ओ मानस के राजहंस …
लेखिका - मंजूषा आमडेकर
१०. भाग्य ने दिया, कर्म ने छीना
रेड क्रॉस फंड
परन्तु फिर भी सबके मन में यही अविश्वास बना रहा कि बालगंधर्व गौहर के वश में जाकर फिर से अव्यवस्थित कारोबार शुरू कर देंगे और समझौते की बातचीत असफल हो गई। पर मज़े की बात यह कि, इस सारे कोलाहल में किसी ने सोचा भी न होगा, ऐसा घटनाक्रम घटित हुआ।
बालगंधर्व के लिए रंगमंच के दरवाज़े बंद हो गए हैं, ऐसी स्थिति बन गई थी, तभी ‘रेड क्रॉस फंड’ नामक कंपनी ने बालगंधर्व की मदद के रूप में नाटक करने का निश्चय किया। यह योजना वास्तव में अमल में भी लाई गई। पर ‘गंधर्व मंडली’ यह नाम इस्तेमाल करना संभव न होने के कारण ‘गंधर्व नट-संच’ इस नाम से नाटक प्रस्तुत करने का तय किया गया। किसी ने स्वप्न में भी न सोचा होगा, ऐसी अभूतपूर्व सफलता इस नाट्य-मंचन को मिली। मुख्य शर्त यह थी कि हर मंचन की बिदागी (पारिश्रमिक) अग्रिम मिले बिना बालगंधर्व रंगमंच पर क़दम नहीं रखेंगे। कारोबार की सारी बागडोर तो स्वाभाविक रूप से गौहरबाई के हाथों में थी ही। पाई-पाई वसूल करने का दम-ख़म उसमें था ही। पूरे वर्ष भर में हुए दो सौ नाट्य-मंचन में मिलाकर बालगंधर्व ने छप्पन वर्ष की उम्र में एक लाख रुपए कमाए—यह कमाल ही था। बालगंधर्व, गौहर और उसकी पहली बेटी आशाम्मा के रोज़मर्रा के जीवन के मामूली ख़र्च को छोड़कर बाक़ी पैसों का क्या हुआ, यह एक पहेली ही है। इन पैसों में से पचीस हज़ार रुपए ख़र्च करके गौहर ने बीजापुर में अपने एक क़रीबी रिश्तेदार के नाम पर एक घर ख़रीदा था। उसने बेईमानी करके वह घर बीच में ही किसी दूसरे, मुस्लिम आदमी को बेच दिया। पर सौदा पूरा होने से पहले ही वह रिश्तेदार पाकिस्तान चला गया। इसलिए वह घर सरकार ने ज़ब्त कर लिया।
उस ज़ब्ती को हटवाकर घर अपने अधिकार में लेने के लिए भरसक प्रयत्न किए गए। किसी ने सुझाया कि बालगंधर्व यदि गौहर से विवाह कर लें तो सरकार शायद सहानुभूतिपूर्वक विचार करे। इसीलिए फिर बालगंधर्व ने २७ अप्रैल १९५१ को गोहर से पंजीकरण-पद्धति से विवाह किया। पर उसका कोई फ़ायदा नहीं हुआ। बस इतना कहा जा सकता है कि केवल काकासाहेब गाडगीळ की मध्यस्थता के कारण बालगंधर्व उस घर में अंत तक रह सके। संक्षेप में, बालगंधर्व की जो भी यह धारणा थी कि गौहर ने उन्हें आर्थिक संकट से बाहर निकालने के लिए अपार त्याग किया है, वह एक कपोल-कल्पित कथा ही रह गई।
बालगंधर्व अपने अतीत के बारे में बात करते हुए एक बार बोले थे कि, ‘मैं बाळासाहेब का ग्रामोफ़ोन बन गया था…’ उसी तरह अब वे गौहर के ग्रामोफ़ोन बनकर बैठे थे। लोगों से बात करते हुए वे बड़े भाव से कहते थे कि, ‘देवा (हे प्रभु), ज़हर खाने की नौबत आ गई थी…उसने मेरे लिए क्या किया है, यह आपको पता नहीं…!’ पर उसने वास्तव में क्या किया, इस बारे में वे कुछ भी नहीं बोलते थे। निरंतर असत्य का प्रचार चलता ही रहा। गौहर ने अपने परिश्रम से कमाए हुए हज़ारों रुपयों की वर्षा करके उनका क़र्ज़ चुकाया—यह उस प्रचार का मुख्य मुद्दा हुआ करता था।
