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तो राजहंस एक...

लेखिका - मंजूषा आमडेकर

 ८ . रुपहला परदा और दारुण पराभव

गणपतराव की वापसी

१९२८ का साल की शुरूआत थी। नए वर्ष के आरंभ से ही अच्छी-अच्छी शुभ घटनाएँ घटने लगी थीं। सन १९२२ में गणपतराव के जाने के बाद से तालीम-मास्टर के रूप में मंडली में कोई नहीं था। रिहर्सल के अभाव में पुराने सफल नाटकों की भी प्रस्तुति का स्तर गिरता जा रहा है, बालगंधर्व के मन में यह विचार आने लगा था। सब तालीम-मास्टर के रूप में एक ही व्यक्ति को योग्य मानते थे … और वह थे गणपतराव बोडस। गंधर्व मंडली छोड़कर जाते समय गणपतराव ने मंडली पर मुक़दमा दायर किया था, क्योंकि उनके उन्नीस सौ रुपए नहीं मिले थे। १८ अगस्त १९२७ को दोनों पक्षों में सम्माननीय समझौता हुआ और विवाद सुलझ गया। उन्हें अब गंधर्व मंडली में वापस बुलाने का निर्णय बालगंधर्व के मन में पक्का हो चुका था। इस दौरान  गणपतराव ललितकलादर्श और यशवंत — इन दो नाटक मंडलियों के लिए नाटकों की रिहर्सल करवा कर अभिनय करने लगे थे।

आख़िरकार चर्चा और बातचीत पूरी हुई और गणपतराव का फिर से गंधर्व मंडली में आना तय हुआ। लाडसाहेब ने मध्यस्थता की। गणपतराव को वर्ष भर के साढ़े पाँच हजार रुपए देने तय हुए। इतना भारी वेतन अब तक के नाट्य इतिहास में किसी को नहीं मिला था। १९२८ की शुरुआत में ही कर्ज़मुक्त हुई कंपनी, बालगंधर्व के अधिकार में आ गई थी। गणपतराव भी लौट आए। इससे चारों ओर चैतन्य का वातावरण फैल गया। बालगंधर्व ने तो खुलकर कहा कि, ‘गणपतराव के आने के कारण मुझ पर जो तालीम की ज़िम्मेदारी है वह कम हो जाए तो मैं पाँच वर्ष अधिक काम कर सकूँगा।’

इसी दौरान अखिल भारतीय कीर्ति के तबलावादक अहमदजान तिरखवा गंधर्व मंडली में आने को राज़ी हुए। शुरुआत में कई सदस्यों की इस पर नाराज़गी थी। खर्च यूँ ही क्यों बढ़ाया जाए? क्योंकि राजण्णा तो थे ही न। सबका यही मत था। पर बालगंधर्व अडिग थे। उन्होंने कहा, ‘तिरखवा आएँगे तब तुम देखते ही रह जाओगे!’

अपने वादे के अनुसार तिरखवा आए। उन्हें खाने-पीने सहित मासिक एक सौ पच्चीस रुपए वेतन देना तय हुआ। मुंबई के पहले ही नाट्य-मंचन में तिरखवा ने सबके दिल जीत लिए। शुरुआत में राजण्णा नाराज़ थे लेकिन उन्होने तिरखवाँ का शिष्यत्व स्वीकार किया। अब नाटकों में अच्छा-खासा रंग भरने लगा था। ऑर्गन पर केशवराव कांबळे, सारंगी पर कादरबक्ष और तबले पर तिरखवा — यह अपूर्व त्रिवेणी संगम दर्शकों को और कलाकारों को भी मोहित करने लगा। स्वयं दादा काटदरे कह उठे कि, ‘नारायणराव खर्च बढ़ाते हैं इसलिए मैं चिल्लाता तो हूँ, पर ऐसे लोग नितांत आवश्यक हैं।’

