मधुरता की पराकाष्ठा
- सुधीर फड़के
बालगंधर्व ईश्वर द्वारा भेजे गए व्यक्ति थे. स्वयं ईश्वर को भी दोबारा वैसा व्यक्ति बनाने में संदेह होगा. मैंने इस ईश्वरीय गायक की एकलव्य की तरह उपासना की है, ऐसा मेरा विनम्र दावा है. शास्त्रीय संगीत मधुर होता है, श्रवणीय होता है, यह जनसामान्य को समझाने वाली हीराबाई थीं. लेकिन उनसे भी पहले यदि किसी ने जनसामान्य पर इसका जादू चलाया होगा तो वे बालगंधर्व थे. हीराबाई और बालगंधर्व की गायन शैली में मुझे शुरू से ही बहुत समानता महसूस होती रही है. इसलिए मैंने पहले हीराबाई के गायन का अध्ययन किया और उसका लाभ यह हुआ कि बाद में बालगंधर्व का गायन आत्मसात करना मेरे लिए ज्यादा आसान हो गया. मजेदार बात यह है कि दो परस्पर विरोधी गायन पद्धतियों का मेरा अध्ययन एक ही समय में चल रहा था. गुरुवर्य पाध्येबुवा के पास उनके विद्यालय के बाहर घर पर, दरवाजे पर, रास्ते से जाते हुए, पागलपन की तरह हीराबाई और गंधर्व की गायन शैली का.
गंधर्व के भजन
बालगंधर्व की ध्वनिमुद्रिकाओं से ही उनकी गायन शैली का मेरा सारा अध्ययन हुआ ऐसा नहीं है. बचपन में मुंबई में रॉयल ओपेरा में मैंने उनका ‘स्वयंवर’ नाटक देखा था. 1934 में जब गंधर्व कंपनी कोल्हापुर आई थी तब ‘कान्होपात्रा’ देखा, ‘एकच प्याला’ देखा. 1930 से हीराबाई के गाने का जुनून तो था ही. अब कोल्हापुर में गंधर्व के सभी नाटक मुझे देखने को मिलना असंभव था. लेकिन जब तक कंपनी कोल्हापुर में थी तब तक हर गुरुवार को अंबाबाई के मंदिर में राम के चबूतरे पर गंधर्व के भजन होते थे. भारी भीड़ होती थी. मैंने वे भजन कभी नहीं छोड़े. अक्टूबर 1936 से मैं मुंबई में रहने लगा. मुंबई में भी नाना शंकरशेट के मंदिर में बालगंधर्व, लोंढे, वालावलकर ये लोग भजन के लिए खड़े होते थे. हरिभाऊ देशपांडे ऑर्गन पर होते थे और साथ में पखावज. ये भजन ही मेरे अध्ययन के पाठ होते थे. नारायणराव की कितनी ही जगहें ऐसे समय में बुद्धि पर रजिस्टर हो जाती थीं.
गंधर्वपद्धति की संगीत रचना
जब मैं एच.एम.वी. में संगीत निर्देशक बना तब ‘नंदलाला नाचरे’ और ‘विनवित शबरी रघुराया रे’ ये दो गाने हीराबाई से और ‘सावळाच रंग तुझा’ और ‘गोकुळीचा राजा, माझा’ ये माणिक वर्मा से गवाकर ध्वनिमुद्रित किए. ये चारों गाने बहुत प्रसिद्ध हुए. उन्हें सिखाते समय भी नारायणराव की पद्धति गायकों के गले से उतरे ऐसा प्रयास रहता था. 1950 में मैंने ‘विठ्ठलरखुमाई’ यह फिल्म बनाने का फैसला किया. उसमें तुकाराम का काम बालगंधर्व करें ऐसी मेरी इच्छा थी. वह फिल्म एक, संतमालिका में से एक फिल्म ही थी. ज्ञानेश्वर, एकनाथ आदि. बालगंधर्व नागपुर में श्रीमंत बाबूराव देशमुख के पास ठहरे हुए थे. वहां के आकाशवाणी केंद्र के एक अधिकारी श्री. सीताकांत लाड के पास जाकर नारायणराव से मुलाकात की. करार हुआ. उस समय 12 हजार रुपये में बालगंधर्व मिले. आज नारायणराव की शैली की जो धुनें प्रसिद्ध हो रही हैं वे अभंग हैं, ‘शरण शरण नारायणा’, ‘वेद अनंत बोलिला’, ‘विष्णुमय जग’, ‘आम्ही जातो आमुच्या गावा’. ये अभंग नारायणराव को ही गाने थे. इसलिए नारायणराव की पद्धति के ज्यादा करीब ऐसी संगीत रचना मैंने की. मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूं कि उस समय के अन्य संगीत रचनाकारों में से गंधर्वपद्धति के करीब ऐसी रचना किसी और ने की होती या नहीं इस बारे में मेरे मन में संदेह है. लेकिन इस फिल्म के कारण बालगंधर्व से बहुत करीबी संबंध बन गए. इतने कि एक बार तो मुझसे थोड़ी हिम्मत ही हो गई. ‘विष्णुमय जग वैष्णवांचा धर्म’ यह अभंग सिखाते समय मैं उन्हें ‘रेम सा नि सासा’ यह जगह बता रहा था और वे बार-बार ‘रेम सा सा’ ले रहे थे. मैंने उन्हें स्वर उच्चारण करके सुधारने का प्रयास किया. उस महान आत्मा ने क्या कहा ? वे बोले, ‘सुधीरराव, वह सरगम बिरगम नहीं हो समझ आती मुझे!’ मैं दिड्यूढ हो गया! उन्हें सच में सरगम समझ नहीं आती थी या उन्होंने यूं ही अज्ञान दिखाया? सच में उन्हें समझ नहीं आती होगी तो उन्हें परमेश्वर ही कहना चाहिए.
