तो राजहंस एक...
लेखिका - मंजूषा आमडेकर
४. गंधर्व नाटक मंडली की स्थापना
नोटिस दी
अब तक टेंबे और बोडस की एक पक्की धारणा बन गई थी कि, जब तक कंपनी पर कर्ज है तब तक व्यवसाय की कोई गारंटी नहीं, अपने कलागुणों की कद्र भी नहीं होती। जब तक संस्था का स्वामित्व कलाकार के पास नहीं हो, तब तक कलाकारों की उन्नति भी नहीं होगी। बालगंधर्व का हित ध्यान में रखते हुए खाडिलकर और पंडित को भी यह विश्वास हो चला था। संक्षेप में, दो पक्ष बन गए थे। एक में बोडस, टेंबे, दादा लाडू, पुरोहित वगैरह लोग थे, तो दूसरी ओर मुजुमदार और वे लोग थे जो दूसरी नाटक-मंडली तैयार कर रहे थे। बालगंधर्व के नायिका की भूमिका में पहनने के लिए कीमती साड़ी के शौक को मुजुमदार ने पूरा न किया, इसलिए वे अपने-आप ही टेंबे के पक्ष की ओर खिंच गए थे। बालगंधर्व की उपेक्षा की गई तो वे मंडली में टिकेंगे नहीं, ऐसी चेतावनी भी खाडिलकर और पंडित ने दी थी। फिर भी मुजुमदार पर उसका कोई असर नहीं हुआ।
अब हालात बिगड़ते ही चले जा रहे थे। इसी बीच १९ जून १९१३ को गोविंदराव टेंबे, गणपतराव बोडस और बालगंधर्व ने मुजुमदार को ‘कंपनी छोड़ने की’ नोटिस दी। विद्याहरण नाटक रंगमंच पर आने के बीस दिनों के भीतर ही यह घटना घटी। यह खबर देखते ही देखते सब जगह आग की तरह फैल गई। उस ज़माने में किर्लोस्कर नाटक मंडली को लोकमान्य तिलक के समाचार पत्र केसरी जितना ही महत्त्व था। स्वयं लोकमान्य ने नाट्यकला का महत्त्व जाना था, इसलिए उनका भी इस नाटकमंडली पर वरदहस्त था। इस कंपनी में बालगंधर्व ही नहीं रहे तो कंपनी रसातल में चली जाएगी, इस आशंका से उनमें सुलह कराने के जोरदार प्रयास शुरू हुए। राम गणेश गडकरी भी मेल की भरपूर कोशिश कर रहे थे। इन प्रयासों को सफलता मिली और बालगंधर्व लौट आए तो टेंबे और बोडस की प्रतिष्ठा नहीं बच पाती। ऐसी स्थिति में गुजराती मंडली में चले जाना बेहतर होगा पर किर्लोस्कर मंडली में न रहना ही उचित होगा, बोडस ने यह निश्चय कर लिया था।
‘देवा, अब नहीं हो पाएगा,’ इस उत्तर पर बालगंधर्व कायम रहे, इसलिए बोडस पर यह नौबत नहीं आई। बालगंधर्व बस इतना कहते कि नहीं हो पाएगा, पर क्यों, इस पर कुछ भी नहीं बोलते। उन्हें खाडिलकर और पंडित पर विश्वास था। वे मेरा अहित नहीं करेंगे, ऐसी उनकी श्रद्धा थी। बालगंधर्व की माँ ने भी उन्हें किर्लोस्कर नाटक मंडली छोड़ने की अनुमति दी।
आखिरकार मुजुमदार ने यह सारी परिस्थिति छ. शाहू महाराज के कानों तक पहुँचाई। उन्होंने तुरंत बालगंधर्व को कोल्हापुर बुलवा लिया। लेकिन बालगंधर्व अपना पक्ष ठीक से प्रस्तुत नहीं कर पाएँगे, ऐसा सोचने पर गणपतराव भी उनके साथ गए। सब कुछ विस्तार से शांति से सुन लेने के बाद छ. शाहू महाराज को भी उनकी बात ठीक लगी।
