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ओ मानस के राजहंस …

लेखिका - मंजूषा आमडेकर

उपसंहार

राजहंस परिवार श्रद्धालु था। धर्म-कर्म में उनकी आस्था थी। फिर भी बालगंधर्व ने उसका सार्वजनिक प्रदर्शन कभी नहीं किया। सौंदर्यदृष्टि, स्वच्छता और सुघड़ता, गुरुजनों और माता-पिता पर श्रद्धा, कला के प्रति भक्ति, ईमानदारी, सरलता — ये उनके कुछ स्वभावगत विशेषताएँ थीं। बड़े संयुक्त परिवार का पालन-पोषण करते समय उन्होंने कभी अपने-पराए का भेदभाव नहीं किया। पत्नी बहुत सुंदर न होते हुए भी लगभग पचास वर्ष की उम्र तक उन्होंने कभी उसके साथ विश्वासघात नहीं किया। उनके इर्द-गिर्द सुंदर स्त्रियाँ विचरण करती रहतीं पर भी उन्होंने कभी किसी की ओर बुरी दृष्टि से देखा तक नहीं। पूरे करियर में अनेक आत्मीयजनों की मृत्यु देखनी पड़ी, फिर भी वे टूटे नहीं। तैंतीस वर्ष की उम्र में उन पर अचानक डेढ़-दो लाख के क़र्ज़ का बोझ आ पड़ा और वह भी विश्वासघात की टीस के साथ — फिर भी वे डगमगाए नहीं। उन्होंने स्वयं को दिवालिया घोषित नहीं किया। ईमानदारी से काम करके साढ़े छह वर्षों में उन्होंने वह  क़र्ज़ चुका भी दिया।

बालगंधर्व के बल पर ही नाटक चलते और आमदनी होती थी। फिर भी सारा पैसा बैंक में जमा कराया जाता था। घर के लोगों ने कंपनी के पैसे में से मनचाहा खर्च किया हो, ऐसा कभी नहीं हुआ। फिर भी पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी बालगंधर्व यथायोग्य ढंग से निभाते थे। वे स्वभाव से गंभीर थे। गोविंदराव टेंबे ने एक जगह कहा है कि, ‘मैं नारायणराव को संस्कारवान मनुष्य मानता हूँ। क्योंकि वे अपने बारे में कभी कुछ नहीं बोलते।’

बालगंधर्व को कपड़ों की व्यवस्थित तह लगाकर रखने का शौक़ था। वे अपनी सभी वस्तुओं की अच्छी देखभाल करते थे। वालावलकर ने एक बार कहा था कि, ‘नारायणराव कपड़ों की जितनी देखभाल करते हैं उतनी पैसे की करें तो उन्हें कभी क़र्ज़ ही न हो।’ लोगों को खिलाना-पिलाना, उनका आदर-सत्कार करना वग़ैरह मामलों में भी वे अत्यंत उदार थे।

पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने पान छोड़ दिया। लोकमान्य तिलक की मृत्यु के बाद चाय छोड़ दी। कभी-कभार वे मद्यपान कर लेते थे। पर एक बार ध्यान में आया कि रिकॉर्डिंग अच्छी नहीं हो रही। उनका स्वर फटा-सा लग रहा था। एक मद्यपान की बैठक में इसी बात पर मेज़बान ने कहा कि, ‘नारायणराव, मैं आपको प्रेम से बुलाता हूँ और आप आते भी हैं। पर मुझे लगता है कि आपको मद्यपान नहीं करना चाहिए।’

यह सुनते ही बालगंधर्व ने हाथ में लिया मद्य का प्याला जो नीचे रखा, सो हमेशा के लिए रख दिया। ऐसा उनका दृढ़निश्चयी स्वभाव था। शाकाहारी और मांसाहारी खाने का शौक़, हालाँकि,उन्हे हमेशा रहा। एक ज़माने में उन्हें कपड़ों का शौक़ था। उनके पास क़ीमती शालू (रेशमी साड़ियों) से लेकर विलायती कपड़ों तक बहुत कुछ रहता था। पर फिर १९२१ के बाद उनका यह शौक़ कम हो गया। वे हाफ़ पैंट और शर्ट पहनने लगे। उसके बाद खादी आंदोलन के प्रभाव से वे खादी की धोती-कुर्ते में विचरण करने लगे।

