Logo

ओ मानस के राजहंस …

लेखिका - मंजूषा आमडेकर

७. कर्ज़ का बोझ और उससे मुक्ति

पारिवारिक ज़िम्मेदारी

बालगंधर्व रंगमंच पर जितनी कुशलता से विचरण करते, उतनी ही समर्थता से उन्होंने पारिवारिक ज़िम्मेदारी भी निभाई थी। किर्लोस्कर मंडली में प्रवेश करने के क़रीब दो ही वर्षों बाद उनके पिता सेवानिवृत्त होकर घर बैठ गए। उन्हें पेंशन नही मिलती थी फिर भी उनका और अन्नपूर्णाबाई का खर्चीला स्वभाव बिलकुल नहीं बदला था। बालगंधर्व के बड़े भाई शंकरराव एल.एम. एंड एस. डॉक्टर की परीक्षा पास कर चुके थे और नौकरी भी करते थे। उनके साथ पत्नी और बेटा था। पर बालगंधर्व की प्रतिष्ठा को देखते हुए यह माना गया कि भाई का साधारण नौकरी करना अच्छा नहीं लगता इसलिए उन्हें नौकरी छोड़कर घर बैठा दिया गया। बालगंधर्व की बहन वेणूताई पति से विवाद के कारण मायके आकर रहने लगी थीं। बालगंधर्व के पिता १९१८ में चल बसे। बालगंधर्व के छोटे भाई व्यंकटेश ने टंकलेखक (टाइपिस्ट) के रूप में नौकरी कर ली। पर तब तक उनकी भी ज़िम्मेदारी बालगंधर्व पर ही थी। आगे चलकर व्यंकटेश ने कुछ समय नाटक में भूमिकाएँ कीं। फिर बखलेबुवा के पास शास्त्रीय संगीत सीखना शुरू किया।

बालगंधर्व और उनकी पत्नी लक्ष्मीबाई की संतानें एक के बाद एक चल बसीं। हीरा, कृष्णा, नागनाथ — ये बच्चे बचपन में ही चल बसे। बाद में कमला और सरोजिनी — ये बेटियाँ १९२० में जीवित थीं।

बालगंधर्व इतने बड़े परिवार को चला रहे थे, फिर भी उन्होंने कभी अपने-पराए का भेदभाव नहीं किया। उनका आचरण सदाचारी था। वे किसी का दिल न दुखाते  थे। पत्नी सुंदर नहीं थीं और संतान-सुख भी नहीं था, फिर भी बालगंधर्व ने परस्त्री को कभी बुरी नज़र से नहीं देखा। चाय, पान, तंबाकू और कभी-कभार पोर्ट वाइन — बस इतने ही उनके मामूली शौक़ थे। पिता का देहांत होने पर उन्होंने पान खाना छोड़ दिया और लोकमान्य तिलक का देहांत होने पर चाय पीना छोड़ दिया, वह भी हमेशा के लिए।

हिसाब बिगड़ा

व्यवहारिक लेनदेन के मामले में उन्होंने बाळासाहेब पर पूरा भरोसा किया था। हम तो अपनी कला को निखारें और पैसों का जो देखना है वह बाळासाहेब देख लेंगे — यही उनकी धारणा थी। पर बाळासाहेब खुद ही  बेहिसाब व्यक्ति थे, इसलिए आगे चलकर सारा गणित ही बिगड़ गया!

बालगंधर्व अक्षरशः बाळासाहेब के कहे में थे, पूरी तरह उनके वश में थे। इतना कि महीने के आख़िर में बँटवारा होने पर बोडस को एक हज़ार रुपए दिए गए। बालगंधर्व के हिस्से सत्रह सौ रुपए आने पर भी उनकी जेब में अपने खर्च के लिए एक रुपया तक नहीं था, ऐसी नौबत आ गई।  सारा का सारा पैसा लेकर बाळासाहेब तीर्थयात्रा पर निकल गए थे। दादा काटदरे को यह पता चलते ही वे बोले, ‘यह यूँ ही चलता रहा तो एक दिन तुम्हें अपना हिस्सा साहूकार के यहाँ गिरवी रखना पड़ेगा।’

