाठों को उन्होंने सावधानीपूर्वक आत्मसात किया और उसमें स्त्री मन के अध्ययन और अपनी स्वाभाविक सौंदर्य दृष्टि को जोड़ा। इसलिए उन्होंने जिन नायिकाओं को साकार किया, उन्हें लोगों ने आदर्श माना।
मैंने गंधर्व के नाटक पहली बार 1920 में देखे। मैंने रंगमंच पर उनकी रुक्मिणी, सिंधु, सुभद्रा, वसंतसेना, भामिनी, रेवती, देवयानी, लकेरी, कान्होपात्रा, इंदिराकाकू, अर्जुन जैसी भूमिकाएँ देखीं। धर्मात्मा में एकनाथ को देखा और कई निजी महफिलों में उनके गाने, पद, अभंग सुने। इस पूरे काल में मैंने उनकी गायकी की जो विशेषताएँ जानीं, उन्हें अब विस्तार से देखते हैं।
नाट्य पदों का शास्त्रीय रूप से विचार करते समय पता चलता है कि पदों की लय एक महत्वपूर्ण पहलू होती है। कुछ पदों की लय स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाली और आम लोगों को आसानी से समझ में आने वाली होती है। उदाहरण के लिए, “नाही मी बोलत नाथा” (दादरा), “स्वकुल तारक सुता” (त्रिताल)। गंधर्व इस लय में जो गाते थे, वह आम लोगों को पसंद आने वाला तो होता ही था, लेकिन उसमें मात्राओं का आंतरिक विभाजन विशेषज्ञों की प्रशंसा पाता था।
कुछ पदों की रागदारी शैली की लय थोड़ी कठिन लगती थी, लेकिन वे उन पदों का विस्तार इस प्रकार करते थे कि “नयने लाजवीत” (झपताल), “खरा तो प्रेमा” (केहरवा), “मम सुखाची ठेव” (रूपक) जैसे पद भी दर्शकों के मुंह से निकलते थे और पदों का आशय मन में बैठ जाता था।
गंधर्व के पदों की लय अतिविलंबित या अति द्रुत नहीं, बल्कि थोड़ी द्रुत यानी मध्य लय होती थी। इसलिए पदों में भावनाओं की अभिव्यक्ति या आशय का प्रवाह उनके गाने से रुकता नहीं था, बल्कि उनकी स्वाभाविक चपल और मनमोहक गति वाली आवाज को शब्दों के साथ लय के खेल खेलने का अवसर मिलता था। रागदारी, ठुमरी, लावणी, भजन जैसी किसी भी शैली में वे कभी अटके नहीं, ऐसा मैंने देखा नहीं। गंधर्व गायन का सहज और सुगम लगने वाला मर्म उनकी अनुशासनशीलता है। उनकी तालीम बहुत सोच-समझकर, गुरु के मुख से सुनकर हुई थी। नाट्य प्रयोग न होने पर भी वे छुट्टियों के दिनों में भी नाट्यगृह जाकर ऑर्गन, सारंगी, तबला जैसे सभी वाद्य यंत्रों के साथ 4-4 घंटे पदों का अभ्यास करते थे। इसी रियाज से कठिन गायन उनके गले का सहज स्वभाव बन गया था।
बालगंधर्व “कोठीवाले” या “विद्वान गवैया” नहीं थे, लेकिन उन्हें पदों के संदर्भ में आने वाले रागों का अभ्यास था। जलगाँव के उनके गुरु महबूब खाँ फैज महमद खाँ के शिष्य थे। इसलिए चीज़ों की तरह पदों की रचना भी स्पष्ट, शुद्ध उच्चारण और अर्थपूर्ण होती थी। स्थायी से अंतरा खिलता था। उसमें कभी नीरसता नहीं आती थी। जिस राग में पद है, उस राग को पूरी तरह से प्रस्तुत करना उनका ध्येय कभी नहीं था। पदों के आशय को पुष्ट करने के लिए, उसमें भावनाओं को शोभा देने वाले आसपास के कभी समप्रकृतिक तो कभी विपरीत प्रकृति के राग भी वे मिलाते थे। क्योंकि पदों से लोगों का मनोरंजन करना ही उनकी मूल प्रतिज्ञा थी।
सुगम संगीत में मनोरंजन के लिए कुछ नियम-कायदों का पालन करना पड़ता है। ‘सुर से बात पैदा होना’, ‘बोल से बात पैदा होना’ और ‘बात से बात पैदा होना’। गंधर्व के गायन में इन तीनों का उत्तम विकास दिखाई देता था। सुर तो स्वर्गीय था ही, लेकिन शब्दों का उच्चारण और फेंक सटीक होता था। शब्द इस तरह डाले जाते थे कि गद्य से चलने वाला आशय का प्रवाह पद्य से आगे बढ़ता रहता था। संवाद और पद अलग-अलग लगते ही नहीं थे। रागदारी में बोलते समय की रूखापन उनके ‘बोल से बात’ में ‘पैदा’ नहीं हुआ। वे पद्य से भी बोलते ही थे। श्रृंगार और करुण रस से भरे पदों में उनकी इस विशेषता का मनोहर दर्शन होता था। ‘नाथ हा माझा’ में कृष्ण पर अनुरक्त रुक्मिणी के मन से उमड़ने वाला कृष्ण की वीरता के बारे में अभिमान और भक्ति उनके हर शब्द-स्वर से छलक रहा था। दूसरा उदाहरण ‘एकच प्याला’ के ‘राजसा बाळा, बघू नको मजकडे’ इस पद का दिया जा सकता है। ‘बघू नको’ के ‘को’ इस अक्षर पर कोमल धैवत पर स्वरांदोलन और उस शब्द को डालना इतना करुण और प्रभावी था कि आँखों में आँसू आ जाते थे। यह परिणाम साधने के लिए कितनी सोच, तद्रूपता और तपस्या होनी चाहिए यह प्रत्यक्ष करके देखने वाले को ही पता चलेगा।