बड़ौदा के सरदार माधवराव नारायणराव मुनशी ने बालगंधर्व पर धोखाधड़ी का मुक़दमा ठोका था, उसके लिए भी गौहर ही ज़िम्मेदार थी। बड़ौदा के एक प्रवास में गौहर ने उनसे दस-बारह हज़ार रुपए प्राप्त कर लिए थे। उस बारे में गौहर ने कुछ ऐसे शब्द कह दिए कि वे आहत हो गए और उन्होंने बालगंधर्व पर धोखाधड़ी का मुक़दमा दायर कर दिया। यह एक और बड़ी मानहानि बालगंधर्व के पल्ले बाँधने का पुण्यकार्य गौहर ने किया। बालगंधर्व को बड़ौदा पुलिस के हवाले करने की कार्रवाई होने वाली थी। पर वास्तव में वैसा कुछ हुआ नहीं। नाटक के लिए किसी तरह का कोई अनुबंध नहीं होता था। किराए पर सामान लेकर जैसा बन पड़े वैसा मंचन कर लेते — कभी सुधाकर के दीवानखाने में रुक्मिणी बैठी होती तो कभी रुक्मिणी के महल में सिंधु अनाज पीसती-कूटती बैठी होती; ऐसा ही सब चलता रहता था। गौहर ने तो बालगंधर्व का फायदा उठा कर ज़्यादा से ज़्यादा पैसे ऐंठ लेने की पक्की ठान ली थी। इसलिए गौहर ने उन पर ज़ोर डाला कि वे उसके साथ फिल्म में अभिनय करें। पर फिल्म में गौहर को लेने के लिए कोई तैयार नहीं था और बालगंधर्व तो पूरी तरह परास्त हो चुके थे। इसलिए वहाँ गौहर की दाल नहीं गली।
जबरन सेवानिवृत्ति
फिर उसने बालगंधर्व के ही कमाए हुए पैसों में से बाईस हज़ार रुपये खर्च करके नाटकों के लिए कुछ सामान तैयार करवा लिया। पर कुछ समय बाद बालगंधर्व के पैरों में कोई दोष उत्पन्न हो गया और वे चल-फिर न सकने की हालत में आ गए। १९५२ के अंत तक बड़ौदा में यह रोग और भी कष्टदायक होने लगा। सुप्रसिद्ध डॉक्टर श्रीपाद कीर्तने द्वारा किए गए इलाज से बालगंधर्व ठीक हो गए। पर डॉक्टर ने स्पष्ट कहा था कि यदि कम से कम छह महीने पूरा आराम न किया गया तो रोग फिर सिर उठाएगा। परहेज़ का पालन न करने के कारण जल्द ही उनका वह पैर तो दुखने लगा साथ ही दूसरा पैर भी कमज़ोर हो जाने से उनका खड़ा रहना भी असंभव हो गया। आख़िरकार सन १९५५ में उन्हें रंगमंच से जबरन सेवानिवृत्ति लेनी पड़ी।
पर इससे क्या होता? उनके लिए सेवानिवृत्ति के बाद का शांत जीवन जी पाना संभव हुआ? नहीं! घर चलाने के लिए उन्हें पैसे कमाना ज़रूरी था। अतः वे भजन के कार्यक्रम करते ही रहे। उनकी विकलांग अवस्था देखते हुए महाराष्ट्र शासन ने उन्हें प्रति माह ३०० रुपए अनुदान या मदद के रूप में देना शुरू किया। उनके अमृत महोत्सव तक बढ़ते-बढ़ते यह रकम साढ़े सात सौ तक पहुँच गई थी। इसी दौरान ३० जून १९५० में उनकी माँ का देहांत हुआ। सन 1951 में गौहर के साथ रजिस्टर विवाह करके उन्होंने उसे पत्नी का दर्ज़ा भी दे दिया था। इसलिए वह सिर उठाए, ठाट से, उनकी पत्नी के रूप में रहने लगी थी।
गौहर ने यह नया प्रचार शुरू किया कि सन १९५२ से बालगंधर्व पूरी तरह लाचार होकर बिस्तर से लगे रहे थे। उस दौरान गौहर ने उनकी पूरी सेवा की — उन्हें नहलाना, मल-मूत्र साफ़ करना, खाना-पीना देना वगैरह। पर उसी ने आचार्य अत्रे से यह सवाल पूछा था कि, ‘मैं यह भंगी का काम कब तक करूँ?’
