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ऑर्गन से निकलने वाले शब्द

- गोविंद पटवर्धन

मुझे अब ठीक तारीख याद नहीं है. लेकिन शास्त्री हॉल में कार्यक्रम के दौरान नारायणराव के ऑर्गन पर हाथ रखने का पहला मौका मुझे मिला. अगर अनंतराव लिमये ने वह मौका देने की उदारता नहीं दिखाई होती तो मुश्किल होता. ‘मैं साथ कर रहा था’ यह शब्दप्रयोग मेरे मामले में सही है ऐसा मुझे नहीं लगता. मेरे द्वारा नारायणराव के गाने का साथ होता था यह वाक्यप्रयोग अधिक सच्चा है. क्योंकि मेरा संगीत का ज्ञान शास्त्रीय कसौटी पर खरा उतरने वाला नहीं था. जो कानों पर पड़ता वह ऑर्गन से निकलता. यह क्रिया कैसे घटित होती थी यह मैं आज भी बता नहीं पाऊंगा. घटित हुआ यह तो अब सभी जानते हैं. नारायणराव को मेरा साथ पसंद था इसका अप्रत्यक्ष प्रमाण एक दिन अप्रत्याशित रूप से मेरे पास चलकर आया. नारायणराव मुंबई से पुणे जा रहे थे और मेरे बहनोई (पत्नी के भाई) यह संयोग से नारायणराव के सामने की सीट पर बैठे थे. आप कौन, गोविंद पटवर्धन से आपका कोई रिश्ता है क्या वगैरह का बिल्कुल पता न लगने दिए बहनोई ने नारायणराव से पूछा, “हाल ही में गोविंद पटवर्धन को ऑर्गन के साथ के लिए लेते हैं, कैसी लगती है उनकी साथ?” “क्या बताऊं मायबापा वह लड़का सचमुच बहुत अच्छी साथ करता है”- नारायणराव. बहनोई ने पत्र से यह बात मुझे बताई तब ऐसा लगा जैसे शरीर पर मुट्ठी भर मांस चढ़ गया हो. नारायणराव की साथ करते समय ऑर्गन से पद के शब्द निकल रहे हैं ऐसा श्रोताओं को आभास होना चाहिए और मानो नारायणराव के ही शब्द ऑर्गन से अनुकरण करते हुए आ रहे हैं इतना वह सच्चा आभास होना चाहिए ऐसा मुझे लगता था. इस कारण नारायणराव के शब्द उच्चारण पर मेरा बहुत ध्यान रहता था. पिछले कुछ वर्षों में नारायणराव के नाटक रिहर्सल के समय बजाते हुए अन्य नटी जो गलत आघात करती थीं उन्हें ठीक करवाए बिना मुझे चैन नहीं पड़ता था. ‘सुखवी तुला, दुखवी मला’ यह ‘धनराशी दिसता मूढापाशी’ इस पद के शब्द नए जमाने की एक नटी जब ‘ज्ञानबा तुकाराम’ की तर्ज पर कहने लगी तब ‘ऑर्गन के बजाय ताल लो ताल साथ में’ ऐसा मैं चिल्लाया. नारायणराव के गाने का विडंबन था वह. नारायणराव की आवाज साफ होती तो सफेद चार उनका स्वर होता था. उनकी आवाज का तानमान देखकर अनंतराव लिमये उस दिन का स्वर तय करते थे. काली दो भी रखते थे और काली चार में मध्यम करते थे. 20-21 में गंधर्वों ने कंपनी में ऑर्गन दाखिल किया. ऑर्गन के सुर आड़े बिठाए होते हैं और कोदण में बिठाए जैसे होने के कारण वे पेटी से अधिक मधुर. उसमें पुनः सारंगी की मिलावट. गंधर्वों का मूलतः स्वर्गीय गाना अधिक स्वर्गीय क्यों नहीं होगा?

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