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अविस्मरणीय षोडशी

- मामा पेंडसे

1944 में मुंबई में मरीन ड्राइव पर जो शतसांवत्सरिक नाट्य महोत्सव हुआ था. उस समय, मैंने बालगंधर्व को ‘शारदा’ नाटक में इंदिराकाकू की भूमिका में देखा. तुरंत अगली रात ‘सौभद्र’ नाटक में अर्जुन की भूमिका में देखा. गंधर्व के गायन या अभिनय का प्रभाव मन पर पड़े, ऐसी वे भूमिकाएँ नहीं थीं. गंधर्व की याद रखने लायक भूमिका मैंने उसी साल नासिक में हुए शतसांवत्सरिक महोत्सव में ‘संशयकल्लोळ’ नाटक में रेवती के रूप में देखी. गंधर्व की उम्र उस समय छप्पन थी! विनायकबुवा पटवर्धन आश्विनशेट, गणपतराव बोडस फाल्गुनराव, सदुभाऊ रानडे कृत्तिका, भांडारकर भादव्या, सभी नामचीन पात्र थे. पहले अंक में आश्विनशेट ‘कर हा करी धरिला शुभांगी’ ऐसा कहकर पति-पत्नी का या वैसा ही रिश्ता निश्चित होने से खुश होता है. रेवती ‘सत्यनारायण’ का उसे बताकर जाने लगती है. इस समय उतावलेपन से आश्विनशेट कहता है, ‘अब इस पर एक गोडसा…” और इस क्षण 56 वर्ष की रेवती किसी षोडशी की तरह जो अभिनय करती है वह इतना विलक्षण होता है कि मैं उसे जीवन में भूल नहीं सका. युवा प्रेमी का उतावलापन धूर्त स्त्रियाँ कैसे पूरी तरह से खत्म करती हैं, यह उसका अविस्मरणीय प्रदर्शन था. कई स्त्रियों ने या पुरुष अभिनेताओं ने भी की हुई रेवती की भूमिकाएँ मैंने देखी हैं. लेकिन बालगंधर्व ने अभिनय की जो जगह दिखाई वह मुझे किसी में भी नहीं मिली.. बिल्कुल स्वाभाविक लाड़-प्यार. उनके गायन के बारे में कोई सवाल ही नहीं, युगों-युगों में उनके जैसा कोई एक ही होता है, उनके शब्दोच्चार प्रशंसनीय माने जाते हैं लेकिन मेरे मत में बोडस का उच्चारण गंधर्व से बेहतर था. लेकिन महान व्यक्ति इसमें कोई संदेह नहीं. गुण बड़े और… लेकिन नहीं.

शब्दांकन – रामकृष्ण बाक्रे

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