अत्रे ने भी एक जगह लिख रखा है कि, ‘गोहरबाई थी इसलिए ही बालगंधर्व ज़िंदा रहे!’
झूठ की पराकाष्ठा
पर इन सब बातों में कुछ भी तथ्य न होने का पता चलता है। गौहर जो कुछ कह रही थी वह सचमुच झूठ की पराकाष्ठा कहलाने योग्य ही था। १९३८ में जब गौहर ने बालगंधर्व के जीवन में पहला क़दम रखा, तब से लेकर १९५२ में जब उनके पैर लाचार हुए, उस पूरे कालखंड में, खाँसी को छोड़ दें तो, बालगंधर्व को कोई बीमारी नहीं थी। इस दौरान बालगंधर्व पैसे कमाते रहते और गौहर उन पैसों पर कब्ज़ा कर लेती थी। उन्हें बस से जाने भर के किराए के पैसे भी नहीं देती थी। वे दादर से गिरगाँव पैदल चलकर जाते थे। शहर से बाहर भजन के कार्यक्रम के लिए गौहर उन्हें रेल का तीसरे दर्जे का टिकट कटवाकर देती थी। जब तक एक ही पैर कमज़ोर था तब तक वे जैसे-तैसे पैर घसीटते, किसी न किसी का सहारा लेते हुए भूमिका निभाते थे। पर दोनों पैर कमज़ोर हो जाने पर वह काम भी बंद हो गया। फिर भी सन १९६४ तक वे बोल सकते थे और देख सकते थे। उसके बाद ही वे प्राकृतिक क्रिया (शौच) के लिए स्वयं अपने आप जा न सकने की हालत में आ गए। गौहर ने मुश्किल से आठ-दस महीने उनकी मदद की होगी। पर उसके बाद वह स्वयं ही बीमार पड़ गई। गौहर पर शल्यक्रियाएँ करनी पड़ीं। पर उसने बालगंधर्व के लिए कोई वेतनभोगी सहायक नहीं रखा। दरअसल बालगंधर्व के ही कमाए हज़ारों रुपए उसके हाथ में थे। पर गौहर ने उनकी परवाह नहीं की। रघुनाथ मोरे तबलची का बेटा रमेश ही बालगंधर्व की सेवा किया करता था।
इस सारे अनर्थ के लिए स्वयं बालगंधर्व ही ज़िम्मेदार थे। नियति ने उन्हें सँभलने के बार-बार अवसर दिए थे। भरपूर पैसा, नाम-यश सब कुछ दिया था। पर भाग्य का दिया हुआ वे बनाए न रख सके। वे अपने ही हाथों अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारते रहे। बालगंधर्व गौहर के वश में हो गए और अपने सारे पैसे एक भी सवाल पूछे बिना उसके हवाले करते रहे। अब पराधीन होकर जीना ही उनका प्रारब्ध बन बैठा था। ऐसा नहीं कि कोई विकल्प नहीं था। उनका दामाद उन्हें ले जाने के लिए राज़ी था। यदि उन्होंने गौहरबाई को छोड़ दिया होता तो उन्हें मिलने वाले पैसे जीवन-यापन के लिए पर्याप्त थे। पर उन्होंने हर बात को नकार दिया। दयनीय रूप से जीते रहे। एक समय रोज़ सौ लोगों को सुस्वादु भोजन कराने वाले बालगंधर्व बाद के बुरे दौर में, जब तक पैदल चल सकते थे, किसी न किसी भोजनालय के सामने लगी ग्राहकों की कतार में सामान्य आदमी की तरह दो कौर के लिए ताकते-तरसते खड़े रहते। तब उन्हें उस हाल में देखने वाले का दिल भर आता था। पर बालगंधर्व ने अंत तक गौहर के साथ ही रहने का निर्णय ले रखा था। फिर जो भी परिस्थिति सामने आए उसे भोगने के अलावा कोई चारा न था।