बालगंधर्व को लोगों की अचूक परख थी। पर लेनदेन के मामले में वे न जाने क्यों आँखें मूँद लेते थे। कोई भी नाटक अनेक लोगों के सहयोग से खड़ा होता है। आज की भाषा में जिसे टीमवर्क कहते हैं — इसका उन्हें भान था। वे सब सदस्यों को अपना परिवारजन ही मानते थे। पर पैसे के मामले में वे हमेशा उदासीन ही रहे। रंगभूमि को सजाना उनके लिए मानो लत जैसा ही था। सौंदर्य की उन्हें तीव्र लगन रहती थी। उसके पीछे जितना भी पैसा ख़र्च करना पड़े, उसमें वे आगा-पीछा नहीं देखते थे। पर आमदनी से ख़र्च का पलड़ा भारी होता जा रहा है, इसकी उन्हें कभी सुध तक नहीं रहती थी। कलाकार के रूप में वे असामान्य थे, इसमें कोई संदेह ही नहीं। पर अपने खर्चीले, अव्यावहारिक स्वभाव के कारण उन्हें क़र्ज़दार होकर आख़िरकार रंगभूमि को रामराम कहना पड़ा।

 उन्होंने एक से बढ़कर एक व्यक्ति और कलाकार इकट्ठा किए थे। उनमें गुणग्राहकता थी। इसीलिए उनके पास आया हर कलाकार और निखरता जाता था। कुछ कलाकार कितने ही अच्छे क्यों न हों, वे जनसामान्य तक नहीं पहुँचे होते । पर एक बार कोई कलाकार बालगंधर्व की छत्रछाया में आ जाता तो पूरे महाराष्ट्र भर में उसका नाम हो जाता। बालगंधर्व के बारे में कभी-कभी ईर्ष्यावश अफ़वाहें भी फैलाई जाती थीं। पर वे सर्वथा निराधार थीं। वे अपने सहकलाकारों का ध्यान रखते थे। एक पड़ाव में उनकी अपनी आवाज़ बैठ जाने पर भी उन्होंने सहकलाकार की पट्टी में अपने स्वर को ढाल लिया। उन्होंने कहा कि, ‘मेरे कारण नानासाहेब का काम बिगड़ना नहीं चाहिए। अपना मैं बाद में देख लूँगा।’

बालगंधर्व पर जो क़र्ज़ चढ़े, वे व्यक्तिगत फ़िज़ूलख़र्ची के कारण बिल्कुल नहीं थे। रंगभूमि को उत्तम बनाने के लिए वे जितना भी ख़र्च करना पड़े, करते थे। वहाँ इस्तेमाल किए जाने वाले इत्र को वे निजी जीवन में एक बार भी इस्तेमाल नहीं करते थे। आगे चलकर बाल झड़ आने पर उन्होंने विदेश से बढ़िया विग मँगवाए ज़रूर; पर केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि बोडस और रानडे के लिए भी मँगवाए थे। उनकी खास शिक्षा-दीक्षा  न हुई थी लेकिन उन जैसे एक असामान्य कलाकार ने तैंतीस वर्ष की उम्र में सामने आए विशाल क़र्ज़ को ईमानदारी से अपने दम पर चुकाया — यह उनका बड़प्पन ही माना जाना चाहिए। संगत के वाद्यों में उन्होंने हार्मोनियम की जगह ऑर्गन को स्थान दिलाया। शास्त्रीय संगीत को नाटक में स्थान देकर उन्होंने केवल अपने अकेले के बल पर उसे घर-घर तक पहुँचाया। उनका यह कर्तृत्व असामान्य ही माना जाना चाहिए।

