Logo

तो राजहंस एक...

लेखिका - मंजूषा आमडेकर

५. फिर से फूट

गलतफहमी

बालगंधर्व को ठाठ-बाट से रंगमंच पर विचरण करना पसंद था। हर भूमिका के योग्य जरीदार कीमती वस्त्र खरीदकर उस भूमिका में रंग भरने के लिए जितना पैसा लगे, खर्च करने में वे आगा-पीछा नहीं देखते थे। उनकी इस खर्चीली प्रवृत्ति पर गोविंदराव नाराज रहते थे। एक जगह तो उन्होंने लिखकर भी रखा है कि, ‘शौक करना, उसके लिए जिद करना और जो उनका शौक पूरा करे उसके दायरे में घूमते रहना — बस इतना ही बालगंधर्व को मालूम है।’ उनकी इस नाराजगी का गलत फायदा उठाकर किसी ने उनके और बालगंधर्व के बीच अफवाहें फैलाईं और गलतफहमियाँ भी फैला दीं। उधर बाळासाहेब पंडित बालगंधर्व का हर शब्द झेलने को सदैव तैयार रहते थे। उनकी तो इच्छा ही थी कि अकेले बालगंधर्व ही कंपनी के मालिक हों। और जल्द ही वह भी हो गया।

नागपुर में नाटक के मंचन के दौरान गोविंदराव की आवाज जो बिगड़ी सो बिगड़ती ही गई। उनकी जगह दत्तोपंत अभिनय करने लगे। इसलिए उन्हें जो अतिरिक्त वेतन देना पड़ा उसका भार गोविंदराव सहन करें, ऐसा गणपतराव ने मुद्दा रखा। गोविंदराव को भी डॉक्टरों ने कम से कम दो महीने की अनिवार्य विश्राम की सलाह दी। इसका फायदा उठाकर बाळासाहेब ने यह प्रचार शुरू किया कि, ‘गोविंदराव न हों तब भी नाटक रंग जमा ही रहे हैं। फिर गोविंदराव की ज़रूरत ही क्या है?’

इस पर बालगंधर्व ने मौन साध लिया। इससे गोविंदराव चिढ़ गए। उन्होंने मुंबई जाकर 1915 के मई महीने में त्यागपत्र दे दिया। तय हुआ कि उनके हिस्से के मेहनताने के रूप में उन्हें साढ़े सात हजार रुपये दिए जाएँ। उसके बाद यह भी तय हुआ कि बालगंधर्व को दस आने और बोडस को छह आने का हिस्सा मिले। संक्षेप में, गंधर्व मंडली की स्थापना के थोड़े ही समय में उनके बीच फूट पड़ गई।

बालगंधर्व की बीमारी

कुछ ही समय बाद किसी कारणवश बालगंधर्व बीमार हो गए। उन्हें तैरना बहुत पसंद था। मौका मिलते ही वे अपना यह शौक पूरा कर लेते थे। नाशिक के निवास में गंगा में तैरने के कारण वे जो बीमार पड़े, तो उनका गला ही बैठ गया। आवाज़ इतनी बैठ गई  कि नाटक बंद हो गए। मंडली को अपना डेरा पुणे ले जाना पड़ा। बालगंधर्व को विश्राम करना ही पड़ा। गोविंदराव के मामले में गणपतराव ने मुद्दा उठाया था कि बदली कलाकार के पैसे उन्हें खर्च करने चाहिए। पर इस बार वे कुछ भी न बोल सके। क्योंकि बालगंधर्व की भूमिका कोई भी नहीं निभा सकता था। टेंबे चले जाते तब भी कंपनी चलती रहती। पर बालगंधर्व चले जाएँ तो कंपनी का कुछ भी ठीक नहीं — यह गणपतराव अच्छी तरह समझते थे। इसलिए इस बार वे कुछ न बोले,  चुप बैठे रहे।

बालगंधर्व किर्लोस्कर कंपनी से बाहर निकले तब गडकरी उन पर नाराज हो गए थे। पर कुछ समय बाद उनका वह गुस्सा शांत हो गया। उन्होंने अपना ‘पुण्यप्रभाव’ यह नाटक गंधर्व मंडली को पढ़कर सुनाया। उन्हें वह पसंद आया, पर व्यावहारिक लेनदेन न जमने के कारण वह नाटक किर्लोस्कर मंडली के पास चला गया।

