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गायन का फूल

रघुरामय्या जैसे मराठी प्रांत के बाहर के कितने ही श्रेष्ठ कलाकार और रसिक इस सौवें जन्मदिन की भेंट के रूप में अपनी स्मृतिपटल में सँजोई हुई बालगंधर्व की यादें लेकर आए हैं। साहित्य, संगीत, नाट्य के क्षेत्र में असाधारण रहे हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय ने बालगंधर्व के स्त्री भूमिका में सफलता का रहस्य कितनी अच्छी तरह बताया है। वे कहते हैं “उनके अंदर एक स्त्री छिपी हुई थी। मेकअप के लिए बैठते ही वह स्त्री खिल उठती… बाकी के स्त्रीपात्र स्त्री-पात्र ही रहे। गंधर्व स्त्रीमन के निरूपक बन गए।” हरेंद्रनाथ ने गंधर्व के स्त्री भूमिका से तादात्म्य प्राप्त करने के गुण का रहस्य खोजने का प्रयास किया तो कुमार गंधर्व ने उनके गायन की अपूर्वता दिखाते हुए कहा है “उनके गायन की अपूर्वता यह थी कि आवाज की कला की दुनिया में ‘आवाज’ (आघात) न करते हुए वे हर चीज करते… नारायणराव की विशेषता यह थी कि वे अपना गाना फूल की तरह श्रोताओं के सामने रखते।”

मुझे कुमारजी का गायन का फूल श्रोताओं के सामने रखने का दृष्टांत बहुत पसंद आया। और ऐसा लगा कि इस अंक के सभी लेख भी विभिन्न क्षेत्रों और प्रांतों के लेखकों ने बालगंधर्व के सौवें जन्मदिन की भेंट के रूप में फूल लाकर देने की तरह ही कोमलता से कागज पर उतारे हैं। कॉमरेड डांगे जैसा, जिसने अपना पूरा जीवन मजदूरों के संघर्षों के रणभूमि पर बिताया, वह योद्धा भी बालगंधर्व की याद से चित्त में कोमलता लाकर ‘गंधर्वप्रेमी’ का बिरुद एक समय में हम कैसे गर्व से धारण करते थे, यह बताते हुए यहाँ दिख रहा है। डांगे की इस स्मरण कथा से बालगंधर्व के दर्शन तो होते ही हैं, लेकिन “इंकलाब जिंदाबाद”, “क्रांति चिरायु हो” के नारे लगाने वाले डांगे जेल में ‘दया छाया ये’ जैसे गाने गुनगुनाते थे, यह पढ़कर वे और भी करीब लगने लगते हैं।

लाखों की भावना

बालगंधर्व की यह एक विशेषता थी। उनकी आवाज में चाहे गद्य हो या गाना। सीधे दिल को छू जाते थे। जिस राग में गाते थे, वह राग ही भाषा बनकर श्रोताओं से संवाद करता था। जैसे नटखट संवाद होते रहते हैं, वैसे ही वे स्वरसंवाद मन में गूँजने लगते थे। फिर हमें गाना आए या न आए। वे गाना मुखस्वादे से ही उच्चारते थे। घर-घर में इन गानों के फेरे ब्रह्मधाय के होते थे। फिर गाने को आवाज हो या न हो। संगीत के क्षेत्र में बालगंधर्व के समकाल में मुक्ति देने के लिए तरसना यानी तंत्र और आरतियों से आगे न जाने वाले अनेक मराठी परिवारों के परिवार बालगंधर्व ने ‘गाती’ किए।जहाँ से ‘नारी अंजनी सुत रामदूतप्रभंजन’ सुनाई देता था, वहीं से ‘नटर कृष्णा समान’, ‘स्कूल में तुझसा सूनाल बक’ सुनाई देता था. फिर हम और नहीं मैं बोल रही हूँ बाई! ऐसा आनंद लेना था. गाना नायिकाओं के मुँह से ‘कविता को गाना पवित्रता में’ ऐसी हम समझी थी. गायक ने कड़क आवाज़ में गाना मुकर किया, जुळूक काळजी पक्कज नहीं बल्कि किसी कविज्ञ जैसी मराठी भावगायिकाओं के संसार के धाकधसास को अच्छी तरह से झुळझुळीत किया.

इस सदी की शुरुआत में बालगंधर्व के अभिनय के कारण कई जोड़ों को विनय न छोड़ते हुए सुभलिलास मोहक विषम कैसे होते हैं, इसका मानो सर्टिफिकेट मिला. सालों से न बदली हुई वेशभूषा बदली. केशभूषा बदली. अलंकार बदले. इस विशेषकाल में श्री. वेळकर के लोळता वेशभूषा के बारे में बालगंधर्व की कसता का ऐसा बहुत मार्मिक तूतान है. मुझे बालगंधर्व की उस मोहक और एककाल में बहुत महान ऐसी वेशभूषा के हेसोंगास वाली भावना और गोती की ऐतिहासिक भूमिका और त्यजत्नादनिंदगतेमुळे यह अभिनय के उंबरठे पर रहती है, इस देवती की शुरुआत में घुमायसकरत्या शब्द के ‘भारतव्यापी’ भांडगोरांच्या प्रेम करनी चाहिए, यह वह लाघ मोलाची भावना!