उन पर प्रेम करने वाले कितने ही लोग उनकी स्थायी रूप से देखभाल करने के लिए राज़ी थे। पर सबकी राय में उनके लिए गौहर को छोड़ना ज़रूरी था, जिसके लिए बालगंधर्व बिल्कुल तैयार नहीं थे। बालगंधर्व का यह मन ही मन गोहर में ज़रूरत से ज़्यादा उलझना — इसी बात को गौहर अपनी पूँजी बना रही थी। जैसे बिल्ली चूहे से खेलती है, वैसे वह सरासर उनके जीवन से, पैसों से, स्वास्थ्य से, भावनाओं से, प्रतिष्ठा से खेल रही थी। वे कभी-कभी रिश्तेदारों या मित्रों से मिलने जाते तो ख़ुश रहते। पर गौहर का पत्र या संदेश आते ही तुरंत उदास हो जाते। मानों भयभीत हो जाते। गौहरबाई आसपास होती तो वे उससे डरे-सहमे, बौखलाए-से व्यवहार करते। ऐसा क्यों होता था, यह एक पहेली ही थी।
दरअसल अभी भी समय नहीं गया था। जब तक बालगंधर्व चल सकते थे, तब तक उन्हें महीने में कम से कम चार नाटकों में काम तो मिल ही जाता। भजन के कार्यक्रम तो मिल ही रहे थे। लोग सेवा करने को तैयार थे। बापूराव ओळकर जैसा व्यवस्थापक ख़ुशी-ख़ुशी ज़िम्मेदारी लेने को तैयार था। दामाद या अन्य हितचिंतक उन्हें अपने पास रखने को तैयार थे। उनका बुढ़ापा आनंद से, स्वाभिमान से, संगीत-कला का आनंद लेते हुए बिताना उनके लिए सहज संभव था। पर वह स्वयं उन्होंने ही इस अवसर को ठुकरा दिया — इस दुर्भाग्य को क्या कहें?
पैसा कमाने की मशीन
उनकी मदद करने को तैयार किसी को भी स्वीकारने के लिए गौहर राज़ी नहीं थी और गौहर को छोड़ने के लिए बालगंधर्व की तैयार नहीं थे! अब जो होने वाला था वह अटल था। गौहर की दृष्टि से वे सिर्फ़ एक पैसा कमाने वाली मशीन थे।
बालगंधर्व को आराम की आवश्यकता थी। पर गौहर को पैसे चाहिए थे, इसलिए उसने उन्हें काम में जोत रखा। बालगंधर्व देर तक काम करते। रात को ढाई-तीन बजे सोते। तड़के फिर जल्दी उठकर धूल फाँकते हुए बस से दूसरे गाँव-शहर जाते। गाने के कार्यक्रम करते। उनके हाथ में पर्याप्त पैसा नहीं होता था। कष्ट-यातना, मेहनत और पराधीनता की कोई सीमा ही नहीं थी। पर उन्होंने यह सब स्वेच्छा से स्वीकार कर लिया था। एक बार एक कार्यक्रम से पहले उन्हें इंजेक्शन लेना पड़ा था, तब वे गा सके थे। फिर क्या था, उसी इंजेक्शन का प्रयोग बार-बार उन पर किया जाने लगा। पर इंजेक्शन का बालगंधर्व पर क्या बुरा परिणाम हो रहा है, इसका गौहर ने विचार भी नहीं किया था। जैसे चरखी में गन्ना डालकर अंतिम बूँद तक रस निकाल लिया जाता है, वैसे ही बाई उन्हें निचोड़ रही थी। उसकी एक ही धुन थी…पैसा! और वह बालगंधर्व के मन में निरंतर यह बात बिठाती रहती थी कि गौहर है इसीलिए ही वे ज़िंदा हैं। और उन पर तीन जीवों की ज़िम्मेदारी होने के कारण उन्हें अंत तक काम करना ही होगा।