जगह की खरीद और बेटी का विवाह

बालगंधर्व का कर्ज़ चुकने के बाद से उनकी अपनी अचल संपत्ति हो और सेवा-निवृत्ति के बाद की उनकी उचित व्यवस्था हो, ऐसी धुन दादा को लग गई थी। स्वयं बालगंधर्व को अपने लिए ऐसी किसी ज़रूरत का  भान तक नहीं था। परंतु दादा के आग्रह पर उन्होंने पुणे की वेधशाला के सामने की ‘पेरू की बाग’ नामक जगह बारह हजार में खरीदी। उस जगह पर तीन भाइयों के तीन बंगले बनवाने की योजना थी। पर अब नया कर्ज़ नहीं लेना, पैसे इकट्ठा होंगे वैसे-वैसे धीरे-धीरे निर्माण-कार्य करेंगे, ऐसा स्वयं बालगंधर्व ने कहा।

काफ़ी समय से पुणे-मुंबई को छोड़कर दूसरे शहरों में नाटकों के मंचन नहीं हुए थे। छोटे-छोटे गाँवों में भी दर्शकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया प्राप्त होती है, ऐसा अनुभव तो हो ही चुका था। इसलिए अन्य जगहों पर नाटक करने का कार्यक्रम तय हुआ।

सन १९३० में बालगंधर्व की बेटी सरोजिनी का विवाह तय हुआ। डॉ. भास्करराव वाबळे के साथ उसका विवाह इतनी धूमधाम से हुआ कि लोग भी देखते ही रह गए। बालगंधर्व ने इस विवाह में ३० हजार रुपए खर्च किए।

करम की गति न्यारी

पर जब सब कुछ अच्छा चल रहा था, तभी दैव की गति कितनी न्यारी होती है, इसका फिर से अनुभव हुआ। बालगंधर्व की पहली तीन संतानें चल बसीं। आगे तीन बेटियाँ ही हुईं। उनमें से बड़ी कमला कान में घाव हुआ । उसके कान का ऑपरेशन सफल हुआ, पर उसे विषमज्वर (टाइफ़ाइड) हो गया और वह चल बसी। स्वयं बालगंधर्व भी गला बैठ जाने से बीमार पड़े थे। वे रोज़ ठंडे पानी से स्नान करते और लगातार बर्फ़ डला पानी पीते। बेटी की मृत्यु के बाद वे पुणे लौटे तो मृच्छकटिक नाटक का मंचन तय हुआ था। बालगंधर्व ने उस स्थिति में भी अभिनय किया। वे स्वयं को कला में झोंक देते और दुःख को भूल जाते। पर उनकी पत्नी एक के बाद एक संतान खोने की टीस कभी भुला न सकीं।

पुत्र-प्राप्ति के लिए वे लगातार व्रत-पूजा, उपवास, जप-तप करती रहतीं। उसमें सफलता मिली वे फिर से गर्भवती हुईं। सरोज की शादी के समय उनके प्रसव का समय निकट आ चुका था। बालगंधर्व के स्वयंवर और द्रौपदी —  दो नाटकों के मंचन तय हुए थे। उनमें से द्रौपदी नाटक रद्द करके दर्शकों के पैसे वापस दिए गए और बालगंधर्व स्वयं पत्नी के पास रुक गए। उन्हें एक सुंदर-सलोना पुत्र हुआ। चारों ओर आनंद ही आनंद छा गया। पर यह आनंद बहुत समय नहीं टिक सका। भोर का सूर्य उगने से पहले ही बालक परलोक सिधार गया।

रविवार को दोपहर को मंचन होने वाला था, इसलिए बालगंधर्व आँसू पोंछकर नाटक के लिए खड़े हुए। अब तक उन्होंने अनेक आघात झेलकर अपने रसिकों को दिया हुआ वचन निभाया था। इस बार भी उन्होंने अपनी भूमिका तन्मय होकर निभाई। उन पर इतना बड़ा आघात हुआ है, रंगमंच पर उनके विचरण से किसी को यह आभास तक नहीं हुआ।