उन्हें जो लोकप्रियता मिली, वह केवल गायक के रूप में नहीं, बल्कि गायक अभिनेता के रूप में मिली थी। उन्होंने रंगभूमि को देवता के समान दर्जा दिया था। वे साधारण रिहर्सल की जगह पर भी कभी टोपी पहने बिना नहीं आए। उन्होंने भूमिका के लिए ईमानदारी से अविरत परिश्रम किया। कोई भी भूमिका हो, वे उससे एकरूप हो जाते थे। नाटक के असली दिन तो वे व्रतस्थ ही रहते थे। खाडिलकर के बताए अनुसार, दोपहर में नींद न आए तो भी वे दो घंटे केवल आँखें मूँदकर लेटे रहते थे। दोपहर चार बजे हजामत करते थे। फिर स्नान के बाद मेकअप के लिए बैठते थे। उन्हें आमतौर पर दो से ढाई घंटे स्त्री-भूमिका के (साज-शृंगार) के लिए लगते थे। विग पहनने के बाद से तो वह उनके सिर पर इतना कसकर बँधा होता था कि उतारने पर माथे पर निशान उभरे हुए दिखते थे। फिर मेकअप कक्ष से वे अपने लिए ख़ास तैयार किए गए कमरे में जाते थे। वहाँ नाटक के हर प्रवेश के लिए तैयार रखे गए वस्त्रालंकार होते थे। मंचन समाप्त होने तक वे किसी से ज़्यादा बात नहीं करते थे। रात के नाटक के बाद बेसन-भात या खिचड़ी खाने की कंपनी में रिवाज था। पर बालगंधर्व नाटक के समय लिए हुए रस या दूध से ही काम चला लेते थे। धोंडी जामदार उन्हें स्त्रीवेश में सजाता था। अपनी वेषभूषा संतोषजनक हुए बिना वे रंगभूमि पर पाँव तक नहीं रखते थे। इसी कारण कई बार नाटक शुरू होने में देर भी हो जाती थी। किसी धर्मार्थ नाट्य-मंचन के बाद किए जाने वाले आभार-प्रदर्शन के कार्यक्रम में वे कभी भाग नहीं लेते थे। बाक़ी कलाकारों को बीच-बीच में विश्राम मिल जाता था। पर बालगंधर्व को कभी नहीं। क्योंकि एक तो वे मुख्य कलाकार थे इसलिए उनके हिस्से आने वाले संवाद और पदों की संख्या ज़्यादा होती थी और उन्हें इतनी बार ‘वंस मोर’ मिलता था कि वे सचमुच थक जाते थे।

बालगंधर्व रंगमंच को सामने से देखने वाले दर्शकों के लिए एक शानदार दावत जैसे हुआ करते थे। वे कभी छिछोरे नहीं दिखे। वे अत्यंत कुलीन, सुंदर स्त्री दिखते थे। दर्शकों को ऐसा लगता था मानो वे अपने सपनों की राजकुमारी को देख रहे हों। पर आश्चर्य की बात यह कि, एक बार मेकअप उतर जाए और वे भूमिका से बाहर निकलकर नारायणराव बन जाएँ, तो उनके चाल-ढाल, बोलचाल या हाव-भाव में कभी ज़नानापन नहीं दिखता था। इसके अलावा रूप के साथ-साथ उनका गायन भी दर्शकों के दिल की गहराई को छू लेता था। दरअसल पहले उनका स्वर तेजस्वी और पल्लेदार (दूर तक पहुँचने वाला) नहीं था। निरोग भी नहीं था। इसीलिए उन पर बहुत-से उपचार करने पड़े थे। लंघन जैसा उपवास, औषधियों के गरारे, भाप लेना, औषधियों से इलाज करने के बाद और उत्तम रियाज़ करवाने के बाद उनका स्वर सुधरा और नाटकों का तनाव झेल पाने जितना सक्षम हो गया था। केवल सक्षम ही नहीं, बल्कि खास हो गया था। नाद-माधुर्य, दानेदार तानें, ठहराव और जैसा चाहें वैसा स्वर मोड़ने की शक्ति — ये उनके गायन की ख़ास विशेषताएँ बन गई थीं। लंबी-लंबी पल्लेदार तानें वे बड़ी सहजता से लेते थे। आगे भी भूमिका की ज़रूरत के अनुसार उन्होंने क़व्वाली, ग़ज़ल, ठुमरी जैसे गायन-प्रकार भी आत्मसात कर लिए थे। सुस्वरों का पटल तैयार करके नाट्यगृह के वातावरण को अभिभूत कर देने का जादू उन्हें सिद्ध था। असंख्य रागों पर आधारित पद गाते समय उनका स्वर सभी सप्तकों में घूमता था। आगे चलकर तिरखवा और कादरबख़्श की संगत से तो उनके गायन पर और भी रंग चढ़ने लगा था।

गोविंदराव टेंबे कहते थे कि, ‘नारायणराव एक राग से दूसरे राग में चले भी जाएँ, तब भी राग बदल गया ऐसा न लगता, कोई नया राग ही तैयार हो गया हो क्या, ऐसा लगता था।’