बालगंधर्व ने केवल चिंतित भाव से यह सुन लिया। बाद में बाळासाहेब के तीर्थयात्रा से लौटने पर यह बात उनके कानों तक पहुँची  और वह भी ज़ाहिर है बालगंधर्व के ही ज़रिए! उसका एक ही परिणाम हुआ। वह यह कि दादा काटदरे को कंपनी से निकाल दिया गया। अपने कारोबार में कोई दख़लंदाज़ी न करे, इसकी बाळासाहेब पूरी-पूरी सावधानी रखते थे। बालगंधर्व के परिवारवालों को भी उन्होंने कंपनी के व्यवहार से दूर ही रखा था।

बालगंधर्व का निजी गायन कार्यक्रम बाळासाहेब की अनुमति के बिना तय नहीं होता था। वे आसानी से किसी से मिल भी नहीं सकते थे। इसी कारण बालगंधर्व के बारे में कुछ दंतकथाएँ जन्म ले बैठीं। बालगंधर्व बाळासाहेब से लेनदेन से जुड़ा कोई प्रश्न नहीं पूछते थेऔर वे भी अपने किए हुए लेनदेन के बारे में किसी से कुछ भी नहीं कहते थे। पर क्या कुछ चल रहा है यह समझ सकते थे, ऐसे एकमात्र व्यक्ति थे काकासाहेब खाडिलकर। पर उन्होंने अलिप्तता की नीति अपना ली थी। कोई कुछ पूछे, सलाह माँगे तभी बोलना है, यह उन्होंने तय कर रखा था।

द्रौपदी नाटक के तुरंत बाद ही बाळासाहेब पर सोलापुर में दाखिल हुए फ़ौजदारी मुकदमे के सिलसिले में उन्हें बार-बार वहाँ जाना पड़ने लगा। इससे कंपनी का नियंत्रण मानो हाथ से जाता रहा। इसका परिणाम यह हुआ कि डोरकीपर को पैसे देकर लोग बिना टिकट अंदर घुसने लगे। कंपनी को सामान सप्लाई करने वाले लोग मनमाने बिल बनाने लगे। अफरा-तफरी का कारोबार शुरू हो गया।

पर बाळासाहेब इतने चतुर थे कि वे यह बात पूरी तरह समझते थे कि उनके अन्य व्यवसायों का सारा ढाँचा मूलतः कंपनी और समाज में बालगंधर्व की प्रतिष्ठा पर ही टिका हुआ था।कंपनी की व्यवस्था बिगड़ने न पाए, वैकल्पिक मंडली ठीक से तैयार रहे, इस ओर उनका ध्यान रहता था। बोडस फिर से कंपनी में आ जाएँ, बालगंधर्व की यही इच्छा थी।

फिर कुंटे पिता-पुत्र और सॉलिसिटर लाड प्रयत्न करके उन्हें फिर से कंपनी में ले आए। यह तय हुआ कि उन्हें हर महीने तीन सौ रुपये वेतन दिया जाए। उनके आते ही नाटक फिर से रंग जमाने लगे।

कर्ज़ का फूलता गुब्बारा

इस बीच द्रौपदी नाटक की साज-सज्जा पर किया गया बेहिसाब खर्च और बालासाहेब पर चल रहे मुक़दमे के कारण बालगंधर्व भारी कर्ज़ के बोझ तले दबे हैं, यह ख़बर चारों ओर फैल चुकी थी। नाटक ख़ूब चल रहे थे, इसलिए आमदनी भी ख़ूब थी। इसी कारण सबने यह मान लिया था कि यह कर्ज़ कभी-न-कभी चुक ही जाएगा। पर मज़ेदार बात यह थी कि कर्ज़ की निश्चित राशि  कितनी है, यह ख़ुद बालासाहेब को भी मालूम नहीं था। पैसा बालगंधर्व के दम पर मिल रहा था और बालासाहेब वह पैसा मनमाने ढंग से उड़ा रहे थे। आख़िर जब मंडली मुंबई से पुणे लौटने लगी, तब साहूकारों के पठानों ने उन्हें रास्ते में रोक लिया। यह देखकर सबके होश उड़ गए। यह ख़बर जहाँ-तहाँ हवा की तरह फैल गई। बालगंधर्व को साहूकार रोकें, यह बात तो किसी के दिमाग में ही नहीं समा सकती थी।

