ओ मानस के राजहंस …
लेखिका - मंजूषा आमडेकर
१. शुक्र तारे का उदय…
किर्लोस्कर नाटक मंडली का भाग्योदय
यह कहानी है, लगभग एक सौ बीस वर्ष पुरानी…पर उस चमत्कार का जादू आज भी लोगों को मोह लेता है…आज भी उसका मोहिनी-मंत्र रसिकों श्रोताओं के मन से उतरा नहीं है…
मराठी नाट्य रंगभूमि के, नाट्यकला के इतिहास के आकाश में एक शुक्र तारा उगा था, चाँदनी फैलाने के लिए…जन्म से पुरुष, पर कर्म से रंगमंच पर अत्यंत सुंदर, अविस्मरणीय स्त्रीपात्र के रूप में सदी से भी अधिक समय तक नाट्य-विश्व के आकाश में जगमगाते, अक्षुण्ण रूप से चमकते तारे के रूप में विचरण करते उस असाधारण गायक अभिनेता की यह जीवनगाथा है।
उस असाधारण गायक अभिनेता का असली नाम था नारायण श्रीपाद राजहंस। आगे चलकर वे बालगंधर्व नाम से संसार में प्रसिद्ध हुए। पर यह जन्मजात कलाकार मानसरोवर के राजहंस की भाँति ही सदा सम्मान के साथ विचरण करता रहा है। जीते जी भी और देहावसान के बाद भी।…. मानो चिरंजीव होकर रह गया हो।
सन् १९०६ के आसपास किर्लोस्कर नाटक मंडली के ‘शाकुंतल’ नाटक का मिरज में मंचन किया जाना था। उसे देखने अपार भीड़ उमड़ पड़ी थी। १३ फरवरी १९०१ को, शकुंतला की भूमिका करनेवाले शानदार अभिनेता भाऊराव कोल्हटकर के निधन से किर्लोस्कर नाटक मंडली की मानो सारी रौनक ही चली गई थी। उस पृष्ठभूमि पर आज की भीड़ देखकर व्यवस्थापक शंकरराव मुजुमदार खुशी से झूम उठे थे क्योंकि आज शकुंतला की भूमिका एक नया अभिनेता करने जा रहा था। मिरज के आसपास के सभी गाँवों से लोग उत्सुकता से एकत्र हुए थे। कोल्हापुर से स्वयं छत्रपती शाहू महाराज भी आए हुए थे क्योंकि रंगमंच पर आने से पहले ही नई शकुंतला के रूप और मधुर आवाज़ की ख्याति चारों ओर फैल चुकी थी।
गोविंदराव देवल, नानासाहेब जोगळेकर, चिंतोबा गुरव, गणपतराव बोडस आदि सभी लोग नई शकुंतला को सजाने में और उसका पहली बार रंगमंच पर आगमन होने के कारण, उसे धीरज देने में जुटे हुए थे। स्वयं लोकमान्य तिलक का भी उसे आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। इसी कारण दर्शकों में उत्सुकता, अधीरता, उत्कंठा चरम पर पहुँच गई थी। और…और कुछ ही क्षणों में नई शकुंतला ने अपनी सखियों के साथ रंगमंच पर पदार्पण किया…लोगों ने उसे सीधे अपनी आँखों में बसा लिया कि उसके बाद उसने कभी पीछे मुड़कर देखा ही नहीं!
मुनिकन्या के अनुकूल सादी वेशभूषा और साज-शृंगार से सजी उस शकुंतला ने ‘वृक्ष और लता, दोनों की जोड़ी सोहती है’ (वृक्ष वेल या दोहींची जोडी शोभते), ‘हे सखी अनसूया, अरी बाई’ (सखये अनसूये या बाई गं बाई) आदि पद गाते हुए जो मोहन-मंत्र डाला, उससे दर्शकों को उससे प्रथम दृष्टि में ही प्रेम हो गया। कटसरैया की झाड़ी में उलझी साड़ी को कोमलता से छुड़ाते हुए, दृष्टि के साथ कटाक्ष फेंकते हुए जब वह गजगामिनी की भाँति सखियों के पीछे-पीछे चल पड़ी, तब दुष्यंत तो दूर, हर एक दर्शक के कलेजे की धड़कन मानो रुक सी गई।
भाऊराव कोल्हटकर का देहांत हुआ था तब शंकरराव मुजुमदार ने कहा था कि, ‘हमने अपना सौभाग्य खो दिया है!’ पर इस मंचन के बाद वह सौभाग्य लक्ष्मी के चरणों से चल कर फिर एक बार चलकर किर्लोस्कर नाटक मंडली के पास आ गया था। मानो किर्लोस्कर कंपनी का भाग्योदय हो गया था। लक्ष्मी के चरणों से चलकर आई इस शकुंतला की भूमिका करनेवाले अभिनेता का नाम था, नारायण श्रीपाद राजहंस अर्थात् बालगंधर्व !