पर बालगंधर्व गाते समय यह भी अचूक भान रखते थे कि रसहानि न हो। प्रसंग जैसा हो उसी के अनुसार उनका गाना आकार लेता था। शृंगार रस वाला पद गाते समय उनका स्वर मोहक हो जाता, तो करुण रस वाला पद वे गाने लगते तो दर्शकों के हृदय द्रवित हो उठते थे। गाते समय चेहरा टेढ़ा-मेढ़ा करना, बेवजह हाथ नचाना, साथ काम करने वाले पात्रों या रस से संबंध तोड़कर गाना, महफ़िल में चल जाने वाली तानें-हरकतें लेना — ऐसी बातें बालगंधर्व ने कभी नहीं कीं। कौन-सा पद लंबा खींचना है और कौन-सा नहीं, इस बारे में भी प्रसंग के अनुसार कुछ नियम थे। उन संकेतों का बालगंधर्व आग्रहपूर्वक पालन करते थे।

कहा जाता है कि बालगंधर्व ने कोई शिष्य तैयार नहीं किया। पर वे स्वयं रंगमंच के साथ इतने एकरूप हो गए थे कि उन्हें इसके लिए समय ही नहीं मिला। और यह स्वाभाविक ही है। कितने ही अन्य कलाकारों के साथ भी ऐसा हुआ हुआ हमें दिखाई देता ही है। पर मज़े की बात यह है कि वे स्वयं भी किसी एक विशिष्ट गुरु के शिष्य थे, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। वे स्वयंभू, स्वतंत्र प्रज्ञा वाले प्रतिभाशाली गायक थे। इसीलिए तो वे ‘गंधर्व’ थे। वे जन्म लेते समय अपने साथ अनन्यसाधारण कलागुण लेकर ही आए थे। यदि किसी पद या किसी प्रसंग की शोभा बढ़ने वाली हो, तो वे बिना किसी हिचक के उसमें निषिद्ध (राग के बाहर का) स्वर तक लगा देते थे। पर वह कभी भी खटकता नहीं था। उनकी लयकारी तो असामान्य थी। इस प्रकार बालगंधर्व ने अपने उत्तम गायन से सामान्य दर्शक और श्रोता के मन में शास्त्रीय और अभिजात संगीत की रुचि उत्पन्न की। इसका संपूर्ण श्रेय उन्हीं को जाता है।

केवल साड़ी पहन लेने से कोई पुरुष स्त्री जैसा नहीं दिख सकता। कितनी ही बाधाएँ होती हैं, उन्हें पार करना पड़ता है। पुरुष स्त्रीवेश धारण कर भी लें, तब भी उनके अंग स्त्री जैसे नहीं दिखते। दाढ़ी-मूँछ की स्वाभाविक वृद्धि उस लावण्य को आने नहीं देती। पुरुषों में एक विशिष्ट आयु में आवाज़ फूटती है, उसकी मिठास नष्ट हो जाती है। आयु बढ़ने पर शरीर भारी हो जाता है, पेट निकल आता है, गंजापन आ जाता है… ऐसी कितनी ही बाधाएँ होती हैं। पर बालगंधर्व ने इन सारी बाधाओं को पार करते हुए सत्रह वर्ष की आयु से लेकर पैंतीस वर्ष तक स्त्री-भूमिकाएँ समर्थता से निभाईं। इतनी कि “हमारे मन की सुंदरी अर्थात् बालगंधर्व” — यह समीकरण दर्शकों के मन में जड़ पकड़ चुका था।

इसके अतिरिक्त उन्हें प्रकृति-प्रदत्त सौंदर्य का वरदान भी मिला हुआ था। उनके हाथ कोहनी से लेकर हथेलियों तक इतने सुघड़ थे कि उनमें कहीं भी कठोर पुरुषपन दिखाई नहीं देता था। उनके दाँत इतने सुंदर थे कि नकली प्रतीत हों। और स्त्री-भूमिका करते समय वे इतनी सावधानी रखते कि उनका रूप-धारण उत्तम रीति से निभ जाता। स्त्रीवेश को वे इतनी सुंदरता से धारण करते कि समाज की स्त्रियाँ उनका अनुकरण करने लगी थीं। उनके जैसी साड़ी पहनना, गहने, जूड़ा और गजरा लगाना प्रतिष्ठा का लक्षण माना जाने लगा था। उनके स्त्री-रूप का दर्शकों पर ऐसा कुछ मोहनमंत्र छा गया था कि लोगों की यह धारणा बन बैठी थी कि स्त्री हो तो ऐसी ही होनी चाहिए। रंगमंच पर आने के बाद वे क्या बोलते हैं, कैसे बोलते हैं, कैसा व्यवहार करते हैं, कैसे विचरते हैं, साड़ी कैसे सँभालते हैं, क्या हावभाव करते हैं — इस सब पर दर्शकों की उत्कंठापूर्ण दृष्टि टिकी रहती थी।