वे दर्शकों को ‘अन्नदाता मायबाप’ कहते थे. फिर वह निजी बातचीत हो या सार्वजनिक भाषण हो. अक्सर यह लाचारी लगती थी. माता-पिता के चरणों में सिर रखना अगर लाचारी है तो बालगंधर्व का दर्शकों को ‘मायबाप’ कहना लाचारी कहना चाहिए. जिससे अपने रंगमंच की दुनिया में अस्तित्व सिद्ध हुआ, वह दर्शक अन्नदाता माता-पिता की जगह दिखते हैं तो उसमें

क्या गलती है ?

नाटक एक ऐसी कला है जो दर्शकों के बिना सिद्ध नहीं होती. खुद सुख का गा सकते हैं, रंग काट सकते हैं, लिख सकते हैं लेकिन अभिनय खाली दर्शकों के बिना संभव नहीं है. इन सभी के अनुसार दर्शकों को जाते हुए देखना चाहिए. रंगमंच को दर्शक आते हैं. वह संख्या कम होती जाती है, इसके निश्चित कारण बताना संभव नहीं है. कई कारणों से लोकशिक्षण बदलता है. हम कहते हैं कि समय बदल रहा है. वास्तव में लोग बदलते हैं. इसके कई कारण होते हैं. सौ साल पहले समाज, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक स्थिति, लोगों की हर बात में पसंद-नापसंद. नीति-अनीति विचार करने में जमीन-आसमान का फर्क पड़ा. इस बदलाव को पहले पक्के लोकशिक्षण बताते हैं, इस बदलाव को अंत आएगा ऐसा कहकर टालना नहीं चलेगा. नटनाट्यकसाच्या रूपिनी कलावंत में यह धीपायू से उद्गम सूप होता है. एक संमुलखात लोकशिक्षण को ताड़काड्याचा कड़कड़ाट फव्वारे पर नींबू की तरह धीरे से झेल लिया होता है. देहभान खोकर उसके कई प्रकार के रूप देखे होते हैं. वे रूप नट के मन में भी नाचते रहते हैं. दर्शकों ने ठुकराया भी तो वे रूप रंगमंच पर आने के लिए अंदर ही अंदर तांडव मचाते रहते हैं. आत्मा आतुर होती है. लेकिन देह दुर्बल हो गया होता है. देह की ऐसी दुर्बल अवस्था में जिन्होंने बालगंधर्व का अभिनय देखा, गाने सुने, उनमें से जिन्हें उस भग्नशिल्प में टूटे हुए स्थान की रिक्तियों को स्मरण से भर पाना संभव हुआ, उन्हें उस वृद्ध नारायणराव में बालगंधर्व दिखे. ऐसा यह बालगंधर्व उनके गाने में ठीक कहाँ था, इसका विवरण डॉ. शरत्त्वंद गोखले ने इस अंक में बहुत मार्मिक तरीके से किया है. गहरे व्यासंगाला रसिकत्वाचा अमृतस्पर्श हुआ हो तो विवरण भी गाने की महफिल जैसा कैसे होता है, इसका डॉ. गोखले का लेख एक सुंदर उदाहरण है.

बालगंधर्व और बेगम अख्तर

रघुरामय्या जैसे मराठी प्रांत के बाहर के कितने ही श्रेष्ठ कलाकार और रसिक इस सौवें जन्मदिन की भेंट के रूप में अपनी स्मृतिपटल में सँजोई हुई बालगंधर्व की यादें लेकर आए हैं। साहित्य, संगीत, नाट्य के क्षेत्र में असाधारण रहे हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय ने बालगंधर्व के स्त्री भूमिका में सफलता का रहस्य कितनी अच्छी तरह बताया है। वे कहते हैं “उनके अंदर एक स्त्री छिपी हुई थी। मेकअप के लिए बैठते ही वह स्त्री खिल उठती… बाकी के स्त्रीपात्र स्त्री-पात्र ही रहे। गंधर्व स्त्रीमन के निरूपक बन गए।” हरेंद्रनाथ ने गंधर्व के स्त्री भूमिका से तादात्म्य प्राप्त करने के गुण का रहस्य खोजने का प्रयास किया तो कुमार गंधर्व ने उनके गायन की अपूर्वता दिखाते हुए कहा है “उनके गायन की अपूर्वता यह थी कि आवाज की कला की दुनिया में ‘आवाज’ (आघात) न करते हुए वे हर चीज करते… नारायणराव की विशेषता यह थी कि वे अपना गाना फूल की तरह श्रोताओं के सामने रखते।”

मुझे कुमारजी का गायन का फूल श्रोताओं के सामने रखने का दृष्टांत बहुत पसंद आया। और ऐसा लगा कि इस अंक के सभी लेख भी विभिन्न क्षेत्रों और प्रांतों के लेखकों ने बालगंधर्व के सौवें जन्मदिन की भेंट के रूप में फूल लाकर देने की तरह ही कोमलता से कागज पर उतारे हैं। कॉमरेड डांगे जैसा, जिसने अपना पूरा जीवन मजदूरों के संघर्षों के रणभूमि पर बिताया, वह योद्धा भी बालगंधर्व की याद से चित्त में कोमलता लाकर ‘गंधर्वप्रेमी’ का बिरुद एक समय में हम कैसे गर्व से धारण करते थे, यह बताते हुए यहाँ दिख रहा है। डांगे की इस स्मरण कथा से बालगंधर्व के दर्शन तो होते ही हैं, लेकिन “इंकलाब जिंदाबाद”, “क्रांति चिरायु हो” के नारे लगाने वाले डांगे जेल में ‘दया छाया ये’ जैसे गाने गुनगुनाते थे, यह पढ़कर वे और भी करीब लगने लगते हैं।

