ओ मानस के राजहंस …
लेखिका - मंजूषा आमडेकर
६. कुछ और टुकड़े
सुरंगें बिछाई गईं
अब तक कोई भी नाट्यसंस्था मानो एक विशाल परिवार ही हुआ करती थी। साथ रहना, खाना-पीना, मौज-मस्ती, हँसी-ठिठोली करना, बीमारी में एक-दूसरे की सेवा-सुश्रूषा करना…जीवन इसी तरह चलता रहता था। सभी को एक-दूसरे का साथ मिलता था। कंपनी में निरंतर बड़े-बड़े कलाकार, समाज के धनी और रसिक लोगों का आना-जाना लगा रहता था। नए गाँव में पड़ाव होता तब नए लोग मिलते थे। आसपास के इलाके की अच्छी-अच्छी जगहें देखने को मिलतीं। नए अनुभव मिलते। कभी-कभी कंपनी के मालिकों के परिवार भी साथ होते थे।
पर अन्य व्यवसायों की तुलना में इसमें भागीदारी का स्वरूप अलग था। यहाँ एक-दूसरे के स्वभावदोषों का झट से अंदाज़ा लग जाता था। उसके अलावा आसपास के दूसरे लोगों के मत, झुकाव और कुछ स्वार्थ — ये बातें भी भागीदारी पर असर डालती थीं। बालगंधर्व ही नाटक मंडली का सौभाग्य थे, इसमें किसी की दोराय नहीं थी। खाडिलकर और पंडित को तो शुरू से ही लगता था कि बालगंधर्व अकेले ही कंपनी के मालिक होने चाहिए। पर किसी न किसी की भागीदारी चलती ही रही। स्वयंवर और एकच प्याला ज़ोरदार चलने वाले नाटक थे, इसलिए कंपनी के मुनाफे में कोई कमी नहीं थी। फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं था कि बालगंधर्व और गणपतराव की भागीदारी के नीचे सुरंगें बिछाने का काम परदे के पीछे से किया जा रहा था। बाळासाहेब पंडित का विचार था कि नाटक के साथ-साथ कोई न कोई जोड़धंधा होना चाहिए ताकि आमदनी बढ़ती रहे। वे उसके अनुसार प्रयत्न भी करते थे। पर सब कुछ उल्टा होता औरकर्ज़ का बोझ बढ़ता जा रहा था। इन व्यक्तिगत कर्ज़ों को चुकाने के लिए बालगंधर्व मंडली की आमदनी पर पूरा कब्ज़ा पाना उनके लिए अनिवार्य हो बैठा था। पर जब तक गणपतराव भागीदारी में थे, तब तक यह संभव नहीं था।
बाळासाहेब की चालें
व्यवसाय करने की दृष्टि से मुंबई में रहकर गुजरातियों से हाथ मिलाना ज़रूरी था। इसलिए बाळासाहेब ने आग्रह किया कि मुंबई में ही स्थायी रूप से पड़ाव डाला जाए। बुधवार, शनिवार, रविवार और छुट्टी के दिन बालगंधर्व भूमिकाएँ करें, और बाकी दिनों के लिए एक दुय्यम (गौण) मंडली तैयार की जाए — यही उनकी योजना थी। पर इससे खर्च बढ़ जाता, इसलिए गणपतराव ने इस योजना का विरोध किया।
बाळासाहेब जब सोलापुर बैंक में थे, तब एक मामले में हुए घोटाले के संबंध में उन पर फ़ौजदारी मुकदमा चालू हो गया था। उससे छूटने के लिए भी उन्हें पैसों की ज़रूरत थी। शुरुआती दिनों में अपना पैसा बालगंधर्व के लिए खर्च करने में बाळासाहेब ने कभी आगे-पीछे नहीं देखा था।लेकिन अब ऐसी घड़ी आ पहुँची थी कि उन्हें अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए बालगंधर्व का पैसा इस्तेमाल करना ज़रूरी हो गया था।