फिर से कर्ज़ ने पीछा किया…

बढ़ती आयु के अनुसार शायद बालगंधर्व की आघात सहने की क्षमता भी कम हो गई । ऐसा सोचने की हद तक उन पर असर होने लगा था। भूमिका से एकरूप होना उन्हें भारी पड़ने लगा। संवाद याद न रहते। तालीम में प्रभाव न पड़ता। और तो और अब नए-नए कर्ज़ बढ़ने लगे थे। मूलधन का ब्याज भी बढ़ता जा रहा था। यह तनाव तो था ही। शादी के बाद उन्होंने अपने दामाद को आगे की पढ़ाई के लिए विदेश भेजा था। वह खर्च भी बढ़कर तीस हजार तक जा पहुँचा था।

कंपनी में लगभग सौ लोग थे। सबके वेतन थे। खाने-पीने का, यात्रा का, नाटकों का खर्च तो था ही। बालगंधर्व की सौंदर्य-उपासना की ज़िद के कारण रंगमंच का खर्च भी दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा था।

ऊँचे दर्जे के शालू-दुशाले तो थे ही। पर उनके साथ-साथ महँगे इत्र लेकर उन्हें इन कपड़ों पर लगाने की रीति बालगंधर्व ने डाली थी ताकि सबसे पिछली पंक्ति में बैठे दर्शक तक उस इत्र की सुगंध पहुँचे और दर्शक खुश हो जाए। दर्शकों पर चाँदी की गुलाबदानी से इत्र-गुलाब जल छिड़का जाता था। रात के भोजन के बाद पंचपदी गाने की किर्लोस्कर मंडली की रीति यहाँ भी जारी रखी गई थी। पर बालगंधर्व का गला बैठने लगने के कारण नाटक बंद होने लगे। इंदौर के निवास में तो सीधे महीने भर नाटक बंद रहे।

कान्होपात्रा

जल्द ही ‘कान्होपात्रा’ नामक नाटक की तालीमें शुरू हुईं। मास्टर कृष्णराव की बनाई हुई धुनें सबको इतनी पसंद आईं कि हर सोमवार शाम को घर पर ये भजन गाए जाने लगे। इन भजनों की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि घर पर हर सोमवार भजन सुनने के लिए लोग भीड़ करने लगे। इन भजनों के बहाने से ही सही, पर ढलती उम्र में उन्हे लोगों की सहानुभूति मिलेगी, ऐसा बालगंधर्व को लगा करता था। तो दादा काटदरे को अलग ही चिंता सताने लगी थी। यदि बालगंधर्व का गायन इस तरह मुफ़्त में सुनने को मिलने लगे तो लोग टिकट लेकर नाटक देखने क्यों आएँगे, ऐसी उन्हें आशंका सताने लगी।

बालगंधर्व द्वारा समय-समय पर लिखे कुछ पत्रों में परिस्थिति कैसे बिगड़ती जा रही है, आय कैसे घटती जा रही है, आवाज़ बैठने के कारण नाटकों पर बुरा असर हो रहा है, इस विषय में लिखा हुआ देखा जा सकता है। ऐसी परिस्थिति में नए सिरे से फिर कर्ज़-अदायगी कैसे होगी, यही सवाल था। एक ओर कर्ज़ और उम्र बढ़ रही थी तो दूसरी ओर आय घट रही थी। उसी दौरान मास्टर कृष्णराव पंजाब-सिंध प्रांत में दौरे पर गए हुए थे, तब उनकी लखमीचंद सेठजी से जान-पहचान हुई। उन्होंने बालगंधर्व के नाटक देखे और सेठ जी उनके भक्त ही बन गए। मुश्किल के समय जब ज़रूरत होती, बालगंधर्व जितने पैसे माँगते उतने वे देने लगे। मज़े की बात यह कि सेठजी ये पैसे प्रेम से देते। न वह कर्ज़ था, न उन्हें बालगंधर्व द्वारा लौटाए जाने की उम्मीद थी।