सारी जगहें गंधर्व की
पच्चीस-तीस साल पहले नारायणराव का गाना जैसा मैं दिखा सकता था वैसा आज दिखा नहीं सकता. ‘सुवासिनी’ फिल्म में ‘येणार नाथ आता’ यह पद आशाबाई ने गाया है. गंधर्व जिस पद्धति से जगहें लेते वैसे ही आशाबाई से ली जाएं ऐसे प्रयास मैंने किए और आशाबाई ने उन प्रयासों का सोना कर दिया. वही बात गीतरामायण में ‘मज सांग अवस्था दूता रघुनाथाची’ इस पद की. माणिक वर्मा ने वह गाया है. सारी जगहें गंधर्व की. एकलव्य की आराधना मैंने शुरू की. उस उम्र में बालगंधर्व के गाने का शब्दों में वर्णन करने की मेरी क्षमता नहीं थी. ‘वह अच्छा है, कान को मधुर लगता है’ बस इतना ही उस समय लगता था. अब लगता है कि बालगंधर्व तन्मयता से गा रहे थे. गाते समय उनके शब्दोच्चार स्वच्छ और मधुर होते थे.स्वच्छ उच्चारण और मधुर व स्वच्छ उच्चारण करने वाले असाधारण. इन असाधारण व्यक्तियों में बालगंधर्व सर्वश्रेष्ठ थे. ऐसे ही दूसरे असाधारण गायक थे कुंदनलाल सहगल. लेकिन वे बंगाल के थे. बालगंधर्व यानी सुरेलेपन की पराकाष्ठा. यह बताना मुश्किल है कि वे अधिक सुरेले थे या ऑर्गन अधिक सुरेला था. लय का ज्ञान गंधर्वों की तान यानी मानो मोतियों की लड़ी. एक-एक मोती सफाई से और शान से गूंथा जाकर वह दानेदार तान लड़ी बनती थी. चार या आठ मात्राओं के ताल में हर गवैया गाता है. लेकिन उन आठ मात्राओं में हर पावमात्रा को, आधी मात्रा को लय होती है, इसका ज्ञान गंधर्वों को था. आठ मात्राओं में आने वाले पद के शब्द और उन शब्दों के अक्षर, कुछ आधी तो कुछ पौने दो मात्राओं में अर्थानुकूलता को बिगड़ने न देते हुए उच्चारित होते थे. उन स्वरों को भी लय होती है. उस लय को भी बिगड़ने न देना यह सब बालगंधर्व सावधानीपूर्वक संभालते थे. स्वरों में लय और शब्दों में विशिष्ट लय यदि नहीं संभाली गई तो उस स्वर माध्यम से उच्चारित होने वाले शब्दों का जो परिणाम होना आवश्यक होता है वह नहीं होता. यह जागरूकता जन्म से ही उनके बुद्धि में ईश्वर ने डाली होगी और यह सब समझकर ही वे गाते थे ऐसा ही मुझे लगता है. उन्हें जो समझ में आता था उसकी पराकाष्ठा उन्होंने प्राप्त कर ली थी. बालगंधर्व के गाने अनेक गायक गायिका उत्तम तरीके से गाते हैं. लेकिन बालगंधर्व किसी को समझ में आए हैं ऐसा मुझे नहीं लगता. बिल्कुल इस क्षण तक नहीं लगता. उनकी गायकी छोटे गंधर्वों को नब्बे प्रतिशत समझ में आई है लेकिन वे सिर्फ स्वरों में गंधर्वों की ज्यादा से ज्यादा याद दिलाते हैं. माणिक वर्मा भी बालगंधर्वों की याद दिलाती हैं. लेकिन उनके गाने की जड़ तक कोई नहीं गया है. ध्वनिमुद्रिका याद करके गाने वाले सभी हैं. इसीलिए युगों-युगों में शायद ही होने वाला इंसान यानी बालगंधर्व.