एक बार बालगंधर्व स्वयंवर नाटक में नाट्यगीत ‘मम आत्मा गमला’ गा रहे थे, तभी उन्हें खाँसी का दौरा पड़ा (मूल: ‘मम आत्मा गमला’ — मेरी आत्मा मुग्ध हो गई)। खाँसी का वह दौरा इतना तीव्र था कि आख़िर बालगंधर्व को पर्दे के पीछे जाना पड़ा। प्रेक्षागृह में इतना सन्नाटा था कि सुई गिरे तो सुनाई दे। पर थोड़ी ही देर में बालगंधर्व फिर रंगमंच पर आए और गाने लगे। वहाँ तालियों की ज़बरदस्त गड़गड़ाहट हुई। पर तब कम से कम वे चल-फिर तो सकते थे।
पराधीनता की पराकाष्ठा
पर आगे चलकर जब दोनों पैर बेकार हो गए तब यह सब भी समाप्त हो गया। अंतिम समय में माहीम के मछली बाज़ार के पास ‘आशिया मंझिल’ के दुमंज़िले घर में बालगंधर्व दूसरी मंज़िल के कमरे में अकेले पड़े रहते थे। उनके पलंग पर एक लकड़ी का तख़्ता (फट्टा) था। प्राकृतिक क्रिया की ज़रूरत महसूस होती तो पलंग का एक तख़्ता खींच लेते और उस पर से नीचे मल-मूत्र विसर्जित करते। कभी-कभी उसे साफ़ कर दिया जाता। पर तब तक उस गंदगी में वे वैसे ही बैठे रहते। दो-दो महीने स्नान नहीं होता था। पहले जो तीन-तीन बार स्नान करते थे, वही बालगंधर्व अब ऐसी भयानक अवस्था में नरक में रहने जैसे रह रहे थे। बदबू तो रहती ही थी, पर बालगंधर्व लगातार अपना शरीर खुजलाते बैठे रहते थे। खाने का समय होता तो उन्हें जर्मन की थाली में एक ही बार कुछ परोस दिया जाता। कोई एक सब्ज़ी, भाकरी और प्याज़ के तीन-चार टुकड़े। वे अकेले ही खाते। पूछने या और परोसने कोई भी पास नहीं फटकता था।
पर्याप्त पैसे मिलते रहने पर भी गौहर की यही इच्छा रहती थी कि बालगंधर्व का खर्च दूसरे ही उठाएँ। डॉ कीर्तने ने बालगंधर्व को चार हाफ़पैंट, चार शर्ट, चार जाँघिए, एक गमछा और एक जोड़ी चप्पल दी थी। जब पैर बेकार हो गए तब उस हालत में भी वे एक जगह घंटे-दो घंटे बैठ सकते थे और गा सकते थे। गोहर को यह भी सुनहरा अवसर ही लगा। इसलिए उसने सन १९५५ से ६४ के दौरान उनसे भजन के कार्यक्रम करवाए । पर जब वह भी न हो सका तब गौहर ने उन्हें सबके सामने लाचारी से पेश आना सिखाया। एक-एक के आगे अपनी बदहाली का वर्णन करके मदद माँगने पर मजबूर किया। बालगंधर्व से कोई धनी व्यक्ति मिलने आने वाला होता तो बालगंधर्व को फटा कुर्ता पहनाकर बैठाना पड़ता। हर ओर दयनीयता का प्रदर्शन हो, इसकी सावधानी बरती जाती। लोगों के सामने ‘मदद करो,’ कहकर थाली घुमाई जाती।
एक समय ऐसा भी आया कि बाई बालगंधर्व के नाम पर गाने के कार्यक्रम रखती और सुरों के बादशाह बालगंधर्व ख़ुद अपने ही पीछे तानपूरे पर बैठते। वे लोगों को दयनीय दिखते रहें, इसकी सावधानी बरती जाती। मदद के लिए थाली घुमाई जाती।
एक बार बालगंधर्व ने बाकरे से कहा कि, ‘अब मैं बेसुरा होने लगा हूँ। सुर सही निकलते नहीं और मन को बहुत तकलीफ होती है। अब जीना अच्छा नहीं लगता है। पर अगर न गाऊँ तो खाऊँ क्या?’
