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ओ मानस के राजहंस …

लेखिका - मंजूषा आमडेकर

२. संगीत क्षेत्र का पहला गंधर्व

गायन की पारिवारिक विरासत और कला का विकास

बालगंधर्व का राजहंस घराना मूलतः नागठाणे गाँव का था। यह नागठाणे सातारा ज़िले के तासगाँव तहसील में था। वहाँ राजहंस परिवार की पुश्तैनी खेती-बाड़ी और घर-द्वार था। यूँ तो उनका मूल उपनाम कुलकर्णी था, फिर भी आगे चलकर ‘राजहंस’ नाम ही विश्वप्रसिद्ध हुआ। राजहंस परिवार देशस्थ यजुर्वेदी ब्राह्मण था। नारायण उर्फ़ बालगंधर्व के दादा कृष्णाजीपंत अपने पिता की इकलौती संतान थे। उनके पाँच पुत्र हुए — वामनराव, विष्णुपंत, गणपतराव, भास्करराव और श्रीपादराव। इनमें सबसे छोटे श्रीपादराव और उनकी पत्नी अन्नपूर्णाबाई के ग्यारह संतानें हुईं। इनमें से शंकर, नारायण, व्यंकटेश और वेणू को दीर्घायु प्राप्त हुई। नारायण का जन्म पुणे में शुक्रवार पेठ के एक घर में हुआ। २६ जून १८८८ को संध्या के समय छह बजकर दो मिनट पर उन्होंने इस संसार की रंगभूमि पर प्रवेश किया।

श्रीपादराव मुंबई सरकार के सिंचाई विभाग में ड्राफ्ट्समैन के रूप में नौकरी करते थे। आमदनी सीमित और बड़ा परिवार होने के कारण आर्थिक स्थिति साधारण ही थी। पर घर में कला की विरासत थी। स्वयं श्रीपादराव गाते थे और सितार भी बजाते थे। उनकी बहन हरीबाई और पत्नी भी मधुर स्वर में गुनगुनाया करती थीं। नारायण के चाचा गणपतराव ने तो गायक का ही पेशा अपना लिया था। वे बाळकृष्णबुवा इचलकरंजीकर के शिष्य थे। उत्तम गायन के साथ-साथ वे मृदंग भी बजाते थे। पुणे के पर्वती देवस्थान में वे गायन-सेवा देते थे। नारायण के मामा वासुदेवराव पुणतांबेकर ‘नाट्यकला प्रवर्तक नाटक मंडली’ के संस्थापकों में से एक थे। इस प्रकार नारायण पर सुरों के गर्भ-संस्कार जन्म लेने से पहले ही हो रहे थे। नाट्यकला और संगीत की बालघुट्टी उन्हें जन्म से ही मिल चुकी थी।

यद्यपि नारायण की शिक्षा का आरंभ नागठाणे में हुआ, फिर भी आगे शिक्षा के लिए उन्हें जलगाँव भेज दिया गया। नारायण की बुआ हरीबाई के दामाद आबासाहेब म्हाळस जलगाँव में सुप्रसिद्ध वकील के रूप में जाने जाते थे। नारायण से उनका विशेष स्नेह था, इसलिए उन्हीं के पास रहकर नारायण ने आगे की शिक्षा प्राप्त की। पर यह शिक्षा नाम मात्र ही चली। नारायण का पढ़ाई और शिक्षा की ओर ज़रा भी झुकाव नहीं था। उन्हें गाने का शौक़ था। उधर आबासाहेब को भी नाटक और गाने का शौक़ होने के कारण उनके साथ नारायण भी नाटकों में, गाने के कार्यक्रमों में जाया करता था।

उसका संगीत की ओर झुकाव देखकर आबासाहेब ने उसे मेहबूबख़ाँ साहेब के पास गाना सीखने भेजा। यद्यपि वे उस समय अधिक प्रख्यात नहीं थे, फिर भी स्पष्ट शब्दोच्चार और सहज सुरीलापन — उनके गायन की ये विशेषताएँ नारायण पर अपनी छाप छोड़ गईं। नारायण की संगीत-शिक्षा की नींव मज़बूती से रखी गई।