गणपतराव की योग्यता बालगंधर्व और बाळासाहेब, दोनों जानते थे। उन्हीं के नीतिपूर्ण स्वभाव के कारण सारे कर्ज़ चुक गए थे और अब कंपनी कर्ज़मुक्त हो गई थी। यह सच होते हुए भी, जोड़धंधों की तिकड़मों के कारण बाळासाहेब पर जो व्यक्तिगत कर्ज़ चढ़ गया था, उसका क्या किया जाए — यह समस्या उनके सामने थी।
विवाद
इसके अलावा, अपनी मर्ज़ी के अनुसार कंपनी चलाना हो तो भागीदारी न रहे यही बेहतर — इस मत पर खुद बालगंधर्व ही आ पहुँचे थे। इसके अतिरिक्त, जब से दोनों सपरिवार कंपनी में रहने लगे थे, तब से उनके और गणपतराव के बीच मतभेद भी होने लगे थे। एकच प्याला के शानदार मंचन करने के बाद कंपनी ने वार्षिक छुट्टी ली थी। वह समाप्त होने पर १५ नवंबर १९१९ को मुंबई में पहला ही मंचन हुआ, तब तक भागीदारी का विवाद सलाहकार समिति तक जा पहुँचा था। गणपतराव के विरुद्ध पहली शिकायत यह थी कि, ‘रंगभूमि के लिए खर्च करना पड़े तब भी समय आने पर कर्ज़ लेने में गणपतराव का विरोध रहता है, जिससे बालगंधर्व को घुटन होती है’।
अब बिलकुल आर-पार की नौबत पर आ पहुँची। यह समस्या यहाँ तक पहुँच गई थी कि कंपनी में या तो बालगंधर्व रहें, या फिर गणपतराव। वैद्य और लाड ने समझौता कराने के बहुत प्रयत्न करके देखे। पर उसका कुछ भी फायदा न होने के कारण तय हुआ कि २४ नवंबर १९१९ को गणपतराव कंपनी से और भागीदारी से मुक्त हो जाएँ। गणपतराव के हिस्से के लिए बालगंधर्व ने उन्हें सत्ताईस हज़ार रुपए देना स्वीकार किया और १ दिसंबर १९१९ से बालगंधर्व कंपनी के सर्वेसर्वा बन गए। वे अकेले मालिक बन गए।
बोडस के कंपनी से चले जाने पर उनकी कॉमेडी भूमिकाएँ कृष्णाप्पा भांडारकर और सुधाकर की भूमिका विद्याधर जोशी करने लगे। पर वे भूमिकाएँ गणपतराव की भूमिकाओं जैसी उच्च स्तर की न होने के कारण नाटकों की लोकप्रियता में फ़र्क पड़ा। फिर भी संशयकल्लोळ को छोड़कर अन्य नाटकों की आमदनी पर कोई असर नहीं पड़ा। नाटकों के बारे में लोगों की राय यह थी कि, ‘बालगंधर्व का सुभद्रा का अभिनय अब और भी ख़ास हो गया है, और स्वयंवर की ही तरह सौभद्र की ओर भी दर्शक ज़ोर से खिंचे चले आ रहे हैं। सौभद्र वैसे ही समृद्ध नाटक है, और गंधर्व कंपनी के कारण वह और भी समृद्ध हो गया है।’
पुणे में गंधर्व कंपनी ने अपना सातवाँ वर्धापनदिन (स्थापना-दिवस) बड़े पैमाने पर मनाया। पर बोडस की कमी सभी को खली। बाळासाहेब ने अपनी योजना के अनुसार एक और मंडली तैयार की। कंपनी के कैलेंडर छपवाकर कंपनी के महीने भर के कार्यक्रम की घोषणा करना शुरू किया। सीज़न टिकट की प्रथा भी बाळासाहेब ने शुरू की।
द्रौपदी
