बहुत सुंदर
- मल्लिकार्जुन मंसूर
गंधर्व कंपनी हमेशा हुबली आती थी. उस समय मैं छोटा था. शायद बीस-बाईस साल का. हम दोस्त लोग उनके नाटक देखने जाते थे. देखने का मतलब क्या है? नाटक देखने के बहाने हम उनके पद सुनने जाते थे. उनके स्टेज पर स्वरों की भरमार होती थी. विंग में एक-एक ऑर्गन. आगे बड़ा ऑर्गन. उसके दोनों तरफ दो सारंगियां. तबले पर तिरखवाँ. जिससे पूरा थिएटर सुरमय हो जाता था. नारायणराव का गाना ईश्वरीय देन ही था. किसी का गला अच्छा होता है. किसी के पास सिर्फ बुद्धि होती है. तो किसी की गायकी में सहजता होती है. लेकिन नारायणराव में इन तीनों का ‘सर्वांगी सुंदर’ ऐसा अपूर्व संगम हुआ था. ‘पुनश्च’ लेकर आधे-आधे घंटे तक भी वे एक पद गाते थे. उसे सुनते हुए हमें ऐसा लगता था कि भरी गर्मी में हम स्वरों के ठंडे शॉवरबाथ के नीचे बैठे हैं. उस गले में जरा भी दोष नहीं था. गले का मोड़ अप्रतिम. जिससे उनकी गायकी की हरकतें बिल्कुल पेळूतून सूत कातल्या जितनी आसानी से आती थीं. गाते समय वे इतने तल्लीन हो जाते थे कि यह सज्जन आत्मानंद के लिए गा रहे हैं, यह सामने बैठे दर्शक को तुरंत पता चल जाता था. पर्दे के आगे भले ही गंधर्व गा रहे हों, लेकिन उनके पीछे उनके गान-गुरु भास्करबुवा बखले की मूर्ति घूम रही है, ऐसा लगता था. क्योंकि नाट्यगायन कैसा होना चाहिए, इसकी पूरी तालीम भास्करबुवा ने ही उन्हें दी थी. भास्करबुवा खुद किर्लोस्कर कंपनी में गायक नट होने के कारण स्टेज के हिसाब से कैसे गाना है, यह उन्हें ठीक से पता था. उन्होंने असली चीजें, राग-रागिनियों में बंधी हुई अत्यंत सुंदर पद नारायणराव को ऐसे सिखाए थे कि गाना न समझने वाले को भी बिल्कुल मंत्रमुग्ध जैसा लगे.
कलाकार की कोई जाति नहीं होती
उस समय सभी संगीत नाटकों की पूरी किताबें भले ही न निकलती हों, लेकिन पद्यावलियां निकलती थीं. उनमें पद के राग का नाम, ताल, चाल दी होती थी. ऐसे इन नाटकों के पदों के कारण ही शास्त्रीय संगीत की पहचान और प्रसार चारों ओर हुआ. भूप राग कैसा होता है – तो ‘सुजन कसा मन चोरी’ में नारायणराव गाते हैं वैसा – यह सामान्य से सामान्य व्यक्ति को भी समझ में आने लगा. उस समय हुबली के सभी लोगों को मराठी कहां समझ में आती थी? लेकिन गंधर्व कंपनी के नाटकों को लोग ऐसी भीड़ करते थे कि पूछो मत. मराठी ठीक से न समझने वाले कन्नड़ दर्शक ‘मानापमान’ खत्म होने पर आपस में कहते थे, “माना आयतु. अपमाना आयतु. आदरे मानप्पा बरलिल्ला.” मतलब “मान हुआ. अपमान हुआ. फिर भी (अंत तक) मानप्पा नहीं आया.” मतलब लोग यह गंधर्वों के शब्दों के लिए नहीं बल्कि सुरों के लिए जाते थे. जातिगत अभिनय समझने के लिए उन्हें भाषा आना आवश्यक नहीं लगता था. जिस समय पहली पंक्ति का किराया तीन रुपये और पिट का चार आने था, उस समय नारायणराव तीन-तीन हजार