बालगंधर्व उपाधि

इसी बीच नारायण दस वर्ष का था, तब वह पुणे में यशवंतराव कुलकर्णी के पास गया। वे उसके चचेरे चाचा थे और लोकमान्य तिलक के समाचार पत्र ‘केसरी’ में प्रबंधन विभाग में नौकरी करते थे। यह पुणे-यात्रा नारायण के जीवन को एक महत्त्वपूर्ण मोड़ देने वाली सिद्ध हुई। एक विलक्षण संयोग जुट आया और नारायण को साक्षात् लोकमान्य को अपना गाना सुनाने का अवसर मिला। वे नारायण का गाना सुनकर इतने मुग्ध हो गए कि उनके मुँह से सहज ही उद्गार निकल पड़ा — ‘यह बालगंधर्व बहुत ही सुरीला गाता है!’

और तभी से नारायण को ‘बालगंधर्व’ यह उपाधि प्राप्त हुई!!

इसी नाम से वे विश्वप्रसिद्ध हुए, यह तो एक बात है ही; पर मूलतः महाराष्ट्र के संगीत क्षेत्र के भी वे पहले ‘गंधर्व’ सिद्ध हुए। और इसके बाद उन्होंने न भूतो न भविष्यति ऐसा इतिहास रच डाला।

ज़िम्मेदारी आ पड़ी, राह भी मिल गई

१९०३ साल तक नारायण की अंग्रेज़ी दूसरी कक्षा तक की शिक्षा हुई। पर दुर्घटनावश श्रीपादराव के पैर में चोट लगने  से वे जो बीमार पड़े, तो बिना वेतन की छुट्टी लेकर घर बैठने की नौबत आ गई। अब घर चलाने की सारी ज़िम्मेदारी नारायण पर आ पड़ी। ‘नाट्यकला प्रवर्तक’ कंपनी में जाने की उन्होंने कोशिश की, पर उसमें सफलता नहीं मिली। नारायण के बड़े भाई शंकरदादा अभी कमाने लायक नहीं हुए थे। उस पर उनकी माँ बीमार पड़ गईं। कोढ़ में खाज की तरह स्वयं नारायण को मालेगाँव में कुत्ते ने काट लिया। इस प्रकार चारों ओर से इस परिवार की खींचतान शुरू हो गई।

पर बुराई में से भी अच्छाई निकलती है, ऐसा कहते हैं — वैसा ही अनुभव नारायण को इसी दौर में हुआ। उसके पैर में कुत्ता काटना मानो उपकारी ही सिद्ध हुआ। नारायण का उपचार करना आवश्यक होने के कारण उनके परिचित बाबामहाराज ने उन्हें कोल्हापुर ले जाकर इलाज आरंभ किया। नारायण की माँ के पिता अप्पाशास्त्री बेलेकर कोल्हापुर के बाबामहाराज पंडित के यहाँ पुराणिक थे। उनकी पत्नी ताईमहाराज को और बाबासाहेब को नारायण के प्रति विशेष लगाव होने के कारण उन्होंने उसका ठीक से इलाज करवाने का निश्चय किया। इस दौरान कोल्हापुर में अप्पय्याबुवा नाम के एक गायक रहते थे। नारायण उनके पास गाना सीखने जाने लगा। बाबामहाराज के कारण नारायण को छत्रपति शाहू महाराज के पास जाने का सुअवसर मिला। छ. शाहू महाराज स्वयं संगीत और नाट्यकला के चाहने वाले और आश्रयदाता थे।