लाखों की भावना

बालगंधर्व की यह एक विशेषता थी। उनकी आवाज में चाहे गद्य हो या गाना। सीधे दिल को छू जाते थे। जिस राग में गाते थे, वह राग ही भाषा बनकर श्रोताओं से संवाद करता था। जैसे नटखट संवाद होते रहते हैं, वैसे ही वे स्वरसंवाद मन में गूँजने लगते थे। फिर हमें गाना आए या न आए। वे गाना मुखस्वादे से ही उच्चारते थे। घर-घर में इन गानों के फेरे ब्रह्मधाय के होते थे। फिर गाने को आवाज हो या न हो। संगीत के क्षेत्र में बालगंधर्व के समकाल में मुक्ति देने के लिए तरसना यानी तंत्र और आरतियों से आगे न जाने वाले अनेक मराठी परिवारों के परिवार बालगंधर्व ने ‘गाती’ किए।जहाँ से ‘नारी अंजनी सुत रामदूतप्रभंजन’ सुनाई देता था, वहीं से ‘नटर कृष्णा समान’, ‘स्कूल में तुझसा सूनाल बक’ सुनाई देता था. फिर हम और नहीं मैं बोल रही हूँ बाई! ऐसा आनंद लेना था. गाना नायिकाओं के मुँह से ‘कविता को गाना पवित्रता में’ ऐसी हम समझी थी. गायक ने कड़क आवाज़ में गाना मुकर किया, जुळूक काळजी पक्कज नहीं बल्कि किसी कविज्ञ जैसी मराठी भावगायिकाओं के संसार के धाकधसास को अच्छी तरह से झुळझुळीत किया.

इस सदी की शुरुआत में बालगंधर्व के अभिनय के कारण कई जोड़ों को विनय न छोड़ते हुए सुभलिलास मोहक विषम कैसे होते हैं, इसका मानो सर्टिफिकेट मिला. सालों से न बदली हुई वेशभूषा बदली. केशभूषा बदली. अलंकार बदले. इस विशेषकाल में श्री. वेळकर के लोळता वेशभूषा के बारे में बालगंधर्व की कसता का ऐसा बहुत मार्मिक तूतान है. मुझे बालगंधर्व की उस मोहक और एककाल में बहुत महान ऐसी वेशभूषा के हेसोंगास वाली भावना और गोती की ऐतिहासिक भूमिका और त्यजत्नादनिंदगतेमुळे यह अभिनय के उंबरठे पर रहती है, इस देवती की शुरुआत में घुमायसकरत्या शब्द के ‘भारतव्यापी’ भांडगोरांच्या प्रेम करनी चाहिए, यह वह लाघ मोलाची भावना!

वे दर्शकों को ‘अन्नदाता मायबाप’ कहते थे. फिर वह निजी बातचीत हो या सार्वजनिक भाषण हो. अक्सर यह लाचारी लगती थी. माता-पिता के चरणों में सिर रखना अगर लाचारी है तो बालगंधर्व का दर्शकों को ‘मायबाप’ कहना लाचारी कहना चाहिए. जिससे अपने रंगमंच की दुनिया में अस्तित्व सिद्ध हुआ, वह दर्शक अन्नदाता माता-पिता की जगह दिखते हैं तो उसमें

क्या गलती है ?

नाटक एक ऐसी कला है जो दर्शकों के बिना सिद्ध नहीं होती. खुद सुख का गा सकते हैं, रंग काट सकते हैं, लिख सकते हैं लेकिन अभिनय खाली दर्शकों के बिना संभव नहीं है. इन सभी के अनुसार दर्शकों को जाते हुए देखना चाहिए. रंगमंच को दर्शक आते हैं. वह संख्या कम होती जाती है, इसके निश्चित कारण बताना संभव नहीं है. कई कारणों से लोकशिक्षण बदलता है. हम कहते हैं कि समय बदल रहा है. वास्तव में लोग बदलते हैं. इसके कई कारण होते हैं. सौ साल पहले समाज, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक स्थिति, लोगों की हर बात में पसंद-नापसंद. नीति-अनीति विचार करने में जमीन-आसमान का फर्क पड़ा. इस बदलाव को पहले पक्के लोकशिक्षण बताते हैं, इस बदलाव को अंत आएगा ऐसा कहकर टालना नहीं चलेगा. नटनाट्यकसाच्या रूपिनी कलावंत में यह धीपायू से उद्गम सूप होता है. एक संमुलखात लोकशिक्षण को ताड़काड्याचा कड़कड़ाट फव्वारे पर नींबू की तरह धीरे से झेल लिया होता है. देहभान खोकर उसके कई प्रकार के रूप देखे होते हैं. वे रूप नट के मन में भी नाचते रहते हैं. दर्शकों ने ठुकराया भी तो वे रूप रंगमंच पर आने के लिए अंदर ही अंदर तांडव मचाते रहते हैं. आत्मा आतुर होती है. लेकिन देह दुर्बल हो गया होता है. देह की ऐसी दुर्बल अवस्था में जिन्होंने बालगंधर्व का अभिनय देखा, गाने सुने, उनमें से जिन्हें उस भग्नशिल्प में टूटे हुए स्थान की रिक्तियों को स्मरण से भर पाना संभव हुआ, उन्हें उस वृद्ध नारायणराव में बालगंधर्व दिखे. ऐसा यह बालगंधर्व उनके गाने में ठीक कहाँ था, इसका विवरण डॉ. शरत्त्वंद गोखले ने इस अंक में बहुत मार्मिक तरीके से किया है. गहरे व्यासंगाला रसिकत्वाचा अमृतस्पर्श हुआ हो तो विवरण भी गाने की महफिल जैसा कैसे होता है, इसका डॉ. गोखले का लेख एक सुंदर उदाहरण है.