संगीत नाटकों का नवयुग
विष्णुदास भावे ने सन् १८४३ में ‘सीतास्वयंवर’ नाटक का पहली बार रंगभूमि पर मंचन किया। उनके नाटकों की एक विशिष्ट शैली थी। वही आगे चल कर अन्य नाटककारों ने अपनाई। देव-दानवों के बीच का कोई एक प्रसंग चुनकर उसका विस्तार किया जाता था, मनोरंजन केवल विदूषक करता था और गायन की ज़िम्मेदारी केवल सूत्रधार पर होती थी। लोगों को यह सब अच्छा तो लगता था, फिर भी वह नाटक का एक बेढब प्रकार ही था। शीघ्र ही अंग्रेज़ी स्कूलों में पढ़े-लिखे लोगों को वह सब नकली सा लगने लगा। कुछ नए प्रयोग हुए पर वे गद्य होने के कारण लोगों को भावपूर्ण नहीं लगे। लोगों की बदलती रुचि को पहचानकर, उनकी सही नब्ज़ पकड़कर अण्णासाहेब किर्लोस्कर ने ३१ अक्टूबर १८८० को गद्य-पद्य मिलाकर ‘शाकुंतल’ नाटक का रंगमंच पर मंचन किया और संगीत नाटकों का नवयुग आरंभ हुआ।
उस ज़माने में स्त्रियों का नाटक में काम करना तो छोड़िए, वे नाटक देखने भी नहीं जाती थीं। इसी कारण स्त्रीपात्र निभाने की ज़िम्मेदारी पुरुष अभिनेताओं पर ही आ पड़ी। पहली बार शकुंतला की भूमिका शंकरराव मुजुमदार ने निभाई थी। पर वे गायक नहीं थे। इसलिए शुरुआत में शकुंतला सजाई तो गई पर सँवरी नहीं। स्वयं अण्णासाहेब सूत्रधार और शारंगरव की भूमिका करते। नाट्य-मंचन में उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी थी। संगीत नाटकों के वे आद्य प्रवर्तक माने गए। उन्होंने नाट्यकला को सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाई। एक ही रात में उन्होंने पुरानी नाट्यशैली को इतिहास के हवाले कर दिया।
सुप्रसिद्ध लेखक ना.सी.फडके ने कहा था कि, ‘अण्णा ने महाराष्ट्र के रसिकों को नए कान और नई आँखें दीं… रंगभूमि पर एक नवयुग आरंभ किया…!’
इसके बाद सन् १८८२ में भाऊराव कोल्हटकर — जो खूबसूरत तो थे साथ ही सुरीले गायक भी थे — ने किर्लोस्कर नाटक मंडली में प्रवेश किया। उनके द्वारा शकुंतला की भूमिका निभाने पर शकुंतला गाने भी लगी। फिर तो अंत तक उन्होंने रंगभूमि को जैसे गुंजाया होगा, कल्पना ही की जा सकती है। उनका गाना सुनकर लोग मंत्रमुग्ध हो जाते। इसके बाद अण्णासाहेब ने ‘सौभद्र’ नाटक का रंगभूमि पर मंचन किया। उस नाटक ने तो लोकप्रियता की पराकाष्ठा छू ली। मोरोबा वाघोलीकर, बाळकोबा नाटेकर, स्वयं अण्णासाहेब, शंकरराव मुजुमदार और भाऊराव कोल्हटकर ने नाटक ‘सौभद्र’ को ख़ूब चमकाया।
अण्णासाहेब ने मानो रंगभूमि छोड़ दी
फिर सन् १८८४ में अण्णासाहेब ने इसी मंडली के साथ भास्करराव बखले को लेकर ‘रामराज्यवियोग’ का मंचन किया। परंतु इसके बाद अण्णासाहेब का स्वास्थ्य गिरता गया और उनका २ नवंबर १८८५ को निधन हो गया। यह व्यक्ति द्रष्टा था, प्रयोगशील था, सशक्त अभिनेता था, पर साथ ही रसिक और उदार भी था। उनके नाटकों के मंचन दूसरों ने किए तो भी वे उस पर कोई आपत्ति नहीं उठाते थे। मेहनताना नहीं माँगते थे। वे कहा करते थे कि, ‘मैंने केसर का खेत लगाया है, अब उसमें गधे क्यों न चरें…!’ उनके जाने के बाद किर्लोस्कर नाटक मंडली का कोई भी नाटक रंगभूमि पर आता तो सबसे पहले अण्णासाहेब के चित्र की पूजा की जाने लगी। चित्र को प्रणाम करके ही पहला अभिनेता रंगभूमि पर प्रवेश करता था।