एक ओर यह सब हो रहा था, तब अधिक-से-अधिक पैसा कमाने के लिए मुजुमदार धड़ाधड़ लगे हुए थे। सौभद्र, मानापमान और विद्याहरण वगैरह नाटकों के मंचन के विज्ञापन लगा रहे थे। यह मंडली टूट गई तो हमें ये नाटक फिर देखने को नहीं मिलेंगे, इस आशंका से दर्शक भी खचाखच भीड़ लगाते थे। दर्शकों को ही माई-बाप मानने वाले कलाकार भी मन लगाकर ही काम कर रहे थे।
आखिरकार नोटिस की अवधि का आखिरी दिन आ पहुँचा। तात्यासाहेब केळकर ने आखिरी प्रयास करने की ठानी। उन्होंने मुजुमदार को पेंशन लेने को कहा। पर मुजुमदार ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया।
गंधर्व नाटक मंडली
१९ जुलाई १९१३ से बालगंधर्व और उनके समविचारी सहयोगी सेवा-मुक्त होने वाले थे। पर आगे क्या करना है, इसकी व्यवस्था पहले ही कर ली गई थी। ५ जुलाई १९१३ को नारियल फोड़ा गया और एक नई नाट्यसंस्था का जन्म हुआ। इस नाटक मंडली को क्या नाम दिया जाए, इस पर सदस्यों ने अपने मत व्यक्त किए थे। पर आखिरकार खाडिलकर द्वारा प्रस्तावित ‘गंधर्व नाटक मंडली’ यही नाम निश्चित हुआ। इस कंपनी का मालिकाना हक बालगंधर्व, गोविंदराव टेंबे और गणपतराव बोडस—इन तीनों को समान रूप से दिया गया।
गंधर्व नाटक मंडली का श्रीगणेश हुआ उस दिन बळवंतराव पेठे नामक एक पुराने अभिनेता ने आमंत्रितों के स्वागत के लिए एक छोटा-सा भाषण दिया था। यह पता चलने पर मुजुमदार उनकी खिल्ली उड़ाते हुए व्यंग्य से बोले, ‘दुर्योधन जन्मा तब गधा रेंका था…’ पर मन-ही-मन वे समझ चुके थे कि बालगंधर्व के जाने से किर्लोस्कर मंडली का भाग्य भी रूठकर दूर चला गया था। नाटक देखने आए दर्शक जहाँ-तहाँ थूककर गंदगी करते हैं, इसलिए ‘यहाँ न थूकें’ ऐसी तख्तियाँ रंगसाज़ से रँगवा ली गई थीं। रंगसाज़ मुजुमदार से तख्तियाँ कहाँ लगानी हैं, यह पूछने आया, तब वे खीझकर बोले थे कि, ‘अब मेरे ही मुँह पर लगा। क्योंकि बालगंधर्व के चले जाने से दर्शक मेरी ही छी:थू ही करने वाले हैं।’
नाटक मंडली के विभाजन से सभी शर्मिंदा थे। मुजुमदार के सामने तो दर्शकों को मुँह कैसे दिखाएँ, यह सवाल खड़ा हो ही गया था। पर बालगंधर्व, टेंबे, बोडस को भी रास्ते में निकलने में लाज आती थी। गडकरी किर्लोस्कर में ही रुके हुए थे, फिर भी गणपतराव ने उनसे पूछकर देखा था कि, ‘मास्टर, हमारे लिए कोई नाटक लिखेंगे ना?’
उस पर गडकरी ने तपाक से उत्तर दिया था कि, ‘वह त्रिकाल संभव नहीं!’अर्थात् असम्भव है!
