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राजहंस के गीत में अपूर्वता

- कुमार गंधर्व

नारायणराव के गायन में दूसरों से अलग क्या था? मुझे नहीं लगता कि नारायणराव ने खुद इस बात पर विचार किया होगा कि उनके गायन में दूसरों से अलग क्या है, उसकी गुणवत्ता क्या है। अगर उन्होंने ऐसा किया होता और अपने ‘हथियार’ इस्तेमाल किए होते, तो मेरा स्पष्ट मत है कि अन्य गायकों के लिए मुश्किल हो जाती। हमारे श्रोता भी इस बात पर खुद विचार नहीं करते कि उन्हें किसी विशेष कलाकार का गाना क्यों पसंद आया। वे किसी और के माध्यम से ऐसा करते हैं। मेरा अनुभवजन्य मत यह भी है कि वे ‘अमुक-तमुक कलाकार के बारे में यह ऐसा कहता है, वह वैसा कहता है’ जैसे किराए के विचारों का बोझ अपने सिर पर लेकर महफिल सुनने जाते हैं। क्या दूसरों के हाथों से अमृत पीना उचित है? मुझे लगता है कि हर समझदार श्रोता को इस बात पर विचार करना चाहिए कि बालगंधर्व के गायन का प्रभाव लोगों के मन पर इतना क्यों था। तो फिर नारायणराव के गायन की वह कौन सी विशिष्टता है जो मुझे पसंद आई? नारायणराव राजहंस के गायन की अपूर्णता यह थी कि, आवाज की कला की दुनिया में बिना आवाज (आघात) किए हर चीज करते हुए वे अपना गाना फूल की तरह श्रोताओं के सामने रखते थे। पूरी तरह अनाघाती! सम पर आते हुए भी अनाघाती ही। जैसे कला-पक्व पेड़ का पत्ता हवा में तैरता हुआ धरती पर आता है, वैसे ही वे आते थे। इससे भी बढ़कर वे एक और चमत्कार करते थे। उसे भी उदाहरण से ही बताना चाहिए। ऊपर से कोई वस्तु आघात से नीचे गिरे तो धूल उड़ती है, यह हम देखते ही हैं। नारायणराव अनाघात से सम पर आते थे तब कुछ भी न गिरने पर भी ‘धूल’ उड़ती थी! श्रोताओं में ‘चैन’ क्यों नहीं पैदा होगी ऐसी चमत्कारपूर्ण धूल के कारण ? यह सब ध्यान में रखा जाए तो उनके गायन में ‘आ’कार को वे विशेष महत्व क्यों देते थे और अकार, इकार, एकार से उनकी निकटता क्यों नहीं थी, इसका खुलासा हो जाएगा। ‘आकार’ अनाघात के लिए बिल्कुल सुविधाजनक।

‘जोहार मायबाप’

मुझे नारायणराव की एक सहज संयोग से हुई डेढ़ घंटे की महफिल को ध्वनिफीता पर उतारने का अवसर मिला था। वह होली का दिन था – हम सभी इंदौर में बंडूभैया चौगुले के घर गाने का आनंद लेने के लिए जमा हुए थे। दातेसाहेब, पी.एल., रामभाऊ गुलवणी, मैं, बंडूभैया, हम सभी। उस दिन नारायणराव और गोहरबाई इंदौर में थे। उन्हें हमारी महफिल की भनक लग गई। बंडूभैया ने हाल ही में अपना निवास स्थान बदला था और यह बात नारायणराव को बिल्कुल पता नहीं थी। उन्हें नया पता ढूंढने में काफी समय लगा। जब वे दोनों सीढ़ियां चढ़कर आए, तब मैं भैरवी शुरू करने की सोच रहा था। नारायणराव सीढ़ियां चढ़कर थक गए थे। घर में प्रवेश करते ही दरवाजे के पास एक बेंच थी, उस पर वे बैठ गए। हम सभी के चेहरों पर उनके आगमन से मुस्कान फैल गई। उनसे कुछ सुनने की अपेक्षा तो थी ही। दातेसाहेब ने अपेक्षा व्यक्त की। नारायणराव ने बिल्कुल भी आनाकानी नहीं की। उन्होंने सुना ही था कि तंबूरे सफेद चार में लगे हुए हैं। पखावज, तबला, बंडूभैया हारमोनियम पर, सारा साज-सामान जैसा हमें चाहिए था, वैसा ही जमा हुआ है, यह देखकर आनाकानी करने का कारण ही क्या था? उस साज-सामान में नारायणराव को पता न होने वाली लेकिन हम सभी के कौतुक का विषय बनी एक वस्तु थी। वह थी आर.सी.ए. का नंबर दो का रिकॉर्डिंग मशीन! उस समय देश में टेप रिकॉर्डर का अब जैसा बोलबाला नहीं था। इसलिए हमें भी उस ‘पुशबटन’ मशीन का कौतुक था।

अपूर्वता

नारायणराव उस बैठक में डेढ़ घंटे तक प्रसन्न मन से गाए। आवाज साथ नहीं दे रही थी लेकिन हम लोगों को, आनंद लेते हुए सुनने लायक उसमें काफी कुछ था। आज जब मैं उस बैठक के बारे में सोचता हूं तो लगता है कि वह ध्वनिमुद्रण मिटाना नहीं चाहिए था। लेकिन उस समय विचार अलग था। फिर कभी नारायणराव का अच्छी आवाज में ध्वनिमुद्रण किया जा सकेगा। आज का मिटाना ही उचित है, ऐसा उस समय लगा। इसलिए बिल्कुल आखिरी 9 मिनट का एक सुंदर ‘पीस’ अलग निकालकर बाकी सारा ध्वनिमुद्रण मैंने मिटा दिया। यह आखिरी ‘पीस’ था ‘जोहार मायबाप जोहार’ इस अभंग का। निरोगी आवाज में। दो धैवत पर सवार हुआ। नारायणराव की विशिष्टता को सर्वांगों से प्रकाशित करने वाला। अब तो मैंने उसे ‘फोर ट्रैक पर’ पुनर्मुद्रित करवा लिया है। नारायणराव के गायन के बारे में कोई अस्थानी बकवास करता है तो मैं उन्हें केवल वही एक ‘पीस’ सुनाकर चुप करा देता हूं। नारायणराव के प्रशंसकों ने उत्सुकता दिखाई तो उन्हें भी सुनाता हूं। हर बार सुनते हुए मेरा भी आनंद शतगुणित होता रहता है। क्योंकि उस महान कलाकार की बीमारी कल्पना में भी नहीं थी तब का ध्वनिमुद्रण है वह।

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