गंधर्व मंडली छोड़ने पर गोविंदराव ने अपनी ‘शिवराज मंडली’ शुरू की। इसलिए उन पर प्रेम करने वाले दादा लाडू, राजाराम बापू पुरोहित, पांडोबा क्षीरसागर, बळवंतराव पेठे, गोविंदराव मुळगावकर — ये सभी लोग गंधर्व मंडली छोड़कर चले गए। उनके पीछे-पीछे और भी कुछ कलाकार छोड़कर जाने को निकले। फिर बोडस को पेठकर, पंढरपूरकर, देवधर और रानडे से तीन वर्ष का अनुबंध करवाना पड़ा। यह सब आश्चर्यजनक घटनाएँ ही कहनी पड़ेंगी। क्योंकि गंधर्व मंडली में रहने पर भरपूर वेतन, स्थिरता और लोकप्रियता मिलती,  फिर भी लोग नाखुश थे। बालगंधर्व कहने भर को मालिक थे लेकिन सारा व्यवहार गणपतराव और बाळासाहेब के कब्जे में था। उनके कठोर अनुशासन से ऊब कर लोग कंपनी छोड़कर जाने लगे थे।

आगे बड़ौदा में निवास के दौरान बालगंधर्व प्लूरसी के रोग से फिर बीमार हो गए । नाटकों का मंचन बंद हो गया। अधिक दिन नाटक बंद रखकर भी काम चलने वाला नहीं था। नहीं तो कंपनी कैसे चलती? इसलिए मास्टर कृष्णराव फुलंब्रीकर नामक अभिनेता को बालगंधर्व की भूमिकाओं के लिए तैयार किया गया। ‘संत सखू’ नाटक के कारण यह लड़का काफी लोकप्रिय हो चुका था। वह बहुत ही होशियार था इसलिए भास्करबुवा का लाडला बन बैठा था। उसने बड़ौदा के निवास के दौरान शारदा की भूमिका निभाई।

देवल भी चले गए

आगे चलकर बालगंधर्व ठीक हो गए और कंपनी ने पुणे और बेळगाव में नाटकों के मंचन किए। पर तभी देवल बीमार पड़ गए और वे मिरज चले गए। उनकी सूचनाओं के अनुसार गणपतराव ने ‘संशयकल्लोळ’ नाटक की तालीमों की जिम्मेदारी ले ली। नाटक की तैयारी हो गई। तय हुआ कि पहला मंचन हुबली में किया जाएगा। पर वह नाटक रंगमंच पर आने से पहले ही देवल ने अंतिम सांस ली। देवल का यह नाटक बहुत ही लोकप्रिय हुआ था, इसलिए उन्होंने ‘वत्सलाहरण’ नामक नाटक लिखने का संकल्प किया था। पर मृत्युदेवता ने उन्हें वैसा अवसर ही नहीं दिया।

देवल के लिखे ‘मृच्छकटिक’ और ‘झुंझारराव’ ये नाटक यद्यपि रूपांतरित थे, फिर भी वे बेहद लोकप्रिय और सुंदर बन पड़े थे कि उन्हें स्वतंत्र नाटकों का दर्जा दिया जाना चाहिए था। इतना ही नहीं, ‘संशयकल्लोळ’ यह नाटक अंग्रेज़ी नाटक पर आधारित होने के बावजूद देवल ने उसका रूपांतर इतने बेहतरीन ढंग से किया था कि यही मूल नाटक हो—ऐसा ही लगता था। इस नाटक में उन्होंने यथार्थ और रसिकता का ज़बरदस्त मिलाप साधा था। वे उत्तम नाटककार तो थे ही, पर उत्कृष्ट नाट्यशिक्षक भी थे। सहज अभिनय पर उनका अधिक ज़ोर था।

नाटक संशयकल्लोळ

संशयकल्लोळ के नाट्य-मंचन बालगंधर्व और केशवराव भोसले दोनों ने ही किए, और दोनों के नाटक प्रेक्षकों की पसंद पर खरे उतरे। प्रतियोगिता थी, पर वह स्वस्थ थी। पर गंधर्व मंडली को नए साथियों को तैयार करना पड़ रहा था, क्योंकि बहुत-से लोग गोविंदराव के साथ चले गए थे। तबले पर रघुनाथ रबकवी और हार्मोनियम पर गुंडोपंत वालावलकर शामिल हुए। नवंबर १९१६ से नए समूह के साथ गंधर्व मंडली ने संशयकल्लोळ के नियमित मंचन शुरू किए। कहते हैं कि तब से इस नाटक का जो रंग चढ़ा वह फिर कभी नहीं उतरा। इस नाटक को ‘मराठी का सर्वोत्कृष्ट मनोरंजक नाटक’ होने का सम्मान मिला था। उस ज़माने से यह सम्मान कोई छीन नहीं सका।