नाटक करने की अनुमति
गंधर्व नाटक मंडली ने देवल को आमंत्रित करके तालीम-मास्टर के रूप में उनकी नियुक्ति की। किर्लोस्कर मंडली छोड़कर गंधर्व के पास आते समय रसोईघर में काम करने वाले कृष्णाप्पा जोशी ने किर्लोस्कर की पूजा का बाण भी चुपचाप उठा लिया था। पेण के इनामदार विनायक शिवराम उर्फ बाबासाहेब धारकर असल में किर्लोस्कर मंडली के पुराने चाहनेवाले थे। पर उनका भी झुकाव बालगंधर्व की ओर था। इसलिए पंडित ने उनसे गंधर्व मंडली के लिए पहली पूँजी प्राप्त की। उन्होंने भी उस ज़माने में सात हजार रुपए उपलब्ध करा दिए। फिर कपड़े-लत्ते, गहने-ज़ेवर आदि सामग्री खरीदने की शुरुआत हुई। सामने वाले पर्दे पर राधाकृष्ण का तैलचित्र हो, ऐसा सर्वसम्मति से तय हुआ। यह चित्र ख्यातिप्राप्त गायिका केसरबाई केरकर के दीवानखाने में लगा हुआ था। उसी के आधार पर रघुवीर पेंटर ने गंधर्व मंडली के लिए मंच का पहला बाहरी पर्दा तैयार किया।
बाकी आस-पास की सारी तैयारी चल रही थी, फिर भी मुख्य नाटक कौन सा होगा यह सवाल अभी भी अधर में ही था। लोगों का बालगंधर्व पर कितना भी प्रेम हो, पर अच्छी कथावस्तु और उत्तम नाट्यगीतों वाला नाटक ही तैयार नहीं था। देवल की शारदा, मृच्छकटिक वगैरह नाटक बालगंधर्व के रग-रग में बसे हुए थे। फिर स्वयं बालगंधर्व ने कोल्हटकर से भेंट की। उनसे गुप्तमंजुष, मतिविकार, मूकनायक और प्रेमशोधन नाटक करने की अनुमति प्राप्त कर ली। वैसे भी अण्णासाहेब ने अपने नाटक दूसरों द्वारा किए जाने पर कभी कोई आपत्ति नहीं जताई थी। वे तो खुलेआम कहा करते थे कि, ‘खेत बोया हुआ है, कोई भी चर ले।’
परंतु अण्णासाहेब के वारिसों की ओर से मुजुमदार ने सारे हक ले लिए और अण्णासाहेब के नाटकों को हाथ न लगाने का नोटिस ही गंधर्व मंडली को भेज दिया। मानापमान और विद्याहरण नाटकों के पैसों को लेकर मुजुमदार–खाडिलकर विवाद चल ही रहा था। पर उसका फैसला हो जाने पर दोनों नाटक करने का सामान्य हक गंधर्व मंडली को मिल गया और नाटकों से संबंधित कई समस्याएँ सुलझ गईं।
व्ही. शांताराम
खाडिलकर ने तुरंत कोई भी नाटक लिखने से साफ इनकार कर दिया। गडकरी ने तो पहले ही पीठ फेर ली थी। इसलिए बालगंधर्व ने देवल से बात की। उन्होंने सलाह दी कि ‘फाल्गुनराव’ इस पुराने नाटक को ही नए साज-सिंगार से सजाकर रंगमंच पर लाया जाए। दत्तोपंत पेठकर, दादा लाडू, राजारामबापू — ये भी किर्लोस्कर छोड़कर गंधर्व मंडली में आ चुके थे। सुरीले गले के धनी जगन्नाथबुवा पंढरपूरकर उस समय पर्वती संस्थान में नौकरी कर रहे थे। पर भास्करबुवा बखले की सलाह पर उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी और वे गंधर्व मंडली में शामिल हो गए। दादा लाडू ने भी बड़े उत्साह से गोवा, कोल्हापुर आदि शहरों से अच्छे, सुंदर युवक इकट्ठा किए। उनमें गोविंदा मुळगावकर नाम का लड़का तो बेहद सुंदर था। कोल्हापुर के राजारामबापू वणकुद्रे के बेटे शांताराम ने कंपनी में प्रवेश किया; और आगे चलकर इसी ने व्ही. शांताराम के नाम से चित्रपट जगत में इतिहास रचा। पर नाट्यक्षेत्र में मन न रमने के कारण उसने साल भर में ही कंपनी छोड़ दी।
राजघराने का समर्थन और आश्रय