उस समय ख़ुद बालासाहेब सोलापुर में थे। इसलिए बालगंधर्व सहित सब लोग भयभीत और स्तब्ध रह गए। बालासाहेब ने किसके साथ क्या-क्या लेन-देन किया है, इसका किसी को कोई अंदाज़ा नहीं था। बालासाहेब जो काग़ज़ सामने रखते, बालगंधर्व विश्वास के साथ बस उस पर हस्ताक्षर कर देते थे। अब ऐसे प्रसंग में कौन किसे ढाढस बँधाए, यही असली समस्या थी। क्या किया जाए, यह तो किसी को मालूम ही नहीं था। ऐसे समय में सॉलिसिटर लाड आगे आए। गंधर्व मंडली के आय-व्यय और कर्ज़ आदि  के काग़ज़ात देखने पर उन्हें पता चला कि बालगंधर्व बहत्तर साहूकारों के कुल मिलाकर एक लाख अस्सी हज़ार रुपए के देनदार हैं। इनमें से बहुत-से कर्ज़ बेहिसाब ब्याज-दर पर लिए गए थे। इंद्रप्रस्थ में मायासभा खड़ी करने वाले की तरह, बालासाहेब के कर्ज़ लेने की जुए-जैसी लत ने बालगंधर्व की कंपनी को धूल में मिला दिया था।

कर्ज़ चुकाने की ज़िम्मेदारी उठाई

यह सारा कर्ज़ चुकाने का बोझ अब अकेले बालगंधर्व पर आ पड़ा था और कर्ज़ चुकाने के लिए उनके पास अपनी कला के अलावा दूसरा कोई साधन भी नहीं था। यदि साहूकार उन पर मुक़दमा चलाकर उन्हें जेल में बैठने की नौबत तक ले आते, तो उनके कला-जीवन पर हमेशा के लिए कठोर आघात पहुँचता।

आख़िरकार सॉलिसिटर लाडसाहेब ने ही इसका हल खोज निकाला। कर्ज़ की राशि  बहुत बड़ी थी। मुंबई के काशिनाथ दामोदर खोटे का पूरे साठ हज़ार का कर्ज़ था। लाडसाहेब ने गंधर्व मंडली की सारी संपत्ति उस कर्ज़ के बदले गिरवी रख दी। उसके बाद २९ मई १९२१ को लाडसाहेब ने यह सारी संपत्ति अपने अधिकार में ले ली। अनेक साहूकारों से सुलह-समझौते की बातचीत करके उन्होंने उन्हें कुछ समय रुकने को कहा। जो साहूकार बात सुनने को तैयार ही नहीं थे, उनके पैसे चुका दिए। कइयों को यह कहकर डाँट लगाई कि ‘नारायणराव के दिवालिया होने की अर्ज़ी तैयार है।’

बालगंधर्व की लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि यह ख़बर सुनकर उनका समूचा रसिक-समुदाय व्यथित हो उठा। मुंबई के नेता और धनी लोग एकत्र होकर बालगंधर्व की मदद करने पर तुल गए। सबने मिलकर पैसे इकट्ठा करके एक ही सप्ताह में एक लाख अस्सी हज़ार जुटाने का निश्चय किया। पर जब यह बात बालगंधर्व को पता चली, तब वे भावुक होकर बोले, ‘भगवान के लिए, मेरे लिए कोई फंड इकट्ठा मत कीजिए। यह कर्ज़ मेरी ही ग़लती से चढ़ा है और इसे मुझे ही चुकाना चाहिए। जब तक यह न चुक जाए, तब तक आप सबका आशीर्वाद और प्रभु की कृपा सदा बनी रहे,  बस इतनी ही प्रार्थना है।’

यह कर्ज़ किन-किन कामों में लगा था? ….. बालासाहेब के सोलापुर मुक़दमे के लिए ५१,०००/-; बालासाहेब के घर-खर्च आदि में हुए नुक़सान की भरपाई के लिए १५,०००/-; गणपतराव की हिस्सेदारी छुड़ाते समय उन्हें दिए गए २७,०००/-; और द्रौपदी नाटक पर किया गया बेहिसाब खर्च ७२,०००/-। संक्षेप में, बालगंधर्व ने इसमें से अपने व्यक्तिगत कारणों के लिए एक पैसा भी खर्च नहीं किया था। पर चूँकि वह कर्ज़ मूलतः उनकी साख और उनके नाम पर ही लिया गया था, इसलिए उसे चुकाने की ज़िम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर आ पड़ी थी। और उन्होंने उसे उदार मन से स्वीकार कर लिया था।