बालगंधर्व और बेगम अख्तर

विद्वान समीक्षक, प्रतिभावान साहित्यकार, कलावंत मंडली, इस अद्वितीय कलावंत के मात्र स्मरण से अत्यंत लीन हुई यहाँ दिखती हैं. बड़े आनंद से बालगंधर्व का ऋण स्वीकार करते हैं. कर्नाटक के डॉ. शिवराम कारंथ जैसे ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता, चतुरस्त्र कलावंत, मान्यवर विचारक, समाजधुरीण, “अभिनय क्या है इसकी समझ आने के बाद मैंने जिन नटों को देखा उनमें बालगंधर्व के बराबर का अभिनय फिर नहीं दिखा” ऐसे शब्दों में नारायणराव की महानता बताते हैं- डॉ. शिवराम कारंथ ने नारायणराव के अभिनय में अद्वितीयत्व स्वीकार किया है तो गोवा के मलबाराव सरदेसाई यह प्रसिद्ध तालशास्त्रज्ञ लयभास्कर खाप्रूमामा पर्वतकरांचे शिष्य. उन्होंने अपने गुरु के ही उद्गार दिए हैं. वह “लय देखनी चाहिए गंधर्व के गाने में.” सारा जीवन दीनानाथराव मंगेशकर के साथ बलवंत नाटक मंडली में बिताए हुए आज नब्बे के दशक में पहुँचे परशराम सामंत सहजता से बालगंधर्व के गाने का मर्म बता जाते हैं- “नारायणराव गाते समय गा रहे हैं ऐसा लगता नहीं था. संगीत में बोल रहे हैं ऐसा लगता था.” अभिजात-भारतीय संगीत में जिन्हें ‘लास्ट ऑफ द रोमन्स’ कहना चाहिए ऐसे पं. मल्लिकार्जुन मन्सूर और ख्याल गायकी की श्रेष्ठ गायिका पद्मावती शालिग्राम गोखले. दोनों ने भी गौरव से उल्लेख किया है वह बालगंधर्व और बेगम अख्तर का.मल्लिकार्जुन कहते हैं… “जब तक लोगों को नादब्रह्म की चाह है, तब तक बालगंधर्व और उनके जैसी बेगम अख्तर जैसी शख्सियतें अमर रहेंगी।” पद्मावतीबाई कहती हैं, कि ‘हमने जो आदर्श रखे थे, वे बालगंधर्व और बेगम अख्तर के थे!’ यह पढ़कर भारतीय संगीत शास्त्र के दशग्रंथी विद्वान चकित रह जाएंगे। पं. मंसूर या पद्मावतीबाई जैसे लोगों को बालगंधर्व और बेगम अख्तर के गायन में यह नाटक का पद, यह गजल जैसे भेद नहीं दिखते। उन्हें मैं-मैं कहने वाले ख्याल गायकों में भी न दिखने वाला सुरलय का अलौकिक अद्वैत दिखता है। उन्हें उसमें निखालिस गायन दिखता है और ये श्रेष्ठ कलाकार उस गायन के आगे विनम्र हो जाते हैं।

वास्तव में ये सभी ख्याति प्राप्त कलाकार मंडली हैं। सुरलय की दुनिया में रहने वाले – जो दिखावे से ज्यादा मेलजोल नहीं रखते। लेकिन जब कोई अलौकिक कलाकार दिल में बस जाता है, तो उसकी बातों और लेखन में शब्द कैसे मोगरे की तरह खिल उठते हैं, देखिए। मन में जमे अनुभव उन्हें बोलने पर मजबूर करते हैं। इसके लिए साहित्य साधना आदि की आवश्यकता नहीं होती। नटवर्य जयराम शिलेदार ने नारायणराव के साथ नाटक में काम करते समय का एक अनुभव बताया है। सौभद्रा में अर्जुन की भूमिका निभाने वाले नारायणराव एक पद में ऊपरी भेंडी पर स्थिर हो गए। और शिलेदार कहते हैं, “मुझे गंधर्व के चेहरे की जगह केवल तेजस्वी वलय दिखने लगा। उस वलय में वाजू के शंकरराव सतराईफ नहीं दिखे। मैंने उस वलय को ही वंदन किया।” आज अपने गायन से वैश्विक ख्याति प्राप्त करने वाले भीमसेन जोशी। जैसे किसी सूत्र में बांधा जाए, वैसे बालगंधर्व के गायन का लक्षण बता गए हैं। “जैसे बोलते हैं, वैसे गाते हैं – प्रेम से।” एक-दो छह-सात शब्दों में वे जो कह गए, उस पर एक घंटे का निरूपण हो सकता है।

