महान कलाकार
- वी. शांताराम
बालगंधर्व को स्त्री-भूमिका वाले अभिनेता के रूप में ही देखते होंगे. लेकिन मैंने गंधर्व के अभिनय की अपार शक्ति का अनुभव किया था. इसलिए मुझे विश्वास था कि वे कोई भी भूमिका असाधारण रूप से प्रभावी ढंग से निभाएंगे. ‘धर्मात्मा’ फिल्म में एकनाथ के चरित्र को अत्यंत उत्कृष्ट रूप से चित्रित करके नारायणराव ने अपने अभिनय से मेरे विश्वास पर मुहर लगा दी. यह फिल्म मुंबई और मुंबई के बाहर भी काफी सफल रही.
नाटक में उनके लंबे समय तक चलने वाले गाने सुनने वालों को शायद ‘धर्मात्मा’ फिल्म में उनके कुछ मिनटों के गाने सुनकर पूरी संतुष्टि नहीं मिली होगी. लेकिन उनकी आवाज में ही नाटक और माहौल बनाने की जबरदस्त ताकत थी. ‘धर्मात्मा’ में एक दृश्य में वासंती नाचते हुए गाना गाती हुई आती है और उस समय एकनाथ केवल सुरों से उसका साथ देते हैं. वे सुर याद आते ही आज भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं. नारायणराव के गले से निकले वे सुर मैं कभी नहीं भूल सकता. मुझे नहीं लगता कि गाने का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि वह गाना कितनी देर चलता है.
‘धर्मात्मा’ के बाद मैं बालगंधर्व को तुकाराम की भूमिका में पर्दे पर लाना चाहता था. लेकिन नारायणराव ने स्त्री भूमिका में ही पर्दे पर आने का आग्रह किया और ऐसा करना कला पर अत्याचार होगा, ऐसी मेरी धारणा थी, इसलिए हम पूरी ईमानदारी से अनुबंध से मुक्त हो गए.
शब्दांकन – कमलाकर नाडकर्णी