गाते समय गंधर्व का चेहरा कभी उदास नहीं हुआ। पद के अनुरूप भाव हमेशा चेहरे पर रहते थे। उनकी वाणी शुद्ध थी, यानी भाविकों को उचित आर्जव और लाड़लापन उनके गाने में था, स्वरों की सच्चाई भी थी, फिर भी स्वरों के नशे में शब्दों के अ, आ, इ, ई आदि स्वरों के उच्चारण पर उन्होंने कभी अन्याय नहीं किया। सौंदर्य कल्पना में बाधक ऐसा सानुनासिक या डरावनी आवाज उन्होंने कभी नहीं लगाया। यहां तक कि ‘अ’ कार ‘उ’ कार के साथ रेफ (रफार) शुद्धता से नहीं भटके। संवाद हो या पद, लय के खेल में स्वर-दीर्घ की खींचतान न हो, इसके बारे में वे सजग रहते थे।
बालगंधर्व के कंठ मंजूषा में मींड, मुरकी, हरकत, तानों के विविध प्रकार, कण, बेहलाव जैसे अनेक अलंकार मौजूद थे। लेकिन उन्होंने उथलेपन से, अप्रस्तुत लगे ऐसे उस अमीरी का दिखावा नहीं किया। जरूरत पड़ने पर प्रसंग और भावना को शोभा दें, पोषक बनें, ऐसे ही अलंकारों का उपयोग किया। मुख्य बात यह है कि उनकी आवाज में एक ही लगाव में हजारों श्रोताओं के हृदय मंडल को भेद देने वाली ‘पुकार’ यह बड़ा गुण था। वैसी दूसरी पुकार मैंने बेगम अख्तर की आवाज में सुनी।
भिंगरी की तरह घूमने वाली गंधर्व की तान उत्तम लयदार और पेचीदा होती थी। उनका सहज चलने वाला लाड़ला गाना ऊपर से सुगम और प्रासादिक लगने वाले अभंग जैसा होता था। उनके गाने के पीछे की पक्की तालीम और खानदानीपन का साक्षात्कार ज्ञानेश्वर, तुकोबा की आध्यात्मिक परिपक्वता की तरह विद्वानों को भी ‘नेति नेति’ कहने पर मजबूर कर रहा था। गोविंदराव टेंबे, भास्करबुवा बखले और गुरु के स्थान पर बैठे मास्टर कृष्णराव की तालीम और ग्रामोफोन पर सुने गए मौजुद्दीन खाँ, मलकाजान आदि के रिकॉर्ड के संस्कार इन सभी का सम्यक परिणाम यानी गंधर्व गायकी।
23 साल की उम्र में बालगंधर्व ने ‘मानापमान’ में भामिनी प्रस्तुत की। काकासाहेब खाडिलकर के जटिल शब्दयुक्त, पदरचना, चाल और ताल की नवीन योजना के माध्यम से गोविंदराव ने लोकप्रिय बनाया। ‘विद्याहरण’ को भी संगीत टेंबे ने ही दिया, खाडिलकरी पदों के मुखड़े आकर्षक होते हैं, यह निश्चित है! खुद गोविंदराव टेंबे गौहरजान के गाने के भाव प्रदर्शन से बहुत प्रभावित हुए थे, वही गुण उन्होंने गंधर्व के गले में उतारा।
ग्वालियर, आगरा और जयपुर इन तीन घरानों की गायकी को आत्मसात करने वाले पं. भास्करबुवा बखले गुरु के रूप में मिले, यह गंधर्व के जीवन का बहुत महत्वपूर्ण अमृतयोग था। उनकी वजह से गंधर्व के गाने को खानदानीपन की बैठक मिली। बुवा ने जिस रुक्मिणी का गला बनाया, उसमें रागदारी का भारदस्तपन रखते हुए, उसका घरेलूपन, तड़प और प्रेम की आर्तता ये सभी बुवा की स्वर योजना से एकरूप होकर साकार हुए।
मास्टर कृष्णराव ने द्रौपदी, संशयकल्लोल, मेनका, आशा-निराशा आदि नाटकों के लिए जो चालें दीं, वे आकर्षक, सरल लगने वाली और हर तरह से सजाकर गाई जाने योग्य थीं। इन तीनों संगीतकारों की निर्भरता जितनी गंधर्व के लचीले, सुरीले गले पर थी, उतनी ही नाट्यकला के चरणों में झुके हुए उनके भक्तिभाव पर भी थी।
आज जिन्हें ग्लैमरस कहा जा सकता है, ऐसी रुक्मिणी, सुभद्रा, भामिनी जैसी भूमिकाओं में घूमने वाले और रंगमंच को असीम राजवैभव का साक्षात्कार कराने वाले बालगंधर्व को राम गणेश गडकरी के ‘एकच प्याला’ में ‘सिंधु’ के रूप में देखते समय मराठी (और गैर-मराठी भी) दर्शक दिल खोलकर रोए। केवल सुखान्तिका और वैभव के दृश्य हमारी सफलता का रहस्य नहीं हैं, बल्कि जिस भूमिका को निभाना है, उसके साथ तल्लीन होकर किया गया अभिनय, उसे शोभा देने वाला स्वर वैभव ही हमारी सफलता का रहस्य है, यह नारायणराव ने सिद्ध किया, सुधाकर की सिंधु बनकर!