देखा जाए तो संशयकल्लोळ कोई बिलकुल नया-नकोर नाटक नहीं था। १८९३ में रंगभूमि पर आए फाल्गुनराव नाटक को फिर से नए सिरे से प्रस्तुत करने की योजना बनाई गई थी। देवल ने ही सुझाव दिया था कि उस पर संगीत का साज चढ़ाकर और नए कलाकार लेकर उसे नए रूप में फिर रंगमंच पर लाया जाए। वही फाल्गुनराव नाटक ‘संशयकल्लोळ’ नाम से रंगमंच पर अवतरित हुआ था। इसमें बालगंधर्व रेवती की भूमिका करते, तो गणपतराव बोडस फाल्गुनराव की। यह एकमात्र ऐसा नाटक था कि जिसमें से बोडस को निकाल दें तो नाटक फीका पड़ जाता था। उनके बिना यह नाटक रंग नहीं जमा सकता था—इतनी ताकत से वे वह भूमिका निभाते थे।

१९०६ से १९१६ के इन दस-ग्यारह वर्षों के कालखंड में बालगंधर्व ने जितनी भूमिकाएँ कीं, उनमें सामाजिक कही जा सकें ऐसी केवल दो ही थीं। पहली थी ‘संगीत शारदा’ की शारदा और दूसरी ‘मतिविकार’ की सरस्वती। इन गंभीर भूमिकाओं की पृष्ठभूमि पर संशयकल्लोळ की उनकी ‘रेवती’ की भूमिका कहीं अधिक चुलबुली थी। इसमें हास्य और शृंगार—इन दो रसों का विलक्षण मिलाप था।  गोवा की स्त्री की भूमिका निभाते समय उन्होंने जो प्राण उसमें फूँके उसका कोई जोड़ नहीं था। संक्षेप में, मसाला पुराना होते हुए भी यह नाटक पूरी तरह नए रूप में आया और प्रेक्षकों के मन में घर कर गया।

नाटक स्वयंवर

इसके बाद आया ‘स्वयंवर’। स्वयंवर नाटक का पहला रंगमंचीय प्रयोग १० दिसंबर १९१६ को मुंबई की रंगभूमि पर हुआ। इसमें बोडस ने कृष्ण की और बालगंधर्व ने रुक्मिणी की भूमिका की थी। यह नाटक भी अत्यंत लोकप्रिय हुआ। पर इस नाटक की विशेषता यह थी कि खाडिलकर ने रुक्मिणी के पात्र को विशेष महत्त्व देकर लिखा था, इसलिए केवल अपने ही दम पर संपूर्ण नाटक को खींच ले जाने की कला बालगंधर्व ने इसी दौर में पाई। भामिनी और देवयानी की तरह यह भूमिका भी शृंगार-रस-प्रधान होने के बावजूद उसकी एक अलग छटा है। यहाँ चूँकि रुक्मिणी अपने परिवार का, सुख का त्याग करके श्रीकृष्ण के साथ जाती है, इसलिए इस भूमिका को एक बिलकुल अलग स्तर प्राप्त हुआ था। भास्करबुवा ने पदों की धुनें अधिक लालित्यपूर्ण स्वरों में बाँधी थीं। बालगंधर्व ने उन्हें ऐसे समरस होकर गाया कि इस नाटक के कारण उन्हें मराठी न जानने वाले श्रोता भी चाहने लगे थे। गुजराती और मुलतानी दर्शक भी भीड़ करने लगे, जिससे ‘स्वयंवर’ अर्थात्‌ अपार धन—ऐसा समीकरण ही बन गया था।