नारायण का सुमधुर गायन सुनकर छत्रपति को उसके प्रति प्रशंसा का भाव उमड़ आया कि उन्होंने राजदरबार के राज-गायक अल्लादियाख़ाँसाहेब के पास उसकी शिक्षा जारी रखने का निश्चय किया। पर एक अवसर पर छत्रपति को ध्यानआया कि नारायण को ठीक से सुनाई नहीं देता। इस बारे में पूछताछ करने पर नारायण ने कहा — ‘जी हाँ महाराज, मेरा दाहिना कान फूट गया है इसलिए मुझे उस कान से ठीक से सुनाई नहीं देता।’

यह सुनते ही महाराज को मन ही मन बहुत बुरा लगा। इतना गुणी लड़का, उसमें भाग्य ने ऐसी कमी क्यों रखी — यही उनकी समझ में नहीं आ रहा था। उन्होंने तुरंत उसका मिशन हॉस्पिटल में इलाज कराने का निश्चय किया। डॉ. व्हेल (Wanless) मिरज के मिशन हॉस्पिटल के प्रमुख थे और किर्लोस्कर नाटक मंडली भी मिरज में ही थी। इसलिए यह तय हुआ कि नारायण किर्लोस्कर मंडली में रहकर डॉ. व्हेल के यहाँ इलाज करवाएँ। छत्रपति ने किर्लोस्कर नाटक मंडली से कहा कि, ‘इस लड़के की अच्छी देखभाल की जाए।’ पर किर्लोस्कर मंडली के यहाँ अतिथि के रूप में इलाज करवाने आया यह नारायण नाम का लड़का आगे चलकर किर्लोस्कर नाटक मंडली को ही जीवनदान देने वाला है — नियति के इस संकेत की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी।

फूटा घड़ा

सच कहें तो इस नाटक मंडली का और नारायण का पहले से परिचय था। १९०३ साल में आबासाहेब म्हाळस ने किर्लोस्कर नाटक मंडली में नारायण का गायन रखवाया था। हेतु यह था कि उसे नौकरी मिल जाए, चार पैसे मिल जाएँ, घर में ग़रीबी थी अतः आर्थिक स्थिति सुधर जाए। पर दुर्भाग्यवश उस समय यौवन में कदम रख रहे नारायण की आवाज़ प्रकृति के नियम के अनुसार भारी हो गई थी, इसलिए मंडली ने उसकी ‘फूटा घड़ा’ कहकर अवहेलना कर दी थी। पर बाद में कोल्हापुर-निवास के दौरान नारायण की आवाज़ धीरे-धीरे सुधर गई। छत्रपति के माध्यम से मंडली को एक खूबसूरत और अच्छा गाने वाला लड़का मिलने की संभावना है — इसकी भनक सबको लग गई। लोगों ने उसे अपनी कम्पनी में रखने के लिए सिफ़ारिश भी की, पर महाराज ने ‘अभी नारायण की संगीत शिक्षा पूरी होनी बाक़ी है’ ऐसा कहकर इनकार कर दिया था।

नारायण मिरज में किर्लोस्कर नाटक मंडली में धीरे-धीरे रच-बस गया था। उसका गाना सबको मोहित करता था। हमने इस लड़के की ‘फूटा घड़ा’ कहकर अवहेलना की थी, यह बात वहाँ सबको  याद थी। पर नारायण ने अपने मधुर, सहज स्वभाव से सबका मन जीत लिया था। डॉ. गाडगीळ की सिफ़ारिश पर नारायण का गायन एक बार फिर किर्लोस्कर नाटक मंडली के सामने प्रस्तुत किया गया। लेकिन इस बार उसकी आवाज़ मधुर और सधी हुई थी, इसलिए उसका गायन सबके हृदय को छू गया।