पठानों द्वारा रोके गए सामान को छुड़ा लेने के बाद, गंधर्व मंडली ने पुणे लौटने के बजाय मुंबई में ही अपना निवास बढ़ा दिया। अब तक कर्ज़ का बड़ा हिस्सा चुकाया जा चुका था। यह सब चलते रहने पर भी नाटक बहुत अच्छे चल रहे थे और आमदनी भी ख़ूब हो रही थी। इतनी मानसिक आघात और विश्वासघात सहकर भी बालगंधर्व बालासाहेब के बारे में एक भी अनुचित शब्द नहीं बोलते थे। बोडस फिर से कंपनी में आ गए थे। उन्होंने बालगंधर्व का साथ देने का निश्चय किया। केशवराव भोसले ने उन्हें अपनी कंपनी में हिस्सेदारी देने की पेशकश की थी, फिर भी उसे ठुकराकर बोडस गंधर्व कंपनी में ही रहे। और बालगंधर्व भी उनसे खुलकर सलाह-मशवरा करने लगे।

दादा काटदरे

उस आपातकालीन  प्रसंग में लाडसाहेब ने गंधर्व मंडली की जो भी मदद की थी, उसकी क़दर सभी करते थे। हर नाटक में उनके लिए कुछ सीटें आरक्षित रखी जाती थीं। उनकी बेटी विठाबाई नाटक देखने आया करती थी। आगे चलकर वही दुर्गाबाई खोटे के नाम से सिनेमा में अभिनय करने लगी और प्रसिद्ध हुई। गंधर्व मंडली के लिए लाडसाहेब ने जिस व्यवस्थापक को नियुक्त किया था, उसे नाट्य-व्यवसाय की कोई जानकारी न होने के कारण लगातार दिक़्क़तें आने लगीं। इन पर क़ाबू पाने के लिए लाडसाहेब ने दादा काटदरे को फिर से बुलवा लिया। तीन साल पहले इन्हीं दादा ने बालासाहेब की करतूतें देखकर बालगंधर्व को सावधान करने की कोशिश की थी  और इसी कारण उन्हें ही कंपनी से निकाल दिया गया था। अब उसी आदमी के बारे में ख़ुद बालगंधर्व ने ही यह कहकर सिफ़ारिश की कि ‘दादा जैसा हिसाब-किताब में पक्का और ईमान दार आदमी दूसरा नहीं मिलेगा,’ इसलिए लाड ने उन्हें व्यवस्थापक के रूप में नियुक्त कर दिया।

दादा को लक़वा (पक्षाघात) और मधुमेह था और उनके सामने पारिवारिक समस्याएँ थीं। वे विधुर थे। फिर भी, बालगंधर्व को कर्ज़ चुकाने में वे कुछ सहायता कर सकें इस इच्छा से वे फिर कंपनी में आने को तैयार हो गए। पर उनके साथ-साथ रोज़मर्रा के प्रबंधन के लिए बालगंधर्व के भाई बापूराव आगे बढ़े। वे बखले के पास शास्त्रीय संगीत सीख रहे थे। पर अब, उस समय भाई को उनकी ज़्यादा ज़रूरत है, यह समझकर उन्होंने भी अपनी ज़िम्मेदारी का हिस्सा उठा लिया। वे दर्शकों का मुस्कुराते हुए स्वागत करते और कर्मचारियों की देखभाल करते थे; जबकि दादा काटदरे कंपनी की आमदनी और खर्च पर नियंत्रण रखने का काम करते थे।