हीराबाई बड़ोदेकर के तो बालगंधर्व नाट्यगानगुरु ही थे। उन्होंने नाटक में एक बार काम किया था। आज अस्सी वर्ष की आयु पार कर चुकी हीराबाई को केवल नारायणराव के गायन का ही नहीं, बल्कि ‘खाना’ भी उनके प्रेम का विषय था, यह याद है। वैसा ही वह हीराबाई के भी प्रेम का ही नहीं, बल्कि कौशल का विषय था। हीराबाई उनके उस खाने के शौक को याद करते हुए बताती हैं, ‘किसी भी चीज को कैसे बनाना है, इस बारे में नारायणराव बहुत अच्छा बताते थे। बिल्कुल गाने की जगह समझाने जितनी मनःपूर्वक।” हीराबाई की यह याद पढ़ते हुए, गायक हीरा के रूप में भारत भर में सम्मानित की गई हीराबाई घरेलू चौघाई होकर गृहिणी की भूमिका में रंगी हुई और अपने स्वर अमृत के जादू से लाखों लोगों को भूख-प्यास भुला देने वाले बालगंधर्व सादे नाना होकर पाक कला की खूबियां उन्हें समझाने की भूमिका में तन्मय हो गए, यह देवदुर्लभ दर्शन हमें मिले, ऐसा मुझे लगा।

उस अंक के संवाद में बालगंधर्व और हमारी कई स्वर भेंट होती हैं। और वे अधिक अपने लगते हैं। उपन्यास, निबंधों जैसे चार वाक्य सरलीकरण करने वाले नारायणराव दिखते ही, महमद हुसैन खासांहब एकदम अपने बचपन में चले जाते हैं और कहते हैं, “सुरों से पहले सरगम में इंद्रायचा नारायणराव ने मुझे पहली बार सिखाया।” गंधर्व नाटक मंडली के नटवर्य माधवराव बालवलकर के सहस्रात वर्ष का बेटा फेफड़ों के बुखार से तप रहा था। डॉक्टर इलाज में सफल नहीं हो रहे थे। कंपनी का पड़ाव हिल गया था। वहां के सिद्धार्थ महाराजा के चरणों में बच्चे को डालो, ऐसा बालगंधर्व ने मातृस्नेह से कहा। बालगंधर्व नाटक कंपनी के मालिक किसी भूमिका में नहीं रहते थे – सीढ़ी के आदमी के उस परिवार के वे कुटुंब प्रमुख के नाते सांसारिक कठिनाइयां सुलझाते थे। बीमार पुरुषोत्तम को लेकर खुद सिद्धारूढ़ों के मठ में गए। उन्होंने अंगारा दिया, कर्मधर्म संयोग से बुखार उतर गया। ये सभी श्रद्धालु लोग। महाराजा के उपकार कैसे चुकाएं? बालगंधर्व ने केवल सिद्धारूढ़ स्वामी और उनके मठ के शिष्यों के सामने, अन्य दर्शकों को अंदर न लेते हुए “द्रौपदी” नाटक का निःशुल्क प्रयोग किया। उस समय स्वामी के साथ खींची गई तस्वीर वाळवलकर के घर में आज भी है। आज उत्तम हारमोनियम वादक के रूप में ख्याति प्राप्त करने वाले पुरुषोत्तम वाळवलकर ने इस प्रसंग को याद करके नारायण के अंतःकरण के इस वात्सल्य के कोने को उजागर किया है।