बालगंधर्व को नायिका की भूमिका में बहुमूल्य वस्त्र-आभूषण बहुत पसंद थे। यह उनके विशेष लगाव या शौक का विषय ही था। पर टेंबे ने बड़ी चतुराई से बिना खर्च के यह समस्या सुलझा दी। बड़ौदा के सरदार वाघोजीराव शिर्के अत्यंत रसिक और उदार थे। उनकी कन्या श्रीमती सुमतीबाई पवार भी स्वभाव से पिता के समान ही थीं। कोल्हापुर के छत्रपति शाहू महाराज की कन्या अक्कासाहेब भी नाटकों की चाहने वाली थीं। उनका समर्थन पाने के लिए टेंबे ने सचमुच कोल्हापुर और बड़ौदा का चक्कर लगाकर पंद्रह-बीस बहुमूल्य शालू [ कीमती ज़रीदार साड़ियाँ] जुटाए। जरी की किनारी वाली कई लुगड़े [सोलह हाथ की साड़ी] तक जुटाईं। उन कपड़ों का इतनी चतुराई से विज्ञापन किया कि वे वस्त्र देखने भी लोग आने लगे। शुरुआत ही राजघराने के वस्त्रों से होने के कारण मूलतः शौकीन बालगंधर्व से आगे अपेक्षाएँ और बढ़ गईं।
उन दिनों सभी नाट्यसंस्थाएँ इसी लोकाश्रय पर ही चलती थीं। गंधर्व मंडली को भी ऐसा आश्रय भरपूर मिला। स्वयं श्रीमंत सयाजीराव गायकवाड ने बालगंधर्व के प्रति प्रेमवश उन्हें सहारा देने का निश्चय किया। दूसरी ओर दामोदर यंदे ने बहुत प्रयास किए कि महाराज के औदार्य का प्रवाह केशवराव भोसले की कंपनी की ओर मुड़ जाए। पर गायकवाड के कारभारी शिरगावकर ने दोनों कंपनियों के नाटक देखे। और उसके बाद गंधर्व मंडली की सिफारिश की। बालगंधर्व के लिए यह आश्रय नहीं बल्कि पुरस्कार था, ऐसा कहें तो गलत न होगा। तय हुआ कि जब महाराज बुलाएँ तब गंधर्व मंडली बड़ौदा जाकर महाराज के लिए तीन से पाँच मंचन करे और पाँच हजार रुपये मेहनताना ले। यह भी तय हुआ कि जिस वर्ष बुलावा न आए उस वर्ष ये पैसे या वार्षिक वृत्ति नहीं मिलेगी। पर बालगंधर्व को उनके एक मंचन के लिए दर्शकों से यूँ ही हजार भर रुपए मिल जाते थे, इसलिए उन्होंने यह शर्त मान ली। यह आश्रय पाने के लिए गंधर्व मंडली ने न किसी की चापलूसी की, न चलकर आए सौभाग्य को ठुकराया।
समय-समय पर मार्गदर्शन मिलता रहे, इसलिए गंधर्व मंडली के लिए पंचों की एक समिति नियुक्त की गई। उसमें न.चिं. केळकर, दत्तात्रय लक्ष्मण वैद्य, श्रीमंत सरदार आबासाहेब विंचुरकर, विनायक शिवराम धारकर और कृष्णाजी परशुराम पंडित शामिल थे।
खाडिलकर और पंडित का आग्रह था कि बालगंधर्व ही एकमात्र मालिक हों। पर स्वयं बालगंधर्व का इस विषय में कोई कहना नहीं था। तो इस पर भी पंचों ने ही निर्णय दिया। तय किया गया कि भागीदारी इस प्रकार हो — बालगंधर्व सात आने, टेंबे पाँच आने और बोडस साढ़े तीन आने। उन तीनों ने ही इसे मान लिया। इसमें से आधा आना बच गया। उसे धर्मादाय कार्यों के लिए सुरक्षित रखा गया। इस प्रकार सोलह आनों का हिसाब निश्चित हुआ। पहले सोलह आने मिलकर एक रुपया होता था।
बालगंधर्व को सबसे बड़ा हिस्सा मिले, इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं थी। क्योंकि उनकी योग्यता सभी ने मानी हुई थी। यहाँ तक कि टेंबे स्वयं कहते थे कि, ‘बालगंधर्व हमारा सौभाग्य हैं। वे हमारे सुदर्शन चक्र भी हैं।’ गंधर्व का चेहरा आकर्षक और भावपूर्ण तो था ही, पर उनका स्वर्गीय गायन, उनके भीतर के इस अभिजात, असामान्य गुण ने उन्हें सबके गले का हार बना दिया था। इसीलिए विरोधी उनके आगे अधिक समय तक टिक नहीं पाते थे। उन्हीं के कारण नई कंपनी को नए हितचिंतक, दर्शक, सलाहकार, आश्रयदाता मिले थे।
संक्षेप में कहें तो एक कंपनी खड़ी करने की दृष्टि से जो-जो करना पड़ता है वह सब चारों ओर से मजबूत किलेबंदी की तरह बना दिया गया। अब बस इतना ही बाकी था कि नाटक प्रत्यक्ष रंगमंच पर आए। और वह तारीख जल्द ही घोषित कर दी गई।
गंधर्व मंडली का पहला नाट्य-मंचन