लोगों के असली रंग दिखाई दिए

लाड के बागडोर सँभालते ही, बालगंधर्व के एक चाहने वाले ने अपना बकाया वसूलने के लिए बालगंधर्व पर दीवानी जेल का नोटिस निकलवा दिया, तब बालगंधर्व घबरा गए। उस समय लाडसाहब ने कहा था कि, ‘बेलिफ़ के आते ही मैं आपका सारा पैसा चुका दूँगा। चिंता न करें। पर आपके सामने भलाई करने वाले कुछ ’मित्र’ असल में कैसे हैं, यह मैं आपको दिखा देना चाहता हूँ।’

और सचमुच, कई नमूने सामने आए। किसी को बालगंधर्व के पैसे पर क़ब्ज़ा चाहिए था, किसी को कंपनी पर, और किसी को तो ऐसा लगता था कि बालगंधर्व ख़ुद ही उनके नौकर बन जाएँ तो अच्छा…! इस बार लाड ने शुरू से ही काटदरे से कह रखा था कि, ‘नारायणराव को यह महसूस न होने दें कि वे पराधीन हो गए हैं। वे यही समझकर ठाठ से रहें कि वे पहले की तरह ही मालिक हैं। वे कलाकार हैं; उन्हें ख़ुश रखेंगे, तभी उनके हाथों कला-निर्मिति होगी और साहूकारों का कर्ज़ चुकेगा।’

बागडोर सँभालने के बाद से लाड ने सचमुच मन से बालगंधर्व को प्रोत्साहन दिया। बालगंधर्व ने ज्यों ही शिकायत की कि वाद्य पुराने हो गए हैं, त्यों ही उन्होंने नए वाद्य ख़रीद दिए।

संयुक्त मानापमान

केशवराव भोसले और बालगंधर्व — दोनों ने ही युवावस्था में शारदा की भूमिका की थी। दर्शकों ने दोनों को ही सिर-आँखों पर बिठाया था। पर केशवराव मूलतः रूपवान नहीं थे और उनका अभिनय भी बालगंधर्व जितना सशक्त नहीं था। इसलिए उन्होंने धीरे-धीरे पुरुष-भूमिकाएँ करनी शुरू कर दी थीं। रसिक दर्शक भले ही दोनों को प्रतिद्वंद्वी मानते रहे हों, फिर भी दोनों को नायक-नायिका के रूप में एक साथ भूमिका निभाते देखने की उत्सुकता उन्हें थी। उनके लिए संयुक्त मानापमान  नाटक के मंचन का प्रयत्न अच्युतराव कोल्हटकर ने किया, पर उसमें सफलता नहीं मिली।

आगे चलकर, १ अगस्त १९२० को लोकमान्य तिलक के देहांत के बाद, महात्मा गांधी के नाम से ‘तिलक स्वराज्य फंड’ शुरू किया गया। इसके लिए धन इकट्ठा करने हेतु एक संयुक्त मंचन किया जाए. यह  इच्छा डॉ. भडकमकर ने व्यक्त की। बालगंधर्व के कुछ चाहने वाले इस विचार के विरोध में थे। परंतु ख़ुद बालगंधर्व इसे प्रतिस्पर्धा के रूप में न देखकर तिलक की सेवा के रूप में देख रहे थे। इसलिए बालगंधर्व अचानक पुणे जाकर ललितकला मंडली से मिले। केशवराव और अन्य सदस्य उन्हें देखकर चकित रह गए। केशवराव ने उनकी बात सुनी और संयुक्त मानापमान के मंचन के लिए सहमति दे दी।

यह यह नाट्य-मंचन ८ जुलाई १९२१ को मुंबई में होने वाला था। अब हर किसी की ज़बान पर बस यही एक चर्चा थी। ग्रांट रोड के बालीवाला ग्रांड थिएटर में होने वाले इस नाटक का पहला (सबसे महँगा) टिकट सौ रुपये का और आख़िरी पाँच रुपये का रखा गया  था। बिक्री शुरू होते ही केवल आधे घंटे में टिकट बिक गए। पूरे सोलह हज़ार रुपये इकट्ठा हो गए। टिकट न मिल पाने से निराश हुए दर्शकों की भीड़ भी उतनी ही भारी थी। इस नाटक के मंचन के लिए दोनों मंडलियों के चुनिंदा कलाकारों का चयन किया गया था। पात्र-योजना इस प्रकार थी: बालगंधर्व — भामिनी, बोडस — लक्ष्मीधर, केशवराव — धैर्यधर, वालावलकर — विलासधर, चापेकर — अक्कासाहेब, पेंढारकर — ऑर्गन, और तबले पर राजण्णा।