जब कोई पुरुष भिन्न-भिन्न पुरुष पात्रों की भूमिकाएँ करता है, तब वह अपने चेहरे पर लंबी या सफ़ेद दाढ़ी-मूँछ लगाना, भाँति-भाँति की पगड़ियाँ, टोपियाँ आदि पहनना, या अलग-अलग पोशाक धारण करना — इस प्रकार के परिवर्तन कर सकता है। पर बालगंधर्व को तो सदा स्त्री ही दिखना होता था। फिर भी रुक्मिणी की भूमिका करते समय वे द्वारकाधीश की पत्नी जान पड़ते और सिंधु को साकार करते समय एक गरीब स्त्री प्रतीत होते।

कुछ लोगों ने बालगंधर्व पर यह आक्षेप लगाया था कि वे बार-बार वही राग गाते हैं, अनवट (दुर्लभ) राग नहीं छेड़ते। पर वास्तव में भूमिका और प्रसंग के अनुरूप ही राग की रचना करना उस पद की आवश्यकता हुआ करती थी। केवल गायन की विविधता दिखाना उनका हेतु नहीं था। वे भूमिका में समरस होकर डूब जाना चाहते थे। रस की हानि न हो, इसकी सावधानी रखनी होती थी। इसीलिए उन्होंने वही राग चुने होते थे जो ठीक सटीक बैठें।

बालगंधर्व को पढ़ने-लिखने का शौक नहीं था। किसी को पत्र लिखना और हस्ताक्षर करना — बस इतने तक ही उनका लेखन सीमित था। यह करना भी एक समारोह जैसा हुआ करता था। वे पहले सिर पर ज़री की टोपी रखते। फिर एकाग्र होकर पत्र लिखते।

जिन्हें पत्र लिखते, उनके घर के छोटे-बड़ों को यथायोग्य नमस्कार और आशीर्वाद वे आग्रहपूर्वक लिखते। उन्हें पढ़ने का शौक पैदा हो, इसके लिए गडकरी ने बहुत प्रयत्न किया, पर उन्हें सफलता नहीं मिली।

पर कुल मिलाकर बालगंधर्व ने एक नए युग का प्रारम्भ इसमें संदेह ही नहीं। गोविंदराव टेंबे लिखते हैं कि, ‘बालगंधर्व के कारण समूचे अभिनेता-वर्ग के प्रति समाज में जो अनादर भावना थी, वह लुप्त होती जा रही है।’

दादासाहेब खापर्डे कहा करते थे कि, ‘बालगंधर्व के आचरण के कारण अभिनेता-वर्ग के विषय में समाज में जो गलतफ़हमी थी, वह दूर हो गई।’

गानमहर्षि अल्लादिया खाँ कहा करते थे कि, ‘यदि मुझे कभी गाना सुनने की इच्छा हो, तो मैं बालगंधर्व के नाटक में चला जाता हूँ।’

ज़माना बदला और  स्त्रियाँ भी नाटकों में अभिनय करने लगीं। पर फिर भी उनमें से किसी के कारण भी रसिक दर्शक बालगंधर्व को भुला नहीं सके। ढलती आयु में भी वे स्त्रियों के सद्गुणों का मोहक दर्शन करा सकते थे।

बालगंधर्व पर बार-बार चढ़ने वाले कर्ज़ उनके कार्यकाल पर लगी एक प्रकार की कालिख ही थे। पर उसे उन्होंने ईमानदारी से पोंछ डाला और अपनी छवि को उज्ज्वल किया। पर इस कर्ज़-निवारण की प्रक्रिया में जिन-जिन कलाकारों, हितचिंतकों, सलाहकारों और प्रबंधकों ने उनका साथ दिया, उस योगदान को किसी भी प्रकार नकारा नहीं जा सकता।

इसी प्रकार गौहरबाई उनके जीवन को लगा एक दुर्दैवी ग्रहण थी, ऐसा ही मानना पड़ेगा। बालगंधर्व उसमें क्यों उलझे और उनके उत्तर-जीवन की ऐसी दुर्दशा क्यों हुई — इसे न्यारी भाग्य-गति ही कहना पड़ेगा। पर उस ग्रहण से कभी मुक्ति नहीं मिली।

फिर भी — यही सच है कि ऐसा बालगंधर्व दोबारा नहीं होगा!

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