3 सितंबर 1913 को मुंबई के एल्फिन्स्टन थिएटर में गंधर्व नाटक मंडली ने ‘मूकनायक’ नाटक का पहला मंचन घोषित किया। नाटक के लिए शुभ दिन और शुभ मुहूर्त निश्चित किया गया था। मुंबई के माधवदास ने 105 रुपये की पहली टिकटें खरीदीं। नाट्यगृह में दर्शकों की भारी भीड़ हो गई थी। सर भालचंद्र भाटवडेकर ने संस्था का उद्घाटन किया। नाट्यप्रेमी विनायक त्रिलोकेकर ने आरंभिक भाषण दिया। उसके बाद सवा नौ बजे नाटक शुरू हुआ। वह नाटक ऐसा कुछ जमा कि किर्लोस्कर मंडली छोड़ने को लेकर दर्शकों के मन में बालगंधर्व के प्रति कोई गाँठ नहीं है, यह स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। उसके बाद शापसंभ्रम और मानापमान भी ऐसे ही जमे। मृच्छकटिक तो दर्शकों को बहुत ही पसंद आया। पति-पत्नी जोड़ी से नाटक देखने भीड़ करने लगे थे।
इसी वर्ष ‘राक्षसी महत्त्वाकांक्षा’ इस केशवराव भोसले के नाटक को लोगों ने बेहद पसंद किया और केशवराव तथा बालगंधर्व के उस दौर की यात्रा बराबरी से ही शुरू हुई। मुंबई में शुरुआत होने के बाद अगले दो वर्षों में गंधर्व मंडली ने कई जगह कितने ही नाटक किए। पुणे, जळगाव, बड़ौदा, इंदौर, नागपुर, औरंगाबाद, उमरावती, यवतमाळ — ऐसे गाँव-गाँव प्रयोग करते-करते मंडली नाशिक पहुँची। इंदौर के मुकाम में उन्हें एक अच्छी खबर मिली। अण्णासाहेब के शाकुंतल, सौभद्र और रामराज्यवियोग — इन नाटकों को रंगमंच पर लाने की अनुमति गंधर्व नाटक मंडली को मिल गई थी। इसी दौरान केशवराव देवधर और सदाशिवराव रानडे नामक स्त्रीभूमिका निभाने वाले सुंदर अभिनेता भी गंधर्व मंडली में शामिल हो गए। और देखते-देखते गंधर्व मंडली की लोकप्रियता अपने चरम पर पहुँच गई।
बालगंधर्व के रूप, अभिनय, गायन को तो लोगों ने सिर-आँखों पर बिठा ही लिया था; पर इसके साथ ही उनकी वेशभूषा और केशभूषा उस काल की आधुनिक स्त्रियों को मोहित करने लगी थीं। स्त्रियाँ उनका अनुकरण करने लगी थीं। दादा लाडू उत्तम फोटोग्राफी करते थे। उन्होंने इसके लिए ‘डी लेडेक्स’ उपनाम भी रख लिया था। वे बालगंधर्व के अलग-अलग रंग-रूपों के, वेशभूषा, केशभूषा, भूमिकाओं के फोटो खींचकर बिक्री के लिए रखते थे। उसे जबरदस्त प्रशंसा प्राप्त होती थी। हर नाटक में दादा लाडू को फोटो की बिक्री से पंद्रह-बीस रुपये आसानी से मिल जाते थे। इतना ही नहीं, उस समय श्रीमंत घरानों के लड़कों को बालगंधर्व की ही तरह स्त्री-वेष में सजकर अपने फोटो खिंचवाने का शौक पैदा हो गया था। फिर उन्हें सजाने से लेकर फोटो खींचने तक सब कुछ लाडू को ही करना पड़ता था। फिर वे स्वाभाविक ही इसके लिए अच्छी मोटी फीस लेते थे।
उधर 1911 में भास्करबुवा बखले ने पुणे में ‘भारत गायन समाज’ नामक संस्था स्थापित की और संगीत की शिक्षा देने का उपक्रम शुरू किया। बखले अब नाटक कंपनी में काम न करते हों, फिर भी स्वयं बालगंधर्व और टेंबे के मन में उनके प्रति नितांत आदर था। इसलिए गंधर्व मंडली पुणे आती तो एक बार के नाटक के मंचन की आय ‘भारत गायन समाज’ को मदद के रूप में देते थे। ऐसी परिपाटी ही पड़ गई थी। त्र्यंबकराव साठे केवल एक ही वर्ष कंपनी की व्यवस्था देखने वाले थे। इसलिए वर्ष समाप्त होते ही उनकी जगह पंडित की नियुक्ति हुई। पर वे समिति में भी थे। दोनों जिम्मेदारियाँ एक ही व्यक्ति नहीं ले सकता था, इसलिए उन्होने वहाँ त्यागपत्र दिया और उनकी जगह सॉलिसिटर पी. एस. लाड की नियुक्ति हुई। इन्हीं की बेटी आगे चलकर दुर्गाबाई खोटे नाम से सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री बनीं।
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