बोडस के चले जाने के बाद द्रौपदी नाटक रंगभूमि पर लाया गया। बालगंधर्व को मानो रंगभूमि को सजाने का शौक़ ही लग गया था। दूसरे महायुद्ध से पहले के दौर में इस नाटक पर लगभग सत्तर हज़ार रुपये खर्च हुए। पहले ही दिन नाटक के टिकट खिड़की पर उपलब्ध नहीं हुए, क्योंकि वे पहले ही बिक चुके थे। न जाने क्यों, पर द्रौपदी नाटक दर्शकों के मन की थाह नहीं ले सका। ऐसी स्थिति आ पहुँची कि इस नाटक पर खर्च किए गए सत्तर हज़ार रुपये कहीं बेकार न चले जाएँ। पर जल्द ही बालगंधर्व ने द्रौपदी की भूमिका में ऐसी कुछ जान डाली कि देखते ही देखते वह स्वयंवर और एकच प्याला जितना ही लोकप्रिय हो बैठा।
१९०६ में बालगंधर्व को पहली बार देखने वाले डॉ. रा.म. भातखंडे ने उनका वर्णन ‘भोले-भाले चेहरे की मूरत’ के रूप में किया था। और अब देखते ही देखते उसी बालक का राजहंस में रूपांतरण हो गया था। भातखंडे को भले ही बालगंधर्व ऐसे लगे हों, पर लोकमान्य तिलक को तो उनमें सचमुच एक राजहंस दिखाई दिया था। उनका सुंदर रूप, आवाज़ की गंधर्वता और निश्छल भाव देखकर उन्होंने ही नारायण को ‘बालगंधर्व’ यह नाम दिया था। उसे आगे चलकर उन्होंने सार्थक करके दिखाया। उनका चेहरा अत्यंत भावपूर्ण और तरल था। वे कोई भी भूमिका साकार करते, दर्शक उन पर मुग्ध हो जाते। बालगंधर्व मूलतः ही प्रतिभासंपन्न अभिनेता और गायक थे। वे किसी भी भूमिका के साथ एकरूप हो जाते। अत्यंत तन्मयता से वे अपनी भूमिका निभाते।
बालगंधर्व उत्स्फूर्त (स्वतःस्फूर्त) कलाकार थे। अपनी भूमिकाएँ निभाने के लिए वे किसी भी प्रकार के चिंतन-मनन का सहारा नहीं लेते थे। वे किसी से भूमिका के बारे में चर्चा नहीं करते थे। जानकारी इकट्ठा नहीं करते थे। पर केवल इशारा पाते ही वे किसी भूमिका के अंतरंग में सहज ही प्रवेश कर जाते और उस भूमिका के साथ एकरूप होकर उसे तन्मयता से साकार करते। उस ज़माने में नाट्यसंस्था किसी विशाल परिवार जैसी होती थी। वहाँ रहने वाला व्यक्ति कला को समर्पित हो जाता था। अपनी नाट्यसंस्था के प्रति निष्ठा रखता था। तालीम-मास्टर (रिहर्सल-गुरु) गुरु के स्थान पर होता था। उसकी आज्ञा का उल्लंघन संभव ही नहीं था। गुरु एक तरह की अभिनय की पाठशाला ही होती थी। जो अभिनेता नाटक में भूमिका नहीं करते थे, वे भी रिहर्सलों में हाज़िर रहते थे। यदि किसी अभिनेता के सामने ऐन वक़्त पर कोई समस्या आ जाए तो उसकी जगह ये केवल रिहर्सल देख कर सीखे हुए अभिनेता काम चला सकते थे।
बालगंधर्व का सौभाग्य था कि उन्हें शुरू से ही देवल, खाडिलकर, किर्लोस्कर, बोडस जैसे शिक्षकों के पास सीखने का अवसर प्राप्त हुआ। गोविंदराव टेंबे, भास्करबुवा बखले से भी सीखने को मिला। शुरुआती तेरह वर्षों में उन्हें नौ अविस्मरणीय भूमिकाएँ निभाने का अवसर मिला। शकुंतला, शारदा, सुभद्रा, वसंतसेना, भामिनी, देवयानी, रेवती, रुक्मिणी और सिंधु — उनके द्वारा रची गई ये नायिकाएँ इतिहास में अमर हो बैठीं।
इन्हीं भूमिकाओं के भरोसे पर खाडिलकर ने बालगंधर्व को द्रौपदी की भूमिका दी। उसे भी बालगंधर्व ने लोकप्रियता की ऊँचाई पर पहुँचा दिया। इतनी ताकत से रंगभूमि पर छा जाने वाला यह आख़िरी नाटक साबित हुआ।