गोविंदराव जिसे ‘शौकीन वर्ग’ कहते थे, वह मुंबई के गुजराती धनिक लोगों का वर्ग था। यह वर्ग बालगंधर्व पर ऐसी भक्ति करने लगा कि अपनी गुजराती भाषा के नाटक तक देखना बंद कर बैठा। इतना ही नहीं, खुद अल्लादिया खांसाहेब भी बालगंधर्व के नाटकों में हाज़िरी लगाने लगे। पूरे जीवन भर संगीत की आराधना करने के बाद भी जो स्वर वे नहीं लगा पाते थे, वही बालगंधर्व को सहजता से लगाते देख वे सद्गदित हो जाते थे। मुश्किल से एक महीने के कालखंड में बालगंधर्व ने संशयकल्लोळ और स्वयंवर—इन नाटकों की अलग-अलग बाज वाली भूमिकाओं को कुशलता से निभाकर ऐसा चमत्कार कर दिया था कि अब उनका बड़ा दबदबा होने लगा था। १९१६ तक लोगों के मन में उनके प्रति प्रशंसा-भाव था; पर अब उस प्रशंसा की जगह आदरयुक्त भक्ति ने ले ली थी। अब लोग यह चर्चा बंद कर चुके थे कि उनका अभिनय कैसा रहा, क्योंकि अब बालगंधर्व जो करेंगे वही अभिनय और वही गायन—यही मापदंड ही तय हो गया था। उनके प्रति दर्शकों के मन में श्रद्धाभाव उत्पन्न हो गया था।

प्रमुख घटनाओं की मालिका

इस संपूर्ण कालखंड में कुछ अच्छी-बुरी घटनाएँ एक के बाद एक घटती गईं। किर्लोस्कर नाटक मंडली से बाहर निकलने पर गंधर्व मंडली की स्थापना हुई, जोगळेकर का देहांत हुआ, बालगंधर्व प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँचे, फिर गोविंदराव टेंबे और अन्य अच्छे-अच्छे कलाकार छोड़कर चले गए, संशयकल्लोळ और स्वयंवर नाटकों के कारण बालगंधर्व लोगों के श्रद्धास्थान बने और १९१७ में दत्तोपंत पेठकर भी चल बसे। उनकी जगह पंढरपुरकर को लिया गया। पर वे रोबदार थे फिर भी सौंदर्य, भव्यता और कोमलता की कमी खलती ही रहती थी। उन्हें नायक के रूप में तैयार करते-करते गणपतराव बोडस का दम निकल जाया करता।

नाटक एकच प्याला

देवल और खाडिलकर के स्वयंवर और संशयकल्लोळ—ये दोनों नाटक यद्यपि बहुत बढ़िया चल रहे थे, फिर भी दर्शकों की रुचि बदलने के लिए रंगमंच पर कुछ नया लाने की आवश्यकता अब गंधर्व मंडली को महसूस हो रही थी। गडकरी के प्रेमसंन्यास और पुण्यप्रभाव नाटक धूम मचा ही रहे थे, इसलिए उनसे कोई नाटक लिखवा लिया जाए—ऐसा विचार गंधर्व मंडली में किया जाने लगा था। मुंबई का निवास समाप्त होने पर मंडली बड़ौदा गई। वहाँ का सारा कार्यक्रम निपट जाने पर वे सब पुणे आए। गडकरी वहाँ बार-बार आते रहते थे। अब तक उनके मन का रोष भी शांत हो चुका था। गणपतराव और बालगंधर्व ने उनसे नए नाटक के बारे में बातचीत शुरू की। गडकरी बोले, ‘नारायणराव, मैं तुम्हें नाटक दूँगा, पर मेरे नाटक में तुम्हें फटी साड़ी पहनकर रहना पड़ेगा। क्या यह तुम्हें मंज़ूर है?’

नायिका की भूमिका करते हुए बालगंधर्व के कीमती वस्त्रों और गहनों के शौक से सब अच्छी तरह परिचित थे। इसलिए गडकरी का अनुमान था कि वे हाँ कहेंगे ही नहीं। पर बालगंधर्व जन्मजात अभिनेता थे। उस पर गडकरी के लेखन पर उनकी नितांत श्रद्धा थी। इसलिए वे एक क्षण भी गँवाए बिना बोले कि, ‘अरे, फटी साड़ी ही क्या, मैं तो बोरी पहनकर भी अभिनय करने को तैयार हूँ। पर आप हमारे लिए नाटक ज़रूर लिखें।”

और फिर इसी बैठक में गडकरी ने बालगंधर्व के लिए ‘एकच प्याला’ नाटक लिखने का संकल्प किया!