स्त्री-भूमिका का प्रस्ताव

अंत में देवल मास्टर ने उससे पूछ ही लिया — ‘नारायण, क्या तुम स्त्री-पार्ट करना पसंद करोगे?’ नारायण ने उत्तर दिया — ‘आप सिखाएँगे तो करूँगा।’ नारायण अब सत्रह वर्ष का कोमल युवक था। देखने में सुंदर था ही और आवाज़ भी सुरीली हो गई थी। मन से वह अब रंगभूमि पर प्रवेश करने के लिए तैयार था। इसके अलावा उसके पिता बिना वेतन की छुट्टी लेकर घर पर ही आ बैठे थे, इसलिए उन पर बहुत क़र्ज़ चढ़ गया था। अतः आर्थिक परिस्थिति का दबाव भी था ही। ‘मैं काम पर लग जाऊँ, चार पैसे कमाने लगूँ तो परिवार को सहारा ही मिलेगा’ — इस विचार से नारायण तुरंत तैयार हो गया। फिर देवल ने उसे पहले एक छोटी भूमिका दी और तालीम (रिहर्सल) करवाना शुरू किया।

 इस लड़के में कोई तो बात है जो इसका भविष्य चमका सकती है, इस बात का अनुमान सबको हो चुका था। अब परिवार की अनुमति प्राप्त करने के लिए लोगों की दौड़-धूप शुरू हो गई। लोकमान्य तिलक और दादासाहेब खापर्डे तो नारायण पर प्रसन्न थे ही, पर छत्रपति शाहू महाराज का भी उस पर स्नेह था। इसलिए एक दिन दरवाज़े बंद करके चुनिंदा लोगों के सामने उसकी  प्रस्तुति का आयोजन (ड्रेस रिहर्सल) किया गया। प्रस्तुति देखने के लिए नारायण की माँ भी उपस्थित थीं। उन्हे नारायण की भूमिका बहुत पसंद आई और माँ ने हामी भर दी। उन के अनुमति देने पर पिता भी अनुकूल होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं था। पर नारायण के मामा, दत्तूमामा बेलेकर को यह कुछ पसंद नहीं आ रहा था। लड़के का नुक़सान होगा, ऐसा उन्हें डर लग रहा था। पर स्वयं लोकमान्य तिलक ने इन शब्दों में विश्वास दिलाया कि, ‘इस लड़के का ज़रा भी नुक़सान हुआ तो मैं अपनी ओर से बीस हज़ार रुपए उसे दूँगा।’

किर्लोस्कर नाटक मंडली में प्रवेश

अब इतना बड़ा आश्वासन मिल जाने पर क्या कहना? सन १९०५  में नारायण ने किर्लोस्कर नाटक मंडली में प्रवेश किया। वह दिन गुरु-द्वादशी का था। मुहूर्त तो बढ़िया था। देवल मास्टर ने उसे पहली भूमिका शकुंतला की देने का निश्चय किया और तालीम शुरू की। लेकिन तैयारी पूरी हो जाने तक किर्लोस्कर नाटक मंडली में वार्षिक अवकाश का समय आ गया। अण्णासाहेब के समय से ही वहाँ यह प्रथा थी। कंपनी के सदस्यों को हर वर्ष एक महीने की सवेतन छुट्टी दी जाती थी। इस प्रकार अवकाश का समय आ गया।

किसी भी क्षेत्र में अच्छे गुरु का मार्गदर्शन — इसी पर शिष्य का उज्ज्वल भविष्य निर्भर करता है। नारायण को देवल जैसा गुरु बिलकुल शुरुआत में ही मिल जाए, यह उसका सौभाग्य ही कहना होगा। शिष्य तो बड़ा काम कर दिखाने के लिए ही जन्मा था। ऐसा  संयोग जुट गया जैसे दूध में चीनी!  भूमिका का अभ्यास कराने में भला कितना समय लगता? नारायण देखते-देखते तैयार हो गया। मात्र एक माह में नारायण से चार अंकों वाले नाटक की नायिका की भूमिका का अभिनय तैयार करवा लिया गया। वह संतोषजनक ढंग से भूमिका निभा रहा है, इसका विश्वास होते ही शाकुंतल नाटक का प्रथम मंचन घोषित किया गया। विज्ञापन में कहा गया कि, ‘लोकमान्य तिलक ने जिसे बालगंधर्व की उपाधि दी है, वह नारायण राजहंस शकुंतला की भूमिका करेगा…’