हर नाटक ख़ूब जमा। केशवराव और बालगंधर्व के बीच अच्छी-ख़ासी सुलह हो चुकी थी। चौथे अंक में एक दृश्य ऐसा था जिसमें भामिनी धैर्यधर के जूते उठाती है। केशवराव ने मंच पर धीरे से कहा, ‘नारायणराव, आप मेरे लिए पिता समान हैं — मेरे जूते मत उठाइए।’

संयुक्त सौभद्र और केशवराव का निधन

तिलक फंड में मदद के रूप में मानापमान का मंचन करना तय हुआ था, फिर भी आगे एक संयुक्त सौभद्र के मंचन की भी योजना बनाई गई। चूँकि यह नाटक मुनाफ़े के लिए किया जा रहा था, इसलिए यह तय हुआ कि दोनों मंडलियाँ मुनाफ़ा आपस में बाँट लें। इस नाटक में भी ज़बरदस्त भीड़ जुटी। इसमें पात्र-योजना इस तरह थी: बालगंधर्व — सुभद्रा, केशवराव — अर्जुन, मास्टर कृष्णराव — नारद, बोडस — कृष्ण, रानडे — रुक्मिणी। इसके बाद ऐसे कुछ और नाटकों के मंचन होंगे — यह आशा दर्शकों को भी थी और कलाकारों को भी। केशवराव ने तो खुलकर बालगंधर्व से यह तक कह दिया कि, ‘नारायणराव, कर्ज़ की चिंता क्यों करते हैं? ऐसे ही संयुक्त नाट्य-मंचन करके एक साल में आपका कर्ज़ चुका देंगे।’

ये शब्द सुनकर बालगंधर्व के मन की आशाएँ भी फिर से पल्लवित हो उठीं। पर दुर्भाग्यवश केशवराव टाइफ़ाइड (विषमज्वर) से बीमार पड़ गए। और ४ अक्टूबर १९२१ को वे अचानक चल बसे। उस समय वे मुश्किल से इकतीस साल के रहे होंगे! उनका असमय निधन रंगमंच के लिए, रसिक दर्शकों के लिए और बालगंधर्व के लिए भी एक बहुत बड़ा आघात साबित हुआ। मानो यह कम था, इसलिए गणपतराव भी बीमार हो गए, इतने कि उन्होंने सेवानिवृत्ति ले ली। उनके कारण जो भी मदद मिल रही थी, उससे भी बालगंधर्व वंचित हो गए। ८ अप्रैल १९२२ को बखलेबुवा का भी देहांत हो गया। एक के बाद एक, ऐसे आधार-स्तंभ उनका साथ छोड़ते जा रहे थे। और कोढ़ में खाज की तरह, ख़ुद बालगंधर्व ही बीमार पड़ गए। अब क्या होगा ? इस चिंता ने सबको घेर लिया था। ऐसी परिस्थिति में सहारा था तो केवल खाडिलकर और लाड का।

मुंबई-प्रवास के दौरान खाडिलकर रोज़ कंपनी में आकर हालचाल पूछते थे। द्रौपदी नाटक के कारण नुक़सान हुआ है,  यह बात कानों में पड़ते ही खाडिलकर ने यह निश्चय कर लिया था कि जब तक बालगंधर्व का कर्ज़ न चुक जाए, तब तक वे द्रौपदी नाटक का पैसा नहीं लेंगे। १९२३ में जब बालगंधर्व बीमार पड़े, तब लाड ने उन्हें पूरे वेतन के साथ महीने भर की छुट्टी देकर आराम करने के लिए नासिक भेज दिया। इस दौरान काटदरे ने मितव्ययिता बरतते हुए कंपनी को व्यवस्थित ढंग से चलाया और विधिवत आय-व्यय का हिसाब रखा।