पर उन्हे नाटक लिखने में कितने दिन लगेंगे, इसका कोई ठिकाना नहीं था। इसके अलावा उनका स्वभाव मनमौजी था। यदि उनके मन का पुराना रोष फिर उभर आया तो क्या किया जाएगा, यह भी आशंका थी ही। इसलिए गंधर्व मंडली ने तब तक कोई दूसरा नाटक तैयार करने का निश्चय किया। तदनुसार श्रीपाद कृष्ण कोल्हटकर का ‘सहचारिणी’ नाटक लिया गया। यह एक मनोरंजक नाटक था जिसमें दो पत्नियों वाले पति की कहानी को मज़ेदार तरीके से प्रस्तुत किया गया था। लेकिन इस नाटक को दर्शकों की जैसी उम्मीद थी, सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली। सच कहें तो यह नाटक बुरी तरह पिट गया।

इसी बीच, अब गडकरी हमारे लिए नया नाटक लिखने वाले हैं—इस संतोष में बालगंधर्व अपनी रोज़ की भूमिकाओं को और भी समरस होकर निभाने में मगन थे। पर बालासाहेब पंडित के मन में नाटकों के साथ-साथ कोई नया व्यवसाय करने का भी विचार घूम रहा था। सेना के काम आने वाली कुछ वस्तुएँ बनाने का ठेका ग्वालियर में मिलने की संभावना थी, इसलिए उन्होंने वहाँ नाटक का दौरा तय किया। यहाँ के राजाश्रय से नए नाटकों को समर्थन मिलने का अवसर मिल सकेगा—इस विचार से बालगंधर्व और गणपतराव ने भी विरोध नहीं किया।

१९१८ के जुलाई महीने में गंधर्व मंडली पुणे में डेरा डाल कर बैठी। मंडली का वर्धापनदिन [ जन्मदिन] हर वर्ष पुणे में ही मनाया जाता था। इसलिए वर्षा ऋतु में मंडली पुणे में ही तंबू गाड़े रहती। पुणे, मुंबई प्रांत की वर्षा ऋतु के दौरान राजधानी हुआ करती थी। इसलिए इस दौरान गवर्नर भी पुणे में रहते थे। पुणे को विद्या,शिक्षा का केंद्र या  विद्यार्थियों का शहर माना जाता था। इसलिए यहाँ के विद्यार्थी, मूल निवासी, रेस के लिए आए धनी शौकीन, सरदार, राजा—ऐसा विविध प्रकार का दर्शक वर्ग गंधर्व मंडली को सहजता उपलब्ध हो जाता था।

जल्दी ही ‘एकच प्याला’ की हस्तलिखित प्रति गंधर्व मंडली को प्राप्त हुई। तालीम शुरू हुई। सुधाकर की भूमिका बोडस करने वाले थे तो नायिका सिंधु की भूमिका बालगंधर्व! पंढरपुरकर, अभ्यंकर, देवधर, रानडे—ये भी अन्य भूमिकाएँ निभाने वाले थे। इसमें शरद की भूमिका मास्टर कृष्णाराव के पल्ले पड़ी। इस बार बालगंधर्व ने स्वयं द्वारा गाए जाने वाले नाट्य-पदों की धुन बनाते समय समय पुणे की सुप्रसिद्ध गायिका सुंदराबाई जाधव की मदद ली। बाकी धुनें पंढरपुरकर और कृष्णाराव ने बनाईं।

इस नाटक का पहला मंचन १९१९ के फरवरी महीने में बड़ौदा के महाराज के समक्ष प्रस्तुत करने का निश्चय किया गया था। पर गडकरी खुद ही क्षयरोग से बीमार पड़ गए। फिर उन्हीं के सुझाव अनुसार शुरुआती पद विठ्ठल सीताराम से लिखवा लेने का निश्चय हुआ। पसंद न आने पर गडकरी नए सिरे से पद लिख देने वाले थे, पर वैसा संयोग ही नहीं बन पाया क्योंकि नाटक रंगभूमि पर आने से पहले ही गडकरी ने २३ जनवरी १९१९ को दुनिया से विदा ली।

पर तयशुदा कार्यक्रमके अनुसार बड़ौदा में इस नाटक का पहला मंचन हुआ। पर वहाँ का सारा ठाठ दरबारी होता था। दर्शकों को निर्धारित पोशाक पहनकर नाटक में आना होता था—यही नियम था। महाराज बिजली का बटन दबाते तभी पर्दा ऊपर सरकाना है—ऐसा माना जाता था। वह नाटक महाराज को इतना पसंद आया कि उन्होंने हर वर्ष जो रक़म तय की थी, उससे दो हज़ार रुपये अधिक दिए।