की बुकिंग हुबली के गणेशपेठ थिएटर या मल्लिकार्जुन रंगमंडप में लेते थे. दूर-दूर के लोग आठ-आठ दिन पहले तार से रिजर्वेशन करते थे. अधिकांश लोग बैलगाड़ी जोड़कर नाटक देखने आते थे. नारायणराव के कारण आम जनता में गाने की रुचि पैदा हुई, इस सत्य को कोई नकार नहीं सकता. खुद को चार-पांच घंटे तक ही सही, पूरी तरह से भुला देने वाला नाटक-गायन क्या चीज है, यह नारायणराव ने सिद्ध करके दिखाया. एक मजेदार बात बताता हूं. हुबली में रविवार दोपहर को नारायणराव ‘एकच प्याला’ का हाथखंडा प्रयोग लगाते थे. उसमें उनकी सिंधु की अविस्मरणीय भूमिका होती थी. लेकिन अंत में सिंधु मर जाती है. तब बुधवार रात को ‘मानापमान’ में भामिनी के रूप में या ‘संशय कल्लोळ’ में रेवती के रूप में गंधर्व को फिर से जीवित देखकर ही भोले-भाले लोग अपने-अपने गांव लौटते थे. इतनी उनकी नारायणराव पर अपूर्व भक्ति थी. गंधर्व सबके थे. ‘सारेगम’ महाराष्ट्र में अलग और कर्नाटक में अलग ऐसा थोड़ी होता है? कलाकार की कोई जाति नहीं होती. उसे बस सबके लिए गाते रहना होता है.
नादब्रह्म की लगन जब तक
मंजीखाँसाहेब के निधन के कुछ ही दिनों बाद बड़ौदा में एक म्यूजिक सर्कल स्थापित हुआ था. फत्तेसिंहमहाराजा ने उसका उद्घाटन किया. वहां मेरा गाना अभी-अभी खत्म हुआ था. इतने में हॉल में नारायणराव को कुर्सी से लाया गया. उन्हें चलने में परेशानी अभी-अभी शुरू हुई थी. मुझे देखते ही मुझे गले लगाकर ‘अपने मंजीखाँसाहेब चले गए हो’ कहते हुए वे छोटे बच्चे की तरह फूट-फूट कर रोने लगे. भास्करबुवा ने मंजीखाँसाहेब का गंडा ‘बांधा था और अल्लादियाखाँसाहेब के तो मंजीखाँ सुपुत्र थे. नारायणराव की भावनाओं का यह स्वाभाविक और पारदर्शी उद्रेक देखकर वहां उपस्थित सभी का गला भर आया. नारायणराव ने मुझे फिर से गाने को कहा. डेढ़ घंटे गाने के बाद नारायणराव के चेहरे पर पूर्ण संतोष झलक रहा था.नारायणराव हमारे ही घर के हैं, ऐसा लगने का एक और कारण था. मेरे भाई बसवराज ने ‘विश्वदर्शन नाटक कंपनी’ शुरू की थी. उसमें वे हीरो का काम करते थे. उनके पास कर्नाटक गोहर हिरोइन थी. गोहर की नारायणराव पर तब बहुत भक्ति थी. वे उनकी तस्वीर की पूजा करती थीं. वह उनके गाने की भी हूबहू नकल करती थीं. कन्नड़ में उनके रिकॉर्ड्स भी निकले थे. उनके जैसे ही कर्नाटक-गंधर्व गंगाधरप्पा भी नारायणराव और केशवराव भोसले की डिट्टो नकल करते थे. लेकिन आखिर नकल तो नकल ही होती है. उसे बावनकशी असली की प्रतिष्ठा कैसे मिलेगी? नारायणराव मतलब अकेले नारायणराव. फिर वैसा कोई दूसरा नहीं होगा. काल अनंत है. पृथ्वी विपुल है. पसंद-नापसंद की छलनियाँ भी बहुत हैं, होंगी. आप-हम समय के साथ नामशेष हो जाएँगे लेकिन जब तक लोगों को नादब्रह्म की लगन है तब तक बालगंधर्व और उनके जैसी ही बेगम अख्तर ये व्यक्ति अमर रहेंगे.