रंगों से रंगा हुआ

बालगंधर्व के जीवनकाल में ‘रत्नाकर’ पत्रिका ने एक सर्वांगसुंदर ‘बालगंधर्व’ विशेषांक निकाला था. नाटक और संगीत क्षेत्र के महान जानकारों ने बालगंधर्व की महानता दर्शाने वाले लेख उसमें लिखे थे. यह अंक अनुपलब्ध था. उसका पुनर्मुद्रण नहीं हुआ. बालगंधर्व जन्मशताब्दी के लिए उसी मनोयोग से ‘महाराष्ट्र टाइम्स’ ने विशेषांक निकाला, जैसा कि संपादक गोविंदराव तलवलकर, अरुण आचरेकर और मैं गणपति की कृपा से बैठे हुए सोच रहे थे, तब सबसे पहले याद आया कि सीताकांत ने पांडुर भुजंग को कंठस्थ करने के बाद सबसे पहले “गंधर्व नाटक मंडळी” ये शब्द लिखे होंगे. किसी उपास्य देवता की मूर्ति की तरह बालगंधर्व उसके मन में मांस बनकर बस गए थे. स्कूली उम्र में उसने उस मनमोहक गंधर्व के नाटक का भव्य वैभव देखा था. कानों ने कादंबरी की सारी, कोषा के कालकया का ऑर्गन, और अहमदनगर, तिरखवाडा तबला के सुरों से एकरूप हुए कितने गाने सुने हैं, इसका कोई हिसाब नहीं. इतना ही नहीं, सामने बैठे सैकड़ों श्रोताओं को घंटों तक एक जगह बांधे रखने वाली यह चित्र की अप्सरा जैसी दिखने वाली बाई – पुरुष बनकर अपने पिताजी के साथ घर आकर बातचीत करते हुए देखी है. उसे सीता SS कहकर प्यार से बुलाने वाली वह व्यक्ति घर में घुसते ही घर में कैसे दिवाली जैसा माहौल हो जाता था, इसका उसने अनुभव भी किया है. सीताकांत के पिता गणपतराव लाड उस समय मुंबई के प्रसिद्ध पोर्ट्रेट पेंटर थे. इस अंक पर बालगंधर्व का चित्र मूलतः उन्हीं के हाथ का है. सीताकांत का जीवन आकाशवाणी की सेवा में बीता. माडगूलकर के गीतरामायण की मूल कल्पना सीताकांत की थी. बचपन भटवाड़ी के लक्ष्मीबाग के पास बीता. लक्ष्मीबाग एक समय मुंबई का संगीत का तीर्थस्थान था. सीताकांत ने जीवन भर असंख्य गायक-वादकों को अच्छी जानकारी के साथ सुना. लेकिन राम रंगी रंगावे जैसे मेरे इस बालमित्र का मन एक बार जो बालगंधर्व रंगी रंगा, वह रंग आज भी कण भर भी फीका होने को तैयार नहीं है. उतना ही सतेज है. शरीर सत्तर में प्रवेश कर रहा है. बीमारियों से जूझ रहा है, फिर भी सेवानिवृत्ति के समय का एकमात्र आनंद बालगंधर्व की ध्वनिमुद्रिकाएं सुनना है – दूसरा कोई बालगंधर्व प्रेमी मिले तो उसे सुनाना, बालगंधर्व की भूमिका वाले खाडिलकर के नाटक बार-बार पढ़ना, गडकरी के एकच प्याला में भाषा सौंदर्य में खो जाना और मन से गंधर्व नाटक मंडळी के युग में जीना ही है. हमारे शिल्पकार फड़के भी ऐसे ही थे. भास्करबुवा और बालगंधर्व की स्मृति में ही जी रहे थे. वे शरीर से ही क्या वे धारला थे. लेकिन मन से बीस-इक्कीस साल के गंधर्वयुग में मुंबई के थिएटर में चल रहे गंधर्व के नाटक बंद आंखों से देखते रहते थे. नाटककार वसंत शांताराम देसाई भी इसी रंग में रंगे हुए थे. ऐसे नमूने के पागल लोग दुर्लभ हैं और यह भाग्य का पागलपन पैदा करने वाले कलाकार तो उससे भी दुर्लभ हैं. सीताकांत ने तो इस अंक के लिए लेख लिखते समय एकदम अपने बचपन में गोता लगाकर तल के रत्न ऊपर लाने की तरह बालगंधर्व के दुर्लभ चित्रों और पत्रों का अपना संग्रह उसने उपयोग करने दिया है.

सांस्कृतिक संदर्भ

साहित्य-संगीत के स्मृतिपथ से घूमकर आने की इच्छा अनियंत्रित होने वाले कृ.द. उर्फ भाऊसाहेब दीक्षित. नारायणराव का सहवास प्राप्त करने वाले भाग्यवानों में से यह एक. संगीत पर लिखने का अधिकार होने पर भी उस अधिकार का अपने लेखन को जरा भी दर्प न आने देने का मनमोहक संयम पालने वाले भाऊसाहेब इस उत्सव में हैं. अशोक रानडे जैसे ज्ञानमार्गी संगीत समीक्षक हैं. उन्हें भी बालगंधर्व के गायन की टिकाऊपन की समानता हाला की सप्तशती, जयदेव की अष्टपदी, कबीरी भजन, सदारंग का ख्याल जैसी चिरंतन कृतियों से मिलती है. अशोक रानडे कुछ केवल भक्तिभाव से लिखने वाले लेखक नहीं हैं. भावना को शास्त्रकांटे की कसौटी का आग्रह करने वाले केवल समीक्षक नहीं, बल्कि अच्छे गायक हैं. उन्हें भी बालगंधर्व का गायन जयदेव की अष्टपदी जैसी चिरंजीव कलाकृति जितना ही चिरंजीवित्वा के गुण प्राप्त है ऐसा लगता है. वही विचारधारा चित्रकार गोडसे जैसे बुद्धिनिष्ठ चिकित्सक समीक्षक की है. उन्हें बालगंधर्व की रंगसज्जा ‘मखरा’ जैसी लगती है. मखरा में देवताओं की उत्सवमूर्तियां रहती हैं. बालगंधर्व का नाटक एक त्योहार-उत्सव जैसा ही प्रसंग होता था. बालगंधर्व के नाटक में नेपथ्य एक कोंदण जैसा होता था. सामने हीरा चमक रहा हो तो कोंदण की ओर कौन देखेगा? गोडसे ने उसे मार्मिकता से जाना है.

बालगंधर्व के पद के बाद सुरों का वही स्नेह लेकर मराठी घरों में गए और उसी प्रेम से गाए गए गाने माडगूलकर ने लिखे और सुधीर फड़के ने स्वरबद्ध किए.माडगूळकर ने अपना गीत संग्रह किर्लोस्कर-देवल की गायन प्रतिभा को समर्पित किया है और सुधीर फड़के ने अपनी संगीत रचना के मामले में बालगंधर्व-मास्टर कृष्णराव को गुरु माना है. ऐसी परिचित धुनों से सजी और मराठी शब्दों से अलंकृत ये गीत मराठी लोगों के कानों तक पहुंचते ही जन्म-जन्मांतर की पहचान की तरह घर-घर में स्वीकार किए गए. धुनों के भी वर्षों पुराने सांस्कृतिक संदर्भ होते हैं. यदि मराठी अभंग को पटियाला घराने की वक्रसुरावली की धुन दी जाए, तो ऐसा लगेगा कि अभंग गायन मंदिर में नहीं, बल्कि किसी हमीदाबाई के कोठे में चल रहा है. सुधीर फड़के ने बालगंधर्व का ऋण हृदय से स्वीकार किया है. इस अंक के सभी लेखों का आंतरिक उत्साह बहुत प्रभावशाली है. चाहे वह डांग्या जैसे विद्वान क्रांतिकारी का लेख हो या पूर्णतः श्रद्धालु लालजी देसाई का. हर किसी के हृदय को बालगंधर्व की कला का स्पर्श महसूस होता है.