उधर गौहरबाई की तबीयत भी बिगड़ती ही चली जा रही थी। आख़िरकार अचानक २० नवंबर १९६४ को गौहर की मृत्यु हो गई। उसके बाद बालगंधर्व की हालत और भी गिरती चली गई। जिनके पद सुनकर समूचे महाराष्ट्र को कंठस्थ हो गए थे, उन बालगंधर्व को अपने ही गाए पद याद नहीं आते थे। सन १९६५ के बाद बालगंधर्व को दृष्टिदोष, पक्षाघात, स्मृतिभ्रंश जैसे रोगों ने भी घेर लिया था। उनके जीवन में मज़े करके गौहर चली गई थी। जब उन्हें सेवा की सच्ची ज़रूरत थी तब वह तो उनके साथ थी ही नहीं, पर उसकी बेटी को उनके सिर मढ़कर ज़रूर चली गई थी। गौहर की बेटी बालगंधर्व की कोई सेवा नहीं करती थी। पर फिर भी बालगंधर्व रिश्तेदारों के पास न जाकर आशाबी के साथ ही रहे।
पर समाज में अब भी बालगंधर्व के प्रति प्रेम, आदर और सम्मान था। इसलिए सरकारी कारकून (क्लर्क) उनके घर जाकर कागज़ात की पूर्ति करके उन्हें सरकारी अनुदान देता था। मुंबई के ट्रिनिटी क्लब के संचालक गोपालराव मेहेंदळे बालगंधर्व के बहुत बड़े चाहने वाले थे। वे ख़ुद जाकर देखते थे कि बालगंधर्व को क्या चाहिए-नहीं चाहिए। सन 1955 में बालगंधर्व की मदद के लिए एक ट्रस्ट स्थापित किया जाए और उन्हें प्रति माह निश्चित रकम मिलती रहे, ऐसी व्यवस्था की जाए — यह बालगंधर्व केचाहने वालों ने तय किया था। उसी के अनुसार कार्रवाई शुरू भी हो गई थी। पर बालगंधर्व के बाद वह पैसा गौहरबाई को भी मिलता रहे, ऐसी व्यवस्था की जाए — यह ज़िद गोहरबाई ने पकड़ ली। पर न्यासियों (ट्रस्टियों) को यह बात मंज़ूर न होने के कारण वह सारा प्रस्ताव रद्द हो गया।
‘समझ तो आता है पर अमल में नहीं आता’ ऐसी अवस्था में पड़े बालगंधर्व को अपनी इस दुर्दशा का आभास बहुत पहले ही हो गया था, यह उनके ही एक पत्र से पता चलता है। २१ मार्च १९४१ को, यानी गौहर के उनके जीवन में आने के थोड़े ही समय बाद, उन्होंने अपनी बेटी सौ सरोजिनी को एक पत्र में लिखा था कि, ‘चि. पद्या को बुखार आ रहा था, यह सुनकर मन को कितना दुख हुआ यह लिखते नहीं बनता। मेरे जीवन के तिरेपन वर्ष व्यर्थ गए, यह तो सिद्ध ही हो गया। जीवन का अंत अच्छा होना चाहिए, पर वह भी अब नसीब में नहीं दिखता। मेरे जीवन में विलक्षण उलझनें हो गई हैं और अच्छे ढंग से इसका अंत होगा, ऐसा नहीं लगता। मैं इस परिस्थिति में आ पहुँचा, इसका बहुत बुरा लगता है। पर मैंने जो कुछ किया वह गंधर्व कंपनी के लिए किया। तुम मेरी अपनी हो इसलिए बता रहा हूँ, बस इतना ही!’