सन १९३१ के अक्टूबर महीने में ‘कान्होपात्रा’ नाटक मुंबई की रंगभूमि पर पहली बार प्रस्तुत हुआ। उसमें के ‘अवघाची संसार’, ‘पतित तू पावना’, ‘अगा पंढरीच्या राया’, ‘दीन पतित अन्यायी’ आदि अभंग ज़बरदस्त लोकप्रिय हुए। नाटक सफल हुआ फिर भी आय न बढ़ी, कर्ज़ न चुका। इसलिए खर्च में कटौती करने के लिए बोडस के साथ किया गया अनुबंध समाप्त किया गया। उसके बाद मंडली पहली बार गोवा में नाटक करने गई। वहाँ अभूतपूर्व प्रशंसा मिली। विनायकराव पटवर्धन कंपनी छोड़कर चले गए। विष्णु दिगंबर पलुस्कर के निधन के बाद उनके पुत्र भी कंपनी छोड़ गए। वे न जाएँ, इसके लिए बालगंधर्व ने बहुत प्रयत्न किए पर उन प्रयत्नों को सफलता नहीं मिली।

फिर से नया कर्ज़

अब दादा काटदरे की तबीयत बिगड़ी और वे भी कंपनी छोड़कर अपने बेटे के पास चले गए। वे आय-व्यय का हिसाब सही तरीके से लिखकर रखते थे। हिसाब के ईमानदार आईने में कर्ज़ का चेहरा अब भयानक और घृणित दिखने लगा था। बालगंधर्व का बेहिसाब खर्च देखकर अब आगे कर्ज़ नहीं चुकेगा, ऐसा उन्हें विश्वास हो गया था और वे निराश मन से ही चले गए थे।

अब तक कर्ज़ की राशि पचास हजार तक जा चुकी थी। १९३२ के जून महीने में बालगंधर्व की आयु के चवालीस वर्ष पूरे हुए थे। बार-बार खाँसी आती और आवाज़ बिगड़ती थी। चिल्लाने के कारण आवाज़ में भारीपन आ चुका था। उनके व्यक्तित्व की वह कोमलता जाती रही थी। उनकी स्त्री-भूमिकाओं की कोमलता कम हो गई थी। हीराबाई बडोदेकर और ज्योत्स्नाबाई भोळे ने स्त्री भूमिकाओं के लिए रंगमंच पर प्रवेश कर लिया था, इसलिए रसिकों का ध्यान उस ओर खिंचने लगा था।

इसी दौरान मनोरंजन के क्षेत्र की एक नई घटना के कारण एक बिलकुल अलग ही क्रांति शुरू होने लगी थी। प्रभात फिल्म कंपनी ने ‘अयोध्येचा राजा’ और ‘मायामच्छिंद्र’ इन दो फिल्मों से अपार लोकप्रियता प्राप्त करके रसिकों का मन रंगमंच से खींचकर रुपहले परदे की ओर मोड़ दिया था। अन्य सभी नाट्य-संस्थाओं की तरह बालगंधर्व की गंधर्व मंडली को भी इसकी आँच लगी ही। इसके अलावा नाटकों में आ गई एकरसता और पुराने कलाकारों का निरुत्साही तथा वृद्ध होते जाना — ये भी कारण थे ही। अब रंगमंच की लोकप्रियता में उतार आना शुरू हो गया। अब स्त्रियाँ भी नाटकों में अभिनय करने लगी थीं, इसलिए दर्शकों को पुरुषों को स्त्री के रूप में देखना अच्छा नहीं लगता था। समय के संकेत पहचानकर कुछ नाटक कंपनियों ने नाट्य-संस्था का विसर्जन कर दिया।