अरुण आठल्ये

इस अंक की तैयारी के लिए जी-जान लगाकर कोने-कोने में अनजाने में पड़ी बालगंधर्व की तस्वीरों को ढूंढ निकालना, कन्नड़, तमिल, तेलुगु, गुजराती भाषाओं में उन पर लिखे लेखों को इकट्ठा करना, उन प्रांतों में आज जीवित उनके प्रशंसक लोगों को ढूंढकर उनसे लिखवाना और बुलवाना, सैकड़ों मील की यात्रा करके बालगंधर्व की लोकप्रियता का पता लगाना, यह काम अरुण आठल्ये ने किया. पिछले कुछ महीनों से अरुण दिन-रात एक ही धुन में लगा हुआ था. वह था बालगंधर्व, इस अंक के लिए उपयोगी कई चीजों को इकट्ठा करना, पुराने जीर्ण-शीर्ण पत्रिकाओं में से लेखों को जमा करना, उसने परिचित और अपरिचित सैकड़ों दरवाजे खटखटाए. बिना किसी संकोच के इस अंक के लिए लेखों, चित्रों, पत्रों, वस्तुओं की भिक्षा मांगी. इस अंक के निर्माण में उनका बहुत बड़ा योगदान है. अन्यथा बहुत बड़े पद पर रहने वाले अरुण इस अंक के निर्माण के लिए गणेशोत्सव के मंडप में ‘वाल्टेयर’ की तरह प्यास-भूख भूलकर काम करते रहे.

सामर्थ्य बनाए रखा है

एक बात लिखनी चाहिए. यह अंक बालगंधर्व के सौवें जन्मदिन के उपलक्ष्य में ‘भक्तिभाव यह लो सेवा’ की भावना से उन्हें ‘समर्पित उपहार’ है. बालगंधर्व विषय पर यह शोध निबंध नहीं है. यह जन्मदिन है, इस बात का ध्यान रखकर तैयार किया गया यह अंक है. बालगंधर्व के अपने सुनहरे दिनों में भी उन पर कठोर आलोचना करने वाले लोग थे. गलतफहमी फैलाने वाले थे. खुद अहिताग्नि राजवाड़े बालगंधर्व पर समय-समय पर आग उगलते दिखते हैं. उन्होंने एक बयान दिया है कि उन्हें ‘बालगंधर्व’ की उपाधि लोकमान्य ने नहीं, बल्कि ज्ञानप्रकाशकारों ने दी थी. पुणे आकाशवाणी के लिए भाऊसाहेब दीक्षित और भवानराव पंडित ने बालगंधर्व का एक लंबा साक्षात्कार लिया था, जिसमें खुद बालगंधर्व ने बताया था कि लोकमान्य ने उन्हें बालगंधर्व कहा था. वह टेप उपलब्ध है. अहिताग्नि बालगंधर्व से इतने क्यों जलते थे, यह तो अग्निदेव ही जानें. इसका मतलब यह नहीं कि खुद बालगंधर्व पूरी तरह निर्दोष थे. ऐसा कोई भी नहीं होता. उनसे गलतियां हुई होंगी. बुढ़ापे में और बोलपटों के कारण सारा नाटक व्यवसाय मृत्यु के कगार पर पहुंचने के समय, एक बार फिर गंधर्व नाटक मंडली को खड़ा करने के लिए गोहरबाई को अपनी स्त्री भूमिकाएं निभाने के लिए मंच पर लाने से लेकर उनसे शादी करके पूरी तरह उनके अधीन हो जाने तक की जो गलतियां कीं, उनके पीछे उनकी यह जिद थी कि किसी भी तरह नाटक चलते रहें. नाटक खड़ा करने की सद्भावना से उन्होंने एक जुआ खेला. उसमें पासे उल्टे पड़े. उस जिद के कारण उठाए गए सभी कदम गलत साबित हुए. उसी में दोनों पैरों की ताकत चली गई और वे अपंग हो गए. कुछ अपनी गलतियों के निर्णयों से तो कुछ नियति के कठोर आघातों से उत्पन्न विपरीत परिस्थितियों के आघात सहते हुए उन्हें जीवन का अंतिम चरण बिताना पड़ा. जन्मशताब्दी जैसे उनके गुणों के स्मरण के अवसर पर बालगंधर्व के जीवन के उस अभागी अध्याय को इस अंक में स्थान नहीं दिया गया है. उनके जीवनकाल में उन पर बहुत कीचड़ उछाला गया है. वह उन्होंने सहन किया है. एक कटोरी दूध से वंचित सिंधु अपने भूखे बच्चे को सुलाते हुए कहती थी, “हमारे नसीब में गोकुल की गौशालाएं वीरान हो गईं, अच्छा बच्चा, वीरान हो गईं.” बालगंधर्व के अंतिम दिनों में भी उनके नसीब में उनके नाटकों, गीतों, अभिनय और दर्शकों द्वारा गुलजार रखा गया पूरा गोकुल ही वीरान होते देखना आया था. वह गोकुल विपरीत कालचक्र में बह गया था. अब वह मखमली पर्दे के पीछे से ऑर्गन, सारंगी, तबले की धुनों का संयोजन सुनाई नहीं देता था, धूप की सुगंध नहीं थी.सभागार में दर्शकों का वह उत्साहवर्धक शोर, जो उस गंध के साथ प्रवेश करता था, सुनाई नहीं दे रहा था, रंगमंच के पर्दे पर जरीदार शालें लटकी हुई नहीं दिख रही थीं. सब कुछ खाली-खाली और वीरान लग रहा था. सिंधु नहीं, सुभद्रा नहीं, -रुक्मिणी नहीं, द्रौपदी, मेनका, सावित्री, मीरा कोई भी नहीं, तो फिर हम बचे ही कौन हैं? इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल रहा था. जब हम बूढ़े हो गए, तो किसी गुणी कलावती युवती को ही इन भूमिकाओं में दिखना चाहिए, यह लालसा थी. लेकिन गायन, अभिनय और सुंदरता का मेल वाली अभिनेत्री नहीं मिल रही थी. इसलिए न केवल पैरों को, बल्कि मन को भी अपंगता आ गई थी. इससे मृत्यु के अलावा कोई छुटकारा नहीं था. आसपास हर तरह की गरीबी के अलावा कुछ नहीं दिख रहा था. गरीब आदमी के पास दोस्त नहीं आते. लेकिन यहां तो साक्षात मृत्यु भी नहीं आ रही थी. आखिरकार वह आया, लेकिन अंतिम सांस के लिए पूरे सौ दिन बेहोशी की हालत में घड़ियाँ गिनने के बाद आया. उस अवसर की सभी घटनाओं का स्मरण यातनादायक है. लेकिन उनकी ध्वनिमुद्रिकाओं से सुनाई देने वाली सुरों की कोई भी धुन, जिस स्वप्नभूमि के वे अनभिषिक्त सम्राट थे, उस राज्य में हमें एक क्षण में परी के पंखों पर बिठाकर ले जाने जैसी सहजता से ले जाने की शक्ति आज भी बरकरार है.