उम्र बढ़ने लगी, पर कर्ज़ चुक गया

इस दौर में बालगंधर्व अपनी कला के प्रति निष्ठा, ईमानदारी से कर्ज़ चुकाने की सच्चाई, और रसिक-जनों के प्रेम के बल पर दृढ़ता से खड़े रहे। दर्शकों से खचाखच भरा रंगमंदिर देखकर और दर्शकों को आनंद में मगन देखकर बालगंधर्व अपनी सारी चिंताएँ और व्यथाएँ भूल जाते थे। अब बढ़ती उम्र के साथ स्त्री-भूमिकाएँ करना उन्हे शोभा नहीं देगा, इसलिए धीरे-धीरे पुरुष-भूमिकाओं की ओर मुड़ना उचित होगा इस विचार से बालगंधर्व ने वीरतनय नाटक में शूरसेन की भूमिका निभाई। पर दर्शकों को वह ख़ास पसंद नहीं आई। दर्शक तो स्त्री-वेश में ही बालगंधर्व को देखना चाहते थे।

पर बालगंधर्व अब अड़तीस साल के हो चुके थे। उनकी आवाज़ में कुछ ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा था। लेकिन बाल झड़ने लगे थे, गंजापन आ गया था। उन्हें अब विग (टोप) लगाना पड़ता था। शरीर स्थूलता की ओर झुकने लगा था। निराशाजनक अनुभव, अपने निकट के एक-एक प्रियजनों की मृत्यु, कर्ज़ का बोझ और घोर परिश्रम के कारण उनकी चालढाल और नज़र की चंचलता खो गई थी। शृंगाररसप्रधान भूमिकाओं की दृष्टि से वे अब वयस्क होते जा रहे थे। क्योंकि उन दिनों यह माना जाता था कि चालीस पार करते ही मनुष्य बुढ़ापे की ओर झुकने लगता है। यहाँ तक कि वे स्वयं भी अब बार-बार, ‘मैं अब बूढ़ा हो गया,’ इस प्रकार के शब्द कहने लगे थे। फिर भी वर्षों-वर्ष जो भूमिकाएँ उन्होंने निभाई थीं, वे उनके रक्त में इस तरह रच-बस गई थीं कि जैसे ही बालगंधर्व सामने आते ही दर्शक उनकी आयु भूल जाते।

 बालगंधर्व की आयु बढ़ी फिर भी उनकी सौंदर्यदृष्टि में ज़रा भी अंतर नहीं आया था। वे अपने लिए कीमती ज़रीदार शालू स्वयं बुनवाते और बड़े-बड़े घरानों की बेटियाँ और बहुएँ चाहती कि उनके पास भी बालगंधर्व नाटकों में पहना करते वैसा ही शालू हो।  सोलापुर के दो महीनों के निवास में नाटक बहुत सफल हुए थे। अन्य खर्च घटाकर बाईस हजार का लाभ हुआ था। पर बालगंधर्व ने तुरंत ही बीस हजार के नए शालू खरीद भी डाले। इस पर क्या कहा जाए, यही दादा काटदरे को समझ नहीं आता था। बालगंधर्व अपने सिर पर चढ़े कर्ज़ को भूले नहीं थे। उसकी अदायगी चल ही रही थी। पर खर्चीले स्वभाव में भी कोई बदलाव नहीं आया था। हर गाँव-शहर के नाट्य-मंचनों में खचाखच भीड़ होती थी। लोग टिकट लेकर जगह न मिलने पर खड़े रहकर भी नाटक देखने को तैयार रहते।

लगातार बढ़ती लोकप्रियता के कारण  साढ़े छह वर्षों की अवधि में रिकॉर्ड आय हुई और कंपनी  मुनाफ़े की स्थिति में आ गई थी। १९२७ के दिसंबर के अंत तक पूरा कर्ज़ चुक गया। गंधर्व मंडली बालगंधर्व के हाथ में वापस आ गई। गिरवी रखी संपत्ति वापस ले ली गई। इस अवधि में बालगंधर्व ने साहूकारों को ब्याज सहित कुल मिलाकर तीन लाख नौ हजार रुपए दिए थे।… और यह केवल रसिक दर्शक माई-बाप के स्नेह और लोकप्रियता के बल पर ही संभव हुआ था। यह भी एक पुरुषार्थ ही था और वह भी हाथों में चूड़ियाँ पहनकर — यह विशेष बात! स्त्री का रूप धारण करके की गई कला की सेवा सफल हुई थी।

Scroll to Top