रात के नाट्य-प्रदर्शनों की लोकप्रियता घटने लगी थी। केवल दिन में होने वाले मंचन से अच्छी आमदनी होगी और कर्ज़ चुकाना संभव होगा, ऐसा नहीं लगता था। स्वयं बालगंधर्व भी उदास होते जा रहे थे। दिन-ब-दिन आमदनी घटती ही जा रही थी। अब अकेले बालगंधर्व के बल पर नाटक लोकप्रिय होना बंद हो गए थे। सावित्री और अमृतसिद्धी ये नए लाए गए नाटक भी कंपनी को नहीं बचा सके।

सिनेमा की रुपहली दुनिया में प्रवेश

ऐसे ही समय में, सोलापुर के निवास के दौरान, व्ही. शांताराम ने एकच प्याला यह नाटक देखा। 1913 में वे कुछ समय गंधर्व मंडली में रहे थे। पर वहाँ मन न रमने के कारण वे छोड़कर चले गए थे। आगे चलकर उन्होंने फिल्म व्यवसाय में अच्छी तरह पैर जमा लिए थे। पहले मूक फ़िल्में और फिर सवाक फिल्में बनाकर वे बहुत सफल हो गए थे। कोल्हापुर में उनके द्वारा स्थापित प्रभात कंपनी सिने-जगत में बहुत नाम कमा चुकी थी। बालगंधर्व द्वारा साकार की गई सिंधु की भूमिका को देखकर वे शब्दशः अवाक रह गए थे। उन्होंने ऐसा अनुमान व्यक्त किया कि, ‘यदि नारायणराव हमारी भागीदारी में तीन वर्षों में छह फिल्में करें तो उन्हें कम से कम छह लाख रुपए मिलेंगे!’

१९२८ में कलकत्ता की ‘मादन’ कंपनी ने अपनी मूक फिल्म में अभिनय करने के लिए बालगंधर्व को निमंत्रण दिया था। पर उन्होंने उसे ठुकरा दिया था। क्योंकि तब वे अपने कार्यकाल की ऊँचाई छू रहे थे। थे पर अब परिस्थिति अलग थी। अब वे लगातार परिश्रम से ऊब चुके थे। कर्ज़ की रकम सत्तर हज़ार तक पहुँच गई थी। ऐसी स्थिति में व्ही. शांताराम का प्रस्ताव उन्हें आकर्षक लगा। गंधर्व मंडली बंद करके प्रभात में भागीदारी करने का उन्होंने निर्णय लिया। पर आश्चर्य की बात यह कि उससे पहले लाडसाहब और खाडिलकर की सलाह लेनी चाहिए, ऐसी ज़रूरत तक उन्हें महसूस नहीं हुई। जिन्होंने बुरे दिनों में साथ दिया था उनके साथ विचार-विमर्श करना, उन्हें विश्वास में लेकर यह महत्त्वपूर्ण निर्णय बताना, यह बालगंधर्व ने नहीं सोचा पर यह ख़बर चारों ओर फैल ही गई।

लोग उलटी-सीधी चर्चाएँ करने लगे। क्या बालगंधर्व की पुरुष-भूमिका दर्शकों को पसंद आएगी, क्या रंगमंच के अभिनेता को फिल्मों की दुनिया रुचेगी और पचेगी? क्या उनके संवाद प्रभावशाली होंगे? क्या तीन मिनट का गाना लोगों को पसंद आएगा? पर मज़े की बात यह कि ये सारे विचार न बालगंधर्व ने किए थे और न शांताराम ने। उन दोनों ने बस एक-दूसरे के कर्तृत्व पर विश्वास रखा था। गंधर्व मंडली के कलाकार अपने-अपने रास्ते चले जाएँ और सारा महँगा-कीमती सामान गोदाम में रखवा दिया जाए, बस इतना ही विचार बालगंधर्व ने किया था। कला की पूरी तरह उपेक्षा करके केवल पैसे के लिए बालगंधर्व द्वारा किया गया वह पहला सौदा था, ऐसा कहने में कोई हर्ज नहीं।