इक्कीसवीं सदी में भी

उस शक्ति के आगे आदर से झुकने के लिए ही इस विशेष अंक का यह प्रयास है. शताब्दी का वर्ष केवल पुराने ही नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के गायक भी गंधर्वों द्वारा अमर किए गए नाटकों के प्रयोगों से रंगीन बनाएंगे. गंधर्व गीतों से स्वरमय करेंगे. यह विशेषांक भी उसी समारोह का एक हिस्सा है. ऐसा ही समारोह और सौ साल बाद भी होगा. क्योंकि ऐसे अलौकिक सुरों को स्वाभाविक रूप से अमरत्व प्राप्त होता है. सैकड़ों साल पहले के भूप, बिहाग, भैरव, भैरवी जैसे राग और रागिनियां आज 1987 में भी अंतःकरण से सुरलय में एकरूप होकर गाए जाएं तो क्षण भर पहले खिले फूल जितने ताजे लगते हैं. गंधर्वों का गायन उसी स्तर का स्वरपुष्प है. यह देश इक्कीसवीं सदी में जाने के बाद जो पराक्रम करना चाहेगा, वह करेगा ही, लेकिन इक्कीसवीं सदी के 26 जून 2087 के दिन कोई न कोई बालगंधर्वों का स्मरण जगाते हुए गा रहा होगा – ‘सुजन कैसा मन चोरी’. किसी • रंगमंदिर में सौ साल बाद के सर्वथा भिन्न • दर्शकों के सामने कोई सिंधु अंतःकरण को पीड़ा देने वाला • गाना गा रही होगी – ‘देखो न मुझे ऐसे दयनीय राजसबाला’ और डेढ़ सौ साल पहले के दर्शकों के रुमाल जैसे आँसुओं से भीगे थे, वैसे ही उस द्विशताब्दी के उत्सव में जमा हुए दर्शकों के भी भीगेंगे. नई सदियां नए तकनीकी साधन लाएंगी. उसमें बहुत बदलाव आएगा. लेकिन इंसानों की सहृदयता और रसिकता कैलेंडर पर के सालों के बदलते आंकड़ों से नहीं बदलती. ऐसे ही एक, असंख्य रसिक मन पर सालों तक राज करने वाले सम्राट का यह जन्म शताब्दी महोत्सव है. यह अंक उस सम्राट की दुर्लभ चित्रों और वाक्पुष्पों से सजी पालकी है. उस पालकी का एक कहार होने का सम्मान मुझे मिला, यह मेरा सौभाग्य है. उसके लिए मन को जो संतुष्टि महसूस होती है, वह शब्दों में व्यक्त करने से परे है. ऐसे समय में लगता है कि बालगंधर्वों की हर बात में उत्कटता और उनके गले का वह अत्यंत विनम्र दिव्य स्वर किसी अज्ञात शक्ति की कृपा से एक क्षण मुझे मिला होता तो उस सुर में और उस उत्कटता से मैं खुद बालगंधर्वों को ही मुजरा करते हुए कहता – “जोहार मायबाप जोहार…”

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