राजहंस होते हुए भी वे अंत तक नीर-क्षीर विवेक को अपना न सके,दूध का दूध पानी का पानी न कर सके, यह एक रहस्य ही है।
अमृतमहोत्सव
सन १९५५ में बालगंधर्व को अभिनय के राष्ट्रपति पदक से नवाज़ा गया था। २ फरवरी १९६४ के दिन बालगंधर्व के अमृतमहोत्सव का उद्घाटन हुआ। स.का. पाटील, वसंतराव नाईक, दयानंद बांदोडकर, यशवंतराव चव्हाण, विजयालक्ष्मी पंडित की उपस्थिति में अत्यंत धूमधाम से यह समारोह संपन्न हुआ। ८ फरवरी को इस समारोह का समापन हुआ।
पर उसके बाद गिरते हालात को स्वयं बालगंधर्व भी झेल न सके। ‘नाना की तबीयत बिगड़ गई है। वे बोल भी नहीं पाते,’ ऐसा पत्र मिलते ही पद्या और दुर्गाराम तुरंत माहिम गए। यह बात सन 1966 की है।
…उसी साल की बात है। उसके बाद सन 19676 में बालगंधर्व की चेतना ही जाती रही। बालगंधर्व के हितचिंतक, नातेदार, डॉक्टर दौड़े चले आए। हज़ारों हाथों से मदद की धारा बहने लगी। ऑक्सिजन और ग्लूकोज़ शुरू कर दिए गए। केवल दो ही दिनों में पूरी मुंबई भर में खबर फैल गई। दर्शन के लिए प्रशंसकों की कतार लग गई थी। डॉ. बावळे ने रोज़ का ब्योरा रखना शुरू किया। काग़ज़ धड़ाधड़ भरने लगे। दुर्गाराम और पद्या ११ अप्रैल १९६७ को माहीम पहुँचे। बालगंधर्व दो-तीन दिनों से बेहोश पड़े थे। वे अंत तक होश में आए ही नहीं।
अब निकट के नातेदारों के अलावा कोई भी उनके लिए कुछ नहीं कर सकता था। इसीलिए, हालाँकि आचार्य अत्रे ने बाधा डालने की कोशिश की, फिर भी बालगंधर्व को १ मई ’६७ को पुणे ले जाया गया। पुणे में उन्हें डॉ. माईणकर के यहाँ रखा गया। वहाँ भी बालगंधर्व के दर्शन के लिए लोगों की कतारें लगने लगीं। जीवन भर कष्ट उठाकर, आघात सहकर बालगंधर्व अब इतने थक चुके थे कि मानो उन्हें उस नींद से जागने की इच्छा ही न रह गई हो। पर उस अवस्था में भी उनका चेहरा पहले की ही तरह तेजस्वी दिख रहा था। उनकी ओर देखकर लोगों को गडकरी की कविता की ये पंक्तियाँ याद आ रही थीं –
(जरी दूत यमाचे आले, लाडक्यास या न्यायाला।
ते निष्ठुर असले तरीही, भुलतील पाहुनी याला।।)
(अर्थात् — यद्यपि यमराज के दूत इस लाड़ले को ले जाने आ पहुँचे हैं, निष्ठुर होते हुए भी वे इसे देखते ही मुग्ध हो जाएँगे।)
समय धीमी गति से और आगे सरक गया। जून में उन्हें पुणे के जहाँगीर अस्पताल में स्थानांतरित किया गया। वहीं उन्होंने १५ जुलाई १९६७ को दोपहर तीन बजे के आसपास अंतिम साँस ली। जिस पुणे में उनका जन्म हुआ था, जहाँ लोकमान्य तिलक ने उन्हें ‘बालगंधर्व’ की उपाधि दी थी, जहाँ किर्लोस्कर मंडली के तीनों नाटकों के पहले प्रयोग हुए थे, जहाँ गंधर्व मंडली की स्थापना हुई थी, उसी पुणे में बालगंधर्व ने अंतिम साँस ली।