देखते-देखते टिकट बिक भी गए। बुकिंग के लिए तार आने लगे। पत्र आने लगे। संदेश मिलने लगे। नाटक नौ बजे शुरू होने वाला था। पर दर्शक इतने अधीर हो गए थे कि उन्होंने आठ बजे से ही ज़बरदस्त भीड़ लगा दी थी। थिएटर खचाखच भर गया था। बहुत समय बाद दर्शकों का ऐसा भरपूर स्नेह देखकर किर्लोस्कर नाटक मंडली के लोग भी भावविभोर हो उठे थे। हर एक के तन-मन में चैतन्य संचारित हो उठा था।

वह आई…उसने देखा…और उसने जीत लिया…

और वह क्षण आ ही गया….वह आई…उसने देखा…और उसने जीत लिया….ऐसी स्थिति हो गई। शकुंतला के रूप में अपनी पहली ही एंट्री पर नारायण ने अपनी ‘बालगंधर्व’ उपाधि को पूरा-पूरा न्याय दिया। उसके स्त्री-सुलभ हाव-भाव, नज़ाकत, चाल, बोली देखकर दर्शक पूरी तरह मोहित हो गए। भौंरे को देखकर घबराकर शकुंतला जैसे ही सखियों को पुकारने लगती है, तब उसने ऐसा  लुभावना अभिनय किया कि दर्शकों ने थिएटर सिर पर उठा लिया। नाटक पल-पल रंग जमाता चला गया। शाहू महाराज, देवल मास्टर, मुजुमदार आदि इतने ख़ुश हो गए थे कि कहना ही क्या! सबको मन ही मन विश्वास हो गया था कि, ‘अब पीछे मुड़कर  नहीं देखना होगा! किर्लोस्कर मंडली का भाग्य उदय हो गया है और यश, कीर्ति, पैसा, प्रसिद्धि…किसी की भी कमी नहीं रहेगी। मुरझाई हुई किर्लोस्कर मंडली को आख़िरकार उर्जितावस्था (नवजीवन) प्राप्त हो गई है!’

अब नारायण बालगंधर्व हो गया

इसके बाद नारायण, नारायण रहा ही नहीं। वह मानो बालगंधर्व हो गया और सदा वैसा ही जिया। आगे से उसका उल्लेख ‘वे बालगंधर्व’ इसी रूप में करना उचित होगा। बालगंधर्व को भी अब बहुत उत्साह आ गया था। उनमें दुर्दम्य आत्मविश्वास उत्पन्न हो गया था। देवल मास्टर से अब सब कुछ सीख लेने का उन्होंने निश्चय कर लिया था। पर नियति के मन में कुछ और ही चल रहा था। ध्यान-मन में न होते हुए उन्हें देवल का वियोग सहना पड़ा। देवल शीघ्रकोपी थे। मुजुमदार से उनके कुछ मतभेद हो गए और देवल नाटक कंपनी…..…छोड़कर चले गए। उनके जाने के बाद बालगंधर्व को अन्य भूमिकाएँ सिखाने और अभ्यास कराने का काम चिंतोबा और बोडस को करना पड़ा। सौभद्र की सुभद्रा, मृच्छकटिक की वसंतसेना, मूकनायक की सरोजिनी और गुप्तमंजूष नाटक की नंदिनी — ये सभी भूमिकाएँ अब बालगंधर्व करने लगे। लोगों ने उन्हें इन सभी भूमिकाओं में मन से स्वीकारा, सराहा, सिर-आँखों पर बिठाया।