इसके बाद यह नाटक लेकर गंधर्व मंडळी मुंबई आई। गडकरी के पहले लिखे नाटकों प्रेमसंन्यास और पुण्यप्रभाव ने रसिक दर्शकों को दीवाना बना रखा था, इसलिए वे उनका नया नाटक देखने को उत्सुक थे। उस पर गडकरी का निधन हो जाने से स्वाभाविक ही दर्शकों का नाटक की ओर देखने का दृष्टिकोण सहानुभूति का था। परंतु, नाटक यानी मनोरंजन—ऐसा समीकरण मन में लेकर आए दर्शकों को इस नए सामाजिक आशय वाले नाटक के पहले मंचन ने हिला दिया, दिल को छू लिया। इससे पहले संगीत शारदा और कीचकवध नाटकों ने खलबली मचाई थी। पर इस नाटक ने समाज को अंदर-बाहर मथ डाला। शराब पीने की लत से क्या होता है, यह सबको मालूम था; पर परिवार की इतनी तबाही होती है, यह देखकर लोग हिल गए थे। मज़ाकिया भूमिका करने वाले गणपतराव को इतनी करुण भूमिका करते देख प्रेक्षक हक्के-बक्के रह गए थे। बाकी सबकी भी भूमिकाएँ भी बेहतरीन रहीं।। पर दर्शक सच्चे अर्थ में भीतर तक हिल गए वह बालगंधर्व द्वारा निभाई गई सिंधु की भूमिका देखकर। गडकरी ने सिंधु के पात्र को बहुत ही विलक्षण बनाया था। कीमती जरीदार शालू-शेले और गहने पहनकर शान से चलने वाले, खूबसूरत बालगंधर्व को फटी साड़ी में अप्रतिम अभिनय करते देख लोगों को अपनी ही आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। खुद बालगंधर्व भी इस भूमिका का वज़न समझते थे। इसलिए उन्होंने अपने संवाद, उच्चारण, शब्दफेंक, हाव-भाव आदि सभी बातों पर विशेष मेहनत की थी। महेश्वरी साड़ी पहनकर वे ‘मानस का बंधिरावे’ गाते हुए रंगमंच पर आते ही दर्शक तत्काल दिल का थाम लेते थे। ‘चंद्र चवथीचा’ और ‘बघु नको’ ये पद वे गाने लगते ही प्रेक्षकों के तन रोमांचित हो जाते। मातृत्व और कारुण्य की वे मूर्ति, प्रतिमा लगते थे।

अब तक बालगंधर्व ने निभाई भूमिकाएँ शृंगार-रस-प्रधान थीं। रंगमंच पर चमक, ऐश्वर्य दिखाने वाली थीं। पर यहाँ तो दारिद्र्य की उदासी फैली रहती थी। पर उस पर सिंधु के तेजस्वी आचरण से, उसकी तपश्चर्या से उस उदासी पर भी तेज छा जाता। सचमुच उसके साथ फूट-फूटकर रोने के लिए सालोंसाल दर्शक यह नाटक देखने आते थे। हँसने की अपेक्षा नायिका के साथ रोने का आनंद उन्हें अधिक हृदयंगम लगता था। बालगंधर्व की फटी साड़ी जैसे महावस्त्र बन गई थी। गुर्जर ने पद अस्थायी रूप से रचे थे वे ही पद स्थायी रूप से गूँजते रहे।

यहाँ, इस नाटक के पड़ाव पर बालगंधर्व के अभिनय को मानो कोई पूर्णत्व आ गया था। संपूर्ण परिपक्वता का दर्शन उनमें घटित हो रहा था। पर उनकी हर सफलता को मानो एक काली छाया का शाप ही मिला था। मानापमान के पहले ही प्रयोग में बेटी की मृत्यु, उसके पीछे-पीछे जोगळेकर की मृत्यु ! गडकरी–बालगंधर्व अद्वितीय जोड़ी जब बनी तो उनके पहले ही नाटक से पहले गडकरी की मृत्यु… बालगंधर्व की असामान्य सफलता को लगी नज़र ही थी यह सारी दुर्घटनाएँ!

Scroll to Top