थके-हारे राजहंस के पंख उड़ते-उड़ते दुखने लगे थे। पंखों में अब बल नहीं रहा था। उड़ने की लालसा भी शेष नहीं रही थी। उस राजहंस ने आख़िरकार पंख समेटकर, चोंच भीतर छिपाकर, अनंत में विलीन हो जाने का निश्चय कर लिया था। अब कम से कम वह राजहंस चिरनिद्रा तो अवश्य पाने वाला था।
उनका अंतिम संस्कार उनके जीवन भर की प्रतिष्ठा के अनुरूप किया जा सकता था। पर न जाने क्यों, उनके जाने के मात्र तीन घंटों के भीतर ओंकारेश्वर श्मशानभूमि में जल्दबाज़ी में उनका अंत्यसंस्कार निपटा दिया गया। शायद इसके पीछे भी गौहर की काली छाया ही रही होगी, ऐसा लगता है। गौहर के कारण बालगंधर्व मुसलमान हो गए हैं, ऐसी अफ़वाहें भी उठ खड़ी हुई थीं। कौन जाने, गौहर के रिश्तेदार बालगंधर्व के पार्थिव शरीर पर क़ब्ज़ा करने आ गए तो क्या होगा — ऐसा सबको डर लगा होगा। इसी कारण कहीं हिंदू–मुसलमान दंगा न भड़क उठे, इसकी पुलिस को भी आशंका थी। और कहते हैं कि परिवारवालों को झटपट अंत्यविधि निपटा लेने की सलाह दी गई।
राजहंस माझा निजला… (मेरा राजहंस सो गया…)
बालगंधर्व के जाने के बाद अत्रे के ‘मराठा’ अख़बार में ‘बालगंधर्व ने महाराष्ट्र पर किसी सम्राट की तरह राज्य किया’ शीर्षक से लेख छपा था। ‘केसरी’ में छपा, ‘मराठी रंगभूमि के स्वर्णकाल का अंतिम देदीप्यमान दीप बुझ गया।’ न्यायमूर्ति गजेंद्रगडकर ने कहा, ‘महाराष्ट्र के घर-घर तक संगीत पहुँचाने वाला श्रेष्ठ अभिनेता।’ बाबूराव पेंढारकर ने कहा, ‘नाट्यसंगीत की, अभिनय की, सहज सौंदर्य की और आलीशान गुणों की शान आज समाप्त हो गई।’ सुधीर फडके ने कहा, ‘अभूतपूर्व, अलौकिक संगीत का अध्याय समाप्त हो गया।’ ना.सी. फडके ने कहा, ‘बालगंधर्व मानो एक अवतारी पुरुष थे, आज चले गए।’ लता मंगेशकर ने कहा, ‘पिता की आज्ञा के पालन के रूप में मैं उनकी ध्वनिमुद्रिकाएँ भक्ति और एकाग्रता से सुनती हूँ।’ पु.ल. देशपांडे ने कहा, ‘मैं ऐसा व्यक्ति हूँ जिसने बालगंधर्व से परमेश्वर से भी अधिक प्रेम किया है। उन जैसा गुणवान अभिनेता कई शताब्दियों में एक बार जन्म लेता है।’
इस प्रकार अनेक तरह से उन पर प्रशंसा के फूल बरसाए जा रहे थे। पर सबका ध्यान खींच लिया था ‘नवयुग’ साप्ताहिक के शीर्षक ने – ‘राजहंस माझा निजला…’ (मेरा राजहंस सो गया…)
पुणे के बालगंधर्व रंगमंदिर के रूप में मुळा-मुठा के तट पर एक भव्य स्मारक खड़ा है। उसकी आधारशिला स्वयं बालगंधर्व ने ही ८ अक्तूबर १९६२ को रखी थी। इस रंगमंदिर का उद्घाटन बालगंधर्व के जन्मदिन यानी २६ जून १९६८ को हुआ। उसके बगल में ही जो पुल है, उसका नामकरण पुणेवासियों ने स्वतःस्फूर्त ढंग से ‘बालगंधर्व पुल’ कर डाला। इन दोनों के कारण बालगंधर्व का नाम आज कितनी बार उच्चारित होता होगा, इसकी कोई गिनती ही नहीं।
कवि ग.दि. माडगूळकर ने अत्यंत भावुकता से कहा हुआ एक वाक्य बालगंधर्व के बारे में सब कुछ कह जाता है — ‘ऐसा बालगंधर्व अब फिर न होगा!’