व्ही. शांताराम ने यद्यपि छह फिल्मों की बातचीत की थी, फिर भी शुरुआती अनुबंध केवल दो ही फिल्मों का हो, ऐसा तय किया गया। बालगंधर्व ने वह मान लिया क्योंकि पहली दो फिल्मों के पारिश्रमिक में ही कर्ज़ चुक जाएगा और  पैसे भी बचेंगे। 18 मई 1934 को पुणे में इस अनुबंध की लिखा-पढ़ी की गई। इसी के अनुसार बालगंधर्व ने कोल्हापुर का निवास समाप्त करके 31 दिसंबर 1934 को गंधर्व मंडली का विसर्जन कर दिया। उनतीस वर्ष पहले जिस कोल्हापुर शहर में छत्रपति शाहूमहाराज ने नन्हे बालगंधर्व को रंगमंच पर भेजा था, उसी शहर में बालगंधर्व ने नाट्यकला से, इस व्यवसाय से विदा ली। सभी इतने भावुक हो गए थे कि किसी से कुछ बोला ही नहीं जा रहा था। ‘कर्ज़ चुकाने के लिए मजबूरन कंपनी बंद करके सिनेमा में जाना ज़रूरी है,’ बस इतना ही बालगंधर्व किसी तरह कह सके।

प्रभात नगर में प्रवेश

1 जनवरी 1935 से भागीदार के नाते बालगंधर्व प्रभात नगर जाने लगे। वे पुणे में डेक्कन जिमखाना इलाके में परिवार सहित रहते थे, माँ भाई के साथ शुक्रवार पेठ में, तो बेटी और दामाद नासिक में रहते थे। बालगंधर्व ढलती उम्र में स्त्री-भूमिकाओं में अच्छे नहीं लगेंगे, इसलिए उन्हें संत एकनाथ की भूमिका देना तय हुआ। नायिका थीं रत्नप्रभा, तो वासंती बाल-कलाकार के रूप में अभिनय करने वाली थी।

बालगंधर्व जब कोई बात मन में ठान लेते तो उसके पीछे लग जाते। दुबला होने के लिए उन्होंने भात (चावल) छोड़ दिया। रोज़ पाँच-सात मील चलने का व्यायाम करने लगे। स्टूडियो में लोग उनके साथ बहुत आदर से पेश आते। नई परिस्थिति के साथ ताल-मेल बिठाने का वे मन लगाकर प्रयत्न कर रहे थे। पर फिर भी उनका मन वहाँ नहीं रमा। कला के  जिस वातावरण में उन्होंने वर्षों-वर्ष अपरिमित आनंद भोगा था, वह उन्हें फिल्मों की दुनिया में कहीं नहीं मिला। दर्शकों से खचाखच भरे रंगमंदिर में कदम-कदम पर दाद पाने की, ‘वन्स मोर’ पाने के आदी बालगंधर्व को फिल्म के दृश्यों का टुकड़ा-टुकड़ा फिल्मांकन नहीं भाया। उनका मानो सुर ही नहीं सज रहा था। स्टूडियो की तेज़ रोशनी उनसे सही नहीं जाती थी। उस घुटन भरे वातावरण में उनका गला भी बार-बार बैठने लगा। आख़िर उनके मुँह से उद्गार निकल ही पड़े कि, ‘भगवान, इस धंधे में हमारे नाटक के धंधे जैसा आनंद नहीं है।’