दत्तूमामा की नाराज़गी

सच पूछा जाए तो मुजुमदार की बड़ी इच्छा थी कि सन १९०५ में अपनी नाटक मंडली का रजत-महोत्सव मनाया जाए लेकिन परिस्थिति के आगे बस चला नहीं। मगर बालगंधर्व के आने से सारा अँधेरा छँट गया। रातों-रात मंडली का कायापलट हो गया। बदली हुई नई परिस्थिति का लाभ उठाकर मुजुमदार ने पुणे में रजत-महोत्सव मनाने की योजना बनाई। पुणे में अलग-अलग नाटकों के मंचन आयोजित करने का विचार तय हुआ। शुरुआत ‘गुप्तमंजूष’ नाटक से की जानी थी।

उस दिन घटी एक अप्रत्याशित घटना से सब के सब चकरा गए। मंचन से पहले बालगंधर्व के दत्तूमामा उनसे मिलने आए। सबसे बड़ी सहजता से मीठे स्वर में बातचीत की। फिर ‘नारायण को घर ले जाकर फिर वापस लाकर छोड़ दूँगा,’ ऐसा कहकर बालगंधर्व को लेकर निकले। लेकिन रास्ते में उनके बातचीत के तरीके से बालगंधर्व को उन पर शक हुआ। ज्योंही वह वापस जाना चाहने लगा, त्योंही दत्तूमामा ने उनकी कलाई कसकर पकड़ ली और उन्हे ज़बरदस्ती  घर ले गए। घर जाकर उन्होंने बालगंधर्व को डाँटते हुए कहा, ‘अगर फिर कभी उस नाटक मंडली में पैर रखा तो याद रखना।’

यह सारा मामला इतना अप्रत्याशित था कि कमसिन बालगंधर्व घबरा ही गए। उधर शंकरराव मुजुमदार को भी शक हो ही चुका था। इसीलिए उन्होंने एक आदमी को उनके पीछे लगाकर ख़बर निकलवा ली थी। नाटक मंडली में एक हड़कंप मच गया। फ़ौरन मुजुमदार स्वयं जोगळेकर को साथ लेकर दत्तूमामा के पास गए। बड़ी मिन्नतें करके उन्होंने जैसे-तैसे दत्तू मामा को मना लिया और वे बालगंधर्व को लेकर फिर से नाटक मंडली में लौट आए। उसके बाद मगर सभी ने यह गाँठ बाँध ली कि बालगंधर्व को कहीं भी अकेला नहीं छोड़ना है। आगे पूरे तैंतीस वर्षों तक यह प्रथा निभाई गई।

तुरुप का इक्का

बालगंधर्व की ख्याति सुनकर पुणे के दर्शक भी उन्हें देखने को आतुर हो उठे थे। उनकी एक झलक देखने के लिए लोगों के मन की उत्कंठा चरम पर पहुँच चुकी थी। इसलिए गुप्तमंजूष की नंदिनी को देखते ही दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत किया।

सुप्रसिद्ध हार्मोनियम वादक गोविंदराव टेंबे ने उन्हें पहली ही बार देखा और सुना था। उन्हें शास्त्रीय दृष्टि से बालगंधर्व के गायन में नौसिखियेपन के कुछ दोष दिखे। पर बालगंधर्व ने अपनी मोहक अदाकारी और रसपूर्ण गायन से उन पर ऐसा झीना सा पर्दा डाल दिया कि गोविंदराव से उनकी प्रशंसा किए बिना रहा न गया। कमसिन और खूबसूरत बालगंधर्व ने उस समय की युवा-पीढ़ी को दीवाना बना दिया। बड़ी संख्या में युवा दर्शक नाटकों में भीड़ लगाने लगे। पुराने अभिनेताओं की तुलना में बालगंधर्व अभिनीत स्त्री-पात्रों  में एक नई सी चंचलता थी जो युवाओं को आकर्षित करने लगी।  जिस नारायण को ‘फूटा घड़ा’ कहकर तुच्छ माना गया था, वही लड़का अब बालगंधर्व बनकर किर्लोस्कर नाटक मंडली का तुरुप का इक्का बनकर बैठ गया था। दुर्भाग्य की मार झेल चुकी नाटक मंडली का भाग्य-तारा बनकर आकाश में चमकने लगा था।