उनके जाने के बाद भी नाटक कंपनी की आय होती ही रही। अण्णासाहेब के पश्चात नाटककार और नाट्यनिर्देशक की भूमिका उनके शिष्य गोविंद बल्लाळ देवल ने निभाई। इसके बाद ‘विक्रमोर्वशीय’, ‘शापसंभ्रम’ और ‘मृच्छकटिक’ ये नाटक रंगभूमि पर आए। ‘वीरतनय’ नाटक के बाद से भाऊराव ने स्त्री-भूमिकाएँ निभाना बंद ही कर दिया। तीस पार करने के बाद उन्हें लगने लगा था कि ऐसी भूमिकाएँ अब उन्हें शोभा नहीं देंगी। उन्हीं के समय में गणपतराव बोडस का नाटक मंडली में प्रवेश हुआ।
भाऊराव भी चले गए
आगे चलकर ‘शारदा’ नाटक अपने पूरे यौवन में था, तभी भाऊराव इस संसार को छोड़कर चले गए। तब हर किसी को ऐसा शोक हुआ मानो उसके अपने परिवार का ही कोई आत्मीय सदस्य चल बसा हो क्योंकि इस कंपनी का वातावरण ही ऐसा था। कंपनी के मालिक से लेकर छोटे-मोटे काम करनेवाले हर व्यक्ति को यह नाटक मंडली अपना ही परिवार लगती थी। अण्णासाहेब के चित्र को प्रणाम किए बिना कोई भी काम शुरू नहीं होता था। भोजन की व्यवस्था तो सदा उत्तम रहती ही थी; पर गणपति उत्सव के दस दिन रोज़ पकवानों के भोजन का ठाठ रहता था। गायिका गौहरजान, गायक अल्लादिया खाँसाहेब और कौलप्रसाद जैसे तबलजी — ऐसे दिग्गज आते-जाते रहते थे। लगभग पचास-साठ लोगों का बड़ा-सा परिवार एक दिल होकर रहता था। नाटक के मंचन के निमित्त यह मंडली जहाँ-जहाँ जाती, वहाँ के और आसपास के गाँव के प्रतिष्ठित लोग सबसे पहले उनसे मिलने आते। यों साधारण बातों में किसी पर कोई बंधन न होते हुए भी रंगभूमि की पवित्रता बनाए रखने के नियम का पालन हर कोई करता था। जिस दिन मंचीय प्रयोग होता, उस दिन कोई मद्य की एक बूँद को भी स्पर्श नहीं करता था। संक्षेप में कहें तो, यह कला का क्षेत्र है, इसलिए कोई मनमानी नहीं करता था। जो तत्त्व, आदर्श और नीति-नियम तय किए गए थे, उनका कठोरता से पालन किया जाता था।
यह नाटक मंडली भले ही अण्णासाहेब ने स्थापित की थी, फिर भी उन्होंने स्वयं को कभी मालिक नहीं माना। इसी कारण उनके जाने के बाद कंपनी ने उनके परिवारजनों को पेंशन देने की पेशकश की और मोरोबा वाघोलीकर, भाऊराव कोल्हटकर तथा रामभाऊ किंजवडेकर कंपनी के मालिक बने। आगे चलकर मोरोबा निवृत्त हुए तो उन्हें भी पेंशन दी गई। इसके बाद भाऊराव की बीमारी और निधन के कारण अकेले रामभाऊ मालिक रह गए। फिर नानासाहेब जोगळेकर का कंपनी में प्रवेश हुआ। सन् १८९३ से शंकरराव मुजुमदार कंपनी के व्यवस्थापक के रूप में काम देखने लगे।
अण्णासाहेब की मृत्यु के बाद कंपनी भले ही बिखरी न हो, लेकिन दर्शकों को अण्णासाहेब की कमी खलती थी। फिर भी शुरुआत का कुछ समय नाटक चलते रहे, आय होती रही। पर बाद में भाऊराव के चले जाने के बाद कई अच्छे-अच्छे अभिनेता आए पर पहले जैसा रंग न जमा। दर्शक दूसरी नाटक मंडलियों के नाटकों पर भीड़ करने लगे थे। मूकनायक, सौभद्र, शकुंतला, गुणमंजुषा, चंद्रहास, सुमति जैसे नाटकों के मंचन के बावजूद भी किर्लोस्कर मंडली टिक न सकी। उसी बीच कृष्णराव गोरे भी कंपनी छोड़कर स्वदेश हितचिंतक मंडली में प्रवेश कर गए।
इस सारी पृष्ठभूमि में सन् १९०६ में गायक-अभिनेता बालगंधर्व ने किर्लोस्कर नाटक मंडली के माध्यम से रंगभूमि पर जो प्रवेश (एंट्री) किया, उससे कंपनी का और मराठी नाट्य इतिहास का कायापलट हो गया। एक निर्णायक मोड़ और नई आभा प्राप्त हुई।