पहली पराजय और फिर से गंधर्व मंडली

उधर गंधर्व मंडली के विसर्जित हो जाने से, आगे क्या करें यह न समझ पाने वाला कलाकार-वर्ग कुछ-न-कुछ तो होगा इस बात की प्रतीक्षा कर रहा था। तभी जब यह ध्यान में आया कि बालगंधर्व सिनेमा-जगत में नहीं रम रहे, तो गंधर्व मंडली को फिर से स्थापित करने का निश्चय किया गया। 4 अप्रैल 1935 को इस नए सिरे से स्थापित गंधर्व मंडली का उद्घाटन समारोह बड़ी धूमधाम से संपन्न हुआ। इस साहसी प्रयोग को दर्शकों की प्रशंसा मिली और अच्छी आमदनी भी होने लगी। 7 दिसंबर 1935 को बालगंधर्व अभिनीत फिल्म थिएटरों के परदे पर झलकी। लोग बड़ी उत्सुकता से बालगंधर्व को परदे पर देखने आए तो सही लेकिन सबको घोर निराशा ही हुई। उन्हें जिन बालगंधर्व की उम्मीद थी, वे उन्हें परदे पर मिले ही नहीं।

फिल्मों के बारे में बालगंधर्व को ख़ास जानकारी नहीं थी और व्ही. शांताराम को बालगंधर्व के कला-कौशल की पर्याप्त जानकारी नहीं थी। फिर भी एक-दूसरे पर विश्वास रखकर वे साथ चले थे। पर यह प्रयोग असफल ही रहा। व्ही. शांताराम के निर्देशन में काम करने वाले नौसिखिए अभिनेता प्रसिद्धि-शिखर तक पहुँचे। लेकिन बालगंधर्व कोई नवोदित अभिनेता तो थे नहीं। दर्शक उनके भीतर के कला-गुणों को जानते थे। इसलिए उन्हें परखने के पैमाने पहले से ही तैयार थे। और इसीलिए नए रूप में बालगंधर्व को दर्शकों ने स्वीकार नहीं किया। बढ़ती उम्र के कारण बालगंधर्व स्त्री-भूमिका में नहीं फबेंगे, व्ही. शांताराम का यह अनुमान सही ही था। पर पुरुष-भूमिका में उनकी संभावनाएँ और सीमाएँ शांताराम को मालूम ही नहीं थीं। हिंदीभाषियों को संत एकनाथ के बारे में जानकारी नहीं थी। अभंगों की धुनें भी पकड़ बनाने में सफल साबित नहीं हुईं। फिल्मांकन की प्रक्रिया के साथ एकरस न हो पाने के कारण बालगंधर्व निर्देशक जैसा कहते वैसा करते रहे। इसलिए भूमिका में कृत्रिमता आ गई। इस चित्रपट का एक भी गाना दर्शकों को याद नहीं रहा और गुनगुनाया नहीं गया — यही बहुत बड़ी असफलता थी।

बालगंधर्व के कला-जीवन की यह पहली दारुण पराजय थी, ऐसा कहा जा सकता है!

बालगंधर्व पहले से ही सिनेमा-जगत के वातावरण से ऊबे हुए थे। उस पर यह हार! इसलिए यदि प्रभात उन्हें अनुबंध से मुक्त कर दे तो वे तुरंत रंगमंच पर लौट सकेंगे, ऐसी आशा उनके मन में पैदा हुई। इस असफलता के कारण प्रभात कंपनी के मालिक भी इस भागीदारी को आगे चलाने के लिए उत्सुक नहीं थे। इसलिए उन्होंने बालगंधर्व का प्रस्ताव तत्काल मान लिया और बालगंधर्व को मुक्त कर दिया। वे भी खुशी से फिर रंगमंच की ओर मुड़ गए।

दूसरी दारुण पराजय

बालगंधर्व जब रंगमंच की ओर लौटे तब वे दुबले हो गए थे।  गायन की मेहनत कम हो जाने के कारण आवाज़ ठीक हो गई थी। साथ ही रंगमंच की तरह रातें जागनी न पड़ने के कारण वे तरोताज़ा दिख रहे थे। इसलिए अब उनकी स्त्री-भूमिकाएँ सरस लगने लगी थीं। लोग फिर उन्हें देखने भीड़ करने लगे थे। पर इस बीच उनके सहकलाकार कादरबक्ष का देहांत हो चुका था और तिरखवाँ ने रामपुर के नवाब के यहाँ नौकरी कर ली थी।

स्वयंवर, एकच प्याला और द्रौपदी ये नाटक आमदनी दे रहे थे। पर बाकी नाटक नहीं चल रहे थे। कर्ज़ चुकाना कठिन होता जा रहा था। ऐसी स्थिति में रुपहले परदे ने बालगंधर्व के सामने एक बार फिर कर्ज़ चुकाने का मृगतृष्णा का जाल बिछाया। सरस्वती सिनेमा के दादासाहेब तोरणे ने स्वयंवर नाटक का एक छोटा-सा प्रसंग चित्रित और ध्वनिमुद्रित किया था। उसमें बालगंधर्व हर तरह से आकर्षक लग रहे थे। किसी राजघराने की स्थूल स्त्री जैसा उनका रूप भी सबका ध्यान खींच रहा था। ‘स्वकुल तारकसुता’ इस नाट्यगीत की रिकॉर्डिंग बहुत बढ़िया हुई थी। बाबुराव रुईकर, जो कोल्हापुर के रॉयल सिनेमा के मालिक थे, ने वह चित्रण देखा और ध्वनिमुद्रण सुना। उन्हें ऐसा मोह हुआ कि यदि फिल्म में बालगंधर्व को स्त्री-भूमिका में ही दिखाया जाए तो दर्शकों को बहुत पसंद आएगा। इसलिए मुंबई निवास के दौरान ही अमृतसिद्धी नाटक का मंचन करके उसका फिल्मांकन करना तय हुआ। इसके बदले रुईकर बालगंधर्व को पच्चीस हज़ार रुपए देने वाले थे। नाटक के अन्य कलाकारों को भी एक महीने का अतिरिक्त वेतन देने वाले थे। यह योजना बालगंधर्व को पसंद आई क्योंकि उन्हें रंगमंच से सिने-संसार में जाकर वहाँ के रूखे वातावरण में टुकड़ा-टुकड़ा फिल्मीकरण करने की ज़रूरत नहीं पड़ने वाली थी।

बस, सिनेमा में हम स्त्री के रूप में अच्छे नहीं दिखेंगे, यही डर बालगंधर्व को सता रहा था। पर बाबुराव पेंटर ने उन्हें निश्चिंत रहने की सलाह दी। उनकी सौंदर्य-दृष्टि पर सभी को विश्वास था, इसलिए इस विचार ने ज़ोर पकड़ा। आख़िर 3 जून 1937 को बालगंधर्व और रुईकर ने अनुबंध पर हस्ताक्षर किए।

यह सब चल ही रहा था कि मुंबई के नाटकों की आमदनी घटने लगी थी। उस पर हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए और नाटकों की आमदनी पर बहुत बुरा असर हुआ। बालगंधर्व और रुईकर का संयुक्त प्रकल्प, ‘साध्वी मीराबाई’ यह फिल्म 18 सितंबर 1937 को परदे पर आई। नाट्य-मंचन को ही फिल्म में लेने की तकनीक को ‘स्टेज टॉकी’ कहते हैं। पश्चिमी देशों में यह तरीका लोकप्रिय हो चुका था, फिर भी उसकी तकनीक न तो बाबुराव पेंटर को मालूम थी और न ही उन्होंने उसे सीखने का कष्ट किया था। मुंबई की फ़िल्म सिटी में नाटक का परदा छोड़कर नाटक के दृश्य चित्रित किए जाएँ और उसी समय ध्वनिमुद्रण भी किया जाए, ऐसा तय हुआ था। उसी के अनुसार डेढ़ ही महीने में शूटिंग हो भी गई। पर इस तकनीक का उचित मूल्यांकन न होने के कारण यह प्रयोग कलाहीन और पूरी तरह असफल रहा।

व्ही. शांताराम और रुईकर के साथ किए गए  दोनों ही प्रयास बुरी तरह असफल रहे!

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