‘उगिच का कांता, सुलभ मनी गणा न भूपसुता’  आदि नाट्यगीत लोगों के होंठों पर बस गए। ‘होय संसार’ यह गाना मूलतः रामकली राग में बँधा हुआ था। पर एक बार में बालगंधर्व ने ज्योंही उसे बागेश्री राग में गाना शुरू किया, दर्शक सँभलकर बैठ गए। वह गाना लोगों को इतना पसंद आया कि ज़ोरदार तालियाँ बजीं और दर्शकों में मानो नवचेतना की बिजली कौंध गई।

आत्मविश्वास जागा

बालगंधर्व की लोकप्रियता दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही थी, फिर भी शुरुआत में वे  नौसिखियेपन की वजह से सहमे-सहमे रहते थे। उनका कुल मिलाकर हुलिया फूहड़ सा ही रहता था। चेहरे पर कुछ-कुछ भोलेपन और बुद्धूपन की झलक दिखती थी। वे दूसरों से डरकर ही चलते थे। वैसे तो उन्हे स्नान के बाद गुरुचरित्र या शिवलीलामृत  की पोथी पढ़ने की आदत थी। पर कंपनी में पवित्रता-अपवित्रता  (शुद्धि-आचार) का पालन नहीं होगा और पाप लगेगा,  इस डर से उन्होंने पोथी पढ़ना ही छोड़ दिया था। उनके नाटक में अभिनय करने को रिश्तेदारों ने पसंद नहीं किया था।  इस अहसास से कि उन्हें प्रियजनों के प्रेम से दूर होना पड़ेगा, वे विचलित हो जाते थे। आँखों से अश्रुधाराएँ बहतीं।

शाकुंतल के पहले नाट्य-मंचन के समय का उनका अभिनय और दो वर्ष बाद का अभिनय —  दोनों में ज़मीन-आसमान का अंतर आ चुका था। उनका पहले का संकोच दूर हो गया था और अब उसकी जगह आत्मविश्वास और अभ्यस्तता, नफासत ने ले ली थी। अब उनके हर नाट्यगीत पर दर्शक वन्समोर के नारे लगाते । ज्यों-ज्यों उनका अनुभव समृद्ध होता गया, त्यों-त्यों उनकी भूमिकाएँ भी खिलती गईं। १९१० में ‘प्रेमशोधन’ नामक एक नाटक रंगमंच पर आया। इस नाटक से बालगंधर्व की भूमिकाओं को एक अलग ही ऊँचाई प्राप्त हुई। इसके अलावा एक और बदलाव इस नाटक से किया गया था। तबला-हार्मोनियम बजानेवाले वादकों के विंग में (पर्दे के पीछे) बैठने की प्रथा बदली। उसके बजाय वे दर्शकों के सामने बैठने लगे। यह बदलाव संभवतः बालगंधर्व के कान के दोष के कारण किया गया होगा। डॉ. व्हेल के उपचार से उनकी स्थिति में काफ़ी सुधार हुआ था, फिर भी उनका वह दोष पूरी तरह नहीं हो पाया था। उन्हें विंग से संगत के स्वर ठीक से सुनाई नहीं देते थे। वाद्यों का स्थलांतर उनके लिए सहायक हुआ। सुंदर रूप, मीठा गला, भावपूर्ण चेहरा — ऐसी सभी चीज़ों की देन बालगंधर्व को जन्मजात मिली होने पर भी, अभिनय-कला को अर्जित करने के लिए उन्होंने पाँच वर्ष मेहनत की। एक तरह से वह उनकी तपस्या ही थी जो उन्होंने  